एक सज्जन ने हिंदी में नुक्ते का प्रयोग करना बंद कर दिया। लोगों ने उनकी
भाषा पर सवाल उठाते हुए कहा कि नुक्ते के प्रयोग के बिना ज़लील और जलील
में अंतर करना कैसे संभव होगा।
लोगों के कहने पर उन्होंने दुबारा नुक्ते का प्रयोग करना शुरू किया। अब
मानक हिंदी वर्तनी के नियम बनाने वालों ने उनसे कहा कि हिंदी में 'क' और
'ग' में नुक्ता लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्हें यह बात तर्कसंगत
भी लगी कि किताब, किस्सा, किस्मत, गलत आदि शब्दों में नुक्ता लगाने के
लिए हमेशा एक उर्दू शब्दकोश अपने पास रखना हर किसी के लिए संभव नहीं
होगा। मानक वर्तनी के नियमों की पुस्तिका में यह लिखा है कि हिंदी में
केवल 'ज' और 'फ' में नुक्ता लगाना चाहिए। अब उस सज्जन ने केवल 'ज' और 'फ'
में नुक्ता लगाना शुरू कर दिया।
लेकिन नुक्ते पर होने वाली नुक्ताचीनी ने भी इस सज्जन का पीछा नहीं
छोड़ने की कसम खा ली थी। अब लोगों ने उन्हें यह कहना शुरू कर दिया कि
केवल 'ज' और 'फ' में नुक्ता नहीं लगाना चाहिए। उन लोगों ने कहा कि 'ख'
और
'ग' से ऐसी क्या दुश्मनी है कि इनमें नुक्ता नहीं लगाया जाए। उन लोगों का
यह मानना था कि 'क' में नुक्ता लगाने की आवश्यकता भले न हो लेकिन 'ख' और
'ग' में तो नुक्ता लगाना चाहिए।
इस सज्जन की कहानी बड़ी लंबी है। उन्होंने नुक्ता लगाने या न लगाने के
सवाल से जूझते हुए ही इस दुनिया से विदा ले ली! अब यह स्पष्ट कर दूँ कि
नुक्ते के प्रयोग की जटिलता को स्पष्ट करने के लिए मुझे इस काल्पनिक
कहानी के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझा!
अधिकतर लोग हिंदी में या तो नुक्ता लगाते ही नहीं है या केवल 'फ' और 'ज'
में इसका प्रयोग करते हैं। लेकिन दोनों मामलों में उन्हें गलत ठहराने
वाले लोगों की कमी नहीं है। जो लोग केवल 'ज' और 'फ में नुक्ता लगाते हैं
उन्हें गजल जैसे शब्द में 'ग' में नुक्ता नहीं लगाने से पहले दस बार
सोचना पड़ता है। सारांश यह है कि आप कुछ भी कर लें, नुक्ते पर नुक्ताचीनी
से बचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है!
आशा है कि आप इस विषय पर हमें अपने विचार से अवगत कराएँगे। कृपया
निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करें और यह बताएँ कि आप हिंदी में नुक्ते का
प्रयोग करते हैं या नहीं :
सादर,
सुयश
9811711884
अनुवाद, हिंदी और भाषाओं पर मेरा ब्लॉग : http://anuvaadkiduniya.blogspot.com
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प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ।
हिंदी में नुक्ते के प्रयोग पर विद्वानों में भी मतैक्य नहीं है।
अगर हम नुक्ता नहीं लगाते हैं तो लोग नुक्ता लगाने को कहते हैं (रेडियो,
टीवी आदि के संदर्भ में) और अगर लगाते हैं तो वे इसे हटाने को कहते हैं
(अखबार के संदर्भ में)!
रेडियो और टीवी चैनलों के लिए काम करने वालों को 'ज्यादा' और 'ज़्यादा'
जैसे शब्दों में अंतर करना होता है। उनके लिए नुक्ता लगभग अनिवार्य है।
इसके बिना वे शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर सकते हैं।
हिंदी के अधिकतर पत्रकारों को नुक्ते की सही जानकारी नहीं होती है। इस
स्थिति में वर्तनी की अराजकता से बचने के लिए अधिकतर संपादक नुक्ते का
प्रयोग नहीं करना ही बेहतर समझते हैं।
हिंदी में नुक्ते के प्रयोग की प्रमुख प्रवृत्तियाँ इस प्रकार हैं :
1. नुक्ते का सर्वथा त्याग
2. केवल 'ज' और 'फ' में नुक्ते का प्रयोग
कुछ लोग 'क', 'ख' और 'ग' में भी नुक्ते का प्रयोग करते हैं, लेकिन इसके
लिए उर्दू का ज्ञान आवश्यक है।
समस्या यह है कि हिंदी में नुक्ते का कोई सर्वमान्य या स्पष्ट नियम नहीं
है। नियम की स्वीकार्यता तभी सुनिश्चित की जा सकती है जब सरकार और समाज
दोनों इस दिशा में प्रयत्नशील हों। क्या हमें हिंदी के संदर्भ में ऐसा
कोई प्रयत्न दिख रहा है?
