Fwd: tachchhiilaadi pratyaya (1)

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narayan prasad

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Jan 3, 2007, 1:48:37 AM1/3/07
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From: narayan prasad <prasad...@yahoo.co.in>
Date: २००७ जनवरी ३ १२:०५
Subject: tachchhiilaadi pratyaya (1)
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तच्छीलादि अर्थों में धातुओं के साथ प्रयुक्त प्रत्यय
 
पाणिनीय व्याकरण "अष्टाध्यायी" में सूत्र ३.२.१३४ से लेकर ३.२.१७८ तक तच्छील-तद्धर्म-तत्साधु इन अर्थों में धातुओं के साथ कुछ प्रत्ययों का विधान किया गया है ।

तच्छील (तत्+शील) = ऐसा कार्य करना ही जिसका स्वभाव है अर्थात् बदले में बिना किसी वस्तु की अपेक्षा के जो ऐसा कार्य करता है

तद्धर्म (तत् +धर्म) = यह उसका कर्तव्य (duty) है , ऐसा सोचकर जो कार्य करता है

तत्साधु = इस कार्य को वह दक्षतापूर्वक कर सकता है अर्थात् इस कार्य को करने में वह दक्ष (expert ) है

कौन सा कार्य ? यह उस संगत (corresponding) धातु से व्यक्त होता है ।
 
यदि धातु (ह्रस्व या दीर्घ) इकार, उकार, ऋकार से अन्त होने वाले हों या यदि धातु लघु उपधा वाले हों (having short penultimate vowel ), तो इन स्वरों का गुण हो जाता है अर्थात् इकार के स्थान में एकार, उकार के स्थान में एकार, ऋकार के स्थान में अर् हो जाता है ।
 
यदि प्रत्यय में "ण्" या "ञ्" अनुबन्ध लगा हो तो धातु के अन्तिम (ह्रस्व या दीर्घ) इकार, उकार, ऋकार की वृद्धि हो जाती है अर्थात् इ के स्थान में ऐ, उ के स्थान में औ, ऋ के स्थान में आर् हो जाते हैं ।
 
यदि प्रत्यय में "क्" या "ङ्" अनुबन्ध (marker) लगा हो तो गुण-वृद्धि नहीं होते ।

कुछ मुख्य प्रत्यय नीचे दिये जाते हैं ।
 
३.२.१६७ नमि-कम्पि-स्म्यजस-कम-हिंस-दीपो रः ।
 
 नम् (झुकना), कम्प् (काँपना), स्मि (मुस्कराना), अजस् [अ (नहीं) +  जस् (छिन्न-भिन्न होना)], कम् (चमकना), हिंस् (हिंसा करना), दीप् (जलना , चमकना, जगमगाना) --- इन धातुओं से तच्छीलादि अर्थ में " र " प्रत्यय होता है ।
 
 नम्र = झुकना ही स्वभाव है जिसका
 हिंस्र = हिंसा करना ही स्वभाव है जिसका, हिंसक
 अजस्र = जो कभी छिन्न-भिन्न न होकर अनवरत चलता रहता है
 
३.२.१५८ स्पृहि-गृहि-पति-दयि-निद्रा-तन्द्रा-श्रद्धाभ्य आलुच् ।
 
स्पृह् (चाहना, लालायित होना), गृह् (ग्रहण करना), पत् (गिरना), दय् (दया करना), निद्रा (सोना), तन्द्रा (आलस्य करना), श्रद्धा (श्रद्धा रखना) -- इन धातुओं से तच्छीलादि अर्थों में "आलुच्" (=आलु) प्रत्यय होता है ।
 
यहाँ आलुच् प्रत्यय में "च्" अनुबन्ध है जो यद्यपि प्रत्यय का हिस्सा नहीं है, परन्तु यह निर्दिष्ट करता है कि प्रत्यय लगाने के बाद निर्मित शब्द अन्तोदात्त ( oxytone, i.e., last syllable accented) होगा ।
 
स्पृहयालु
गृहयालु
पतयालु
निद्रालु
तन्द्रालु
श्रद्धालु
 
शी (सोना) धातु से भी आलुच् प्रत्यय होता है --- शयालु
 
नोटः सदस्यों से अनुरोध है कि इस संदेश पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें ।
 
--- नारायण प्रसाद
 
 
 
 

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