मैं नुक्ते के संदर्भ में केवल यह सलाह दूँगा कि अगर आप इसका प्रयोग करती
हैं तो अपनी वर्तनी में एकरूपता पर अवश्य ध्यान दें। कुछ लोग 'ज़रूरत'
में नुक्ता लगाते हैं लेकिन 'ज़्यादा' में नहीं।
सादर,
सुयश
9811711884
अनुवाद, हिंदी और भाषाओं पर मेरा ब्लॉग : http://anuvaadkiduniya.blogspot.com
On 26 मार्च, 16:46, kanta rani <kantar...@gmail.com> wrote:
> suyash ji
>
> its a good point
> and written very nicely
> but it didnt solve the problem ..kahaan nukta lagaya jaye aur kahaan nahee??
>
> kanta
>
> 2010/3/25 Suyash Suprabh <translatedbysuy...@gmail.com>
> > इस समूह से सदस्यता समाप्त करने के लिए, hindi+un...@googlegroups.com<hindi%2Bunsu...@googlegroups.com>को ईमेल करें.
> > और विकल्पों के लिए,http://groups.google.com/group/hindi?hl=hiपर इस समूह
> > पर जाएं.
इस समूह से सदस्यता समाप्त करने के लिए, hindi+un...@googlegroups.com को ईमेल करें.
और विकल्पों के लिए, http://groups.google.com/group/hindi?hl=hi पर इस समूह पर जाएं.
उन लोगों के लिए ये प्रश्न हैं, जो हिन्दी में उर्दू (अरबी-फारसी) से लिए गए शब्दों के लिए नुक्ता के प्रयोग पर बल देते हैं ।
اسیر असीर = बन्दी, कैदी
اثیر असीर = निष्केवल, खालिस
عسیر असीर = दुष्कर, मुश्किल
عصیر असीर = अंगूर का शीरा
عثیر असीर = धूलि, गर्द
---नारायण प्रसाद
क्षमा करें परन्तु आपके प्रश्न समझ नहीं आए. उर्दू ने हिंदी से क्या
लिया इसका क्या महत्त्व है? अगर केवल इसलिए हिंदी से नुक्तों को निकाल
बाहर किया जा रहा है कि उर्दू ने कोताहियाँ और ग़लतियाँ की हैं तो कम से
कम मुझे तो यह समझदारी का काम नहीं लगता. (यह और बात है कि उर्दू (लिपि)
ने हिंदी (लिपि) से बहुत कुछ लिया भी है!)
हिंदी में नुक्तों का प्रयोग होना चाहिए या नहीं यह केवल हिंदी की अपनी
phonology और शब्दों के मानक उच्चारण पर निर्भर होना चाहिए. यदि हिंदी
में "क़सम-ख़ुशी-ग़लत-ज़िन्दगी-फ़ुव्वारा" को "कसम-खुशी-गलत-जिंदगी-
फुव्वारा" बोलना ही मानक है, तो फिर इनमें क-ख-ग-ज-फ ही लिखे जाएँ, क़-
ख़-... नहीं. और अगर किसी शब्द में क़ या ग़ की आवाज़ का प्रयोग ही मानक
है, तो फिर उस में नुक्तों का प्रयोग ही सही है.
इस बात से हम हिंदी भाषियों को रत्ती भर फरक नहीं पड़ना चाहिए कि इन
शब्दों का उर्दू में मानक उच्चारण क्या है. क्या हम हिंदी में हर किसी
अन्य भाषा से आए हुए प्रत्येक शब्द का उसी प्रकार उच्चारण करते हैं जिस
प्रकार उस भाषा के बोलनेवाले करते हैं? बिलकुल नहीं!
सुयश साहिब की कहानी के "सज्जन हीरो" की परेशानी भी मुझे अजीब लगती है.
भई इसे इतना बड़ा मसला बनाने की क्या ज़रुरत है? जिस शब्द की जो मानक
"स्पेलिंग" है, उसे इस्तेमाल करो, बस! इंग्लिश में लिखते समय जब हम
'फ़िलासफ़ी' को "f" से नहीं "ph" से लिखना याद रख सकते हैं, तो हिंदी में
लिखते समय यह क्यों नहीं याद रख सकते कि किस शब्द में नुक्ता लगाना है और
किस में नहीं?
और रहा प्रश्न कि "मानक उच्चारण/स्पेलिंग" क्या है कैसे पता चले, तो उसके
लिए शब्दकोष (dictionaries) हैं.
-UVR.
हालाँकि मैं कला का नहीं वरन सूचना प्रयौद्योगिकी का छात्र रहा हूँ, अपनी
सीमित जानकारी के आधार पर विवेचना समूह की निर्दिष्ट कार्यसूची की सीमा
में रहते हुए मेरा उत्तर निम्नवत है:
अंग्रेजीभाषिओं को गाँधी का उच्चारण गैंडी करते हुए देख कर हमारे चेहरे
पर सहसा मुस्कान उभर ही आती है ऐसा सिर्फ़ इसलिए है कि उनकी अंग्रेजी और
रोमन लिपि हमारी हिन्दी और देवनागरी लिपि की तरह समृद्घ नहीं है एवं रोमन
लिपि में ध आदि के उचित उच्चारण के लिए कोई पूर्व निर्धारित चिह्न नहीं
है। क्या आप उम्मीद करते हैं की रोमन लिपि में लिखी हिन्दी कभी भी
उच्चारण की दृष्टी से पूर्ण शुद्ध हो सकती है? मेरी जर्मन भाषा की
प्राध्यापिका कहा करती थीं : हिन्दी भाषी केवल देवनागरी लिपि का प्रयोग
करके दुनिया की हरेक भाषा लिख सकते हैं। इसमे मात्र कुछ अफ्रीकी आदिवासी
भाषाएँ ही अपवाद है जिन्हें देवनागरी तो क्या किसी भी अन्य लिपि का
प्रयोग करके लिख पाना अत्यंत कठिन है।
यदि हम फारसी मूल के शब्दों को अपना सकते है तो उनके उचित उच्चारण के लिए
ज़रूरी पैरों की बिन्दी (नुक्ते) को क्यों नहीं :-) ? उम्मीद है हिन्दी
अपने वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के अनुरूप नुक्ते, ऑ (जैसे डॉक्टर) आदि
को अपनाते हुए अपनी समृद्धि एवं विकासयात्रा को ज़ारी रखेगी।
प्रिय सुयश जी,
हिन्दी की प्रवृत्ति के अनुसार, हिन्दी में परम्परा से आगत (अर्थात्
संस्कृत मूल के ) शब्द और भाषा-सम्पर्क से आगत (अर्थात् विदेशी मूल के)
शब्द अपनी मूल वर्तनी को अधिकांशतः संरक्षित रखते हैं. इस प्रक्रिया में
जो थोडा-बहुत परिवर्तन होता है उसकी सकारणता भाषा में मिल जाती है. यह
सामान्य बात हुई.
अब विशेष बात. ’ज़’ और ’फ़’ युक्त सम्पर्कागत शब्दों को मूलवत् लिखा
जाए यह निर्णय , मेरी जानकारी में, हो चुका है.इसका अनुपालन होना उचित
है.
अच्छा हो, हिदीकर्मी आवश्यकता होने पर किसी स्तरीय हिन्दी-हिन्दी शब्दकोश
को देखने की आदत डालें. मेरी जानकारी और अनुभव में हिन्दी कोश आगत शब्दों
की मूल वर्तनी को प्रविष्ट करतॆ हैं. तदनुसार, क,ख,ग को भी नुक्ते के साथ
उन शब्दों में रखा गया है जिनमें ये वर्ण प्रयुक्त हुए हैं.
थोडी बहुत अस्पष्टता वर्तनी जैसी बातों में रहेगी. इसका व्यावहारिक समाधन
विकल्पों (प्रायः दो तक सीमित) को समाविष्ट करके किया जा सकता है. हिन्दी
कोश ऐसा करते हैं.
इस जानकारी को सबके साथ साझा करने के लिए मेरी सहमति है.
सुरेश कुमार
On 4 अप्रै, 17:58, Anunad Singh <anu...@gmail.com> wrote:
> मित्रों,
> मैं भी हर प्रकार के 'सुधार' और सकारात्मक परिवर्तन के पक्ष में ही खड़ा रहने
> वाला प्राणी हूँ। किन्तु मुझे नुक्ते के प्रयोग से लाभ मिलने वाला लाभ
> मिलीग्राम में और उससे होने वाली असुविधाएं किलोग्राम में दिख रही हैं।
>
> कुछ विद्वान मित्र कह रहे हैं कि कि दूसरे लोग अपनी लिपि और भाषा के साथ क्या
> करते/नहीं करते हैं , इससे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। मैं इसे नहीं मानता। इस
> ब्रह्माण्ड में जब कोई छोटा सा जीव सांस लेता है तो उसका हमारे उपर प्रभाव
> पड़ता है, भाषा तो बहुत बड़ी चीज है।
>
> भाषा और लिपि का राजनीति से घनिष्ट सम्बन्ध है। यह 'मजहब' (धर्म) से भी अधिक
> वास्तविक है। मजहब तो बनावटी चीज है; भाषा प्राकृतिक है, वास्तविक है। यदि यह
> नहीं होता तो 'ब्रिटिश काउन्सिल' के अस्तित्व का औचित्य क्या था? किस कारण
> 'नागरी आन्दोलन' चला? पाकिस्तान ने 'पूर्वी पाकिस्तान' के लोगों पर उर्दू भाषा
> और अरबी लिपि थोपने का असफल प्रयत्न क्यों किया? अंग्रेजी देश अपनी लिपि
> परिवर्तन का मुहुर्त क्यों नहीं निकाल पा रहे हैं? चीन, जापान, कोरिया आदि
> इतनी जटिल लिपि को क्यों ढोये जा रहे हैं। अरबी देश क्यों अन्य देशों से
> 'उल्टा' लिखे जा रहे हैं?
>
> ==============================================
> ३ अप्रैल २०१० ८:३७ PM को, कुटरियार_Kutariyar <kutari...@gmail.com> ने लिखा:
>
>
>
> > सुयश जी जानकारी के लिए कोटि कोटि धन्यवाद,
> > अनुनाद जी,
>
> > हालाँकि मैं कला का नहीं वरन सूचना प्रयौद्योगिकी का छात्र रहा हूँ, अपनी
> > सीमित जानकारी के आधार पर विवेचना समूह की निर्दिष्ट कार्यसूची की सीमा
> > में रहते हुए मेरा उत्तर निम्नवत है:
> > अंग्रेजीभाषिओं को गाँधी का उच्चारण गैंडी करते हुए देख कर हमारे चेहरे
> > पर सहसा मुस्कान उभर ही आती है ऐसा सिर्फ़ इसलिए है कि उनकी अंग्रेजी और
> > रोमन लिपि हमारी हिन्दी और देवनागरी लिपि की तरह समृद्घ नहीं है एवं रोमन
> > लिपि में ध आदि के उचित उच्चारण के लिए कोई पूर्व निर्धारित चिह्न नहीं
> > है। क्या आप उम्मीद करते हैं की रोमन लिपि में लिखी हिन्दी कभी भी
> > उच्चारण की दृष्टी से पूर्ण शुद्ध हो सकती है? मेरी जर्मन भाषा की
> > प्राध्यापिका कहा करती थीं : हिन्दी भाषी केवल देवनागरी लिपि का प्रयोग
> > करके दुनिया की हरेक भाषा लिख सकते हैं। इसमे मात्र कुछ अफ्रीकी आदिवासी
> > भाषाएँ ही अपवाद है जिन्हें देवनागरी तो क्या किसी भी अन्य लिपि का
> > प्रयोग करके लिख पाना अत्यंत कठिन है।
> > यदि हम फारसी मूल के शब्दों को अपना सकते है तो उनके उचित उच्चारण के लिए
> > ज़रूरी पैरों की बिन्दी (नुक्ते) को क्यों नहीं :-) ? उम्मीद है हिन्दी
> > अपने वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के अनुरूप नुक्ते, ऑ (जैसे डॉक्टर) आदि
> > को अपनाते हुए अपनी समृद्धि एवं विकासयात्रा को ज़ारी रखेगी।