Aviditasukhaduhkham nirgunam vastu kincit
Jadamatir iha kascin moksa ityacacakse
Mama tu matam anangasmerata runyaghurnan-
Madakalamadir aksi- nivimokso hi moksah
http://drisyadrisya.blogspot.com/2007/07/campus-samskritam.html
अविदितसुखदुःखं निर्गुणं वस्तु किञ्चित्
जडमतिरिह कश्चिन्मोक्ष इत्याचचक्षे।
मम तु मतमनङ्गस्मेरतारुण्यघूर्ण
प्रमुदितवनितानां नीविमोक्षो हि मोक्षः॥
Loo jurai, jurau!
Vaanijjam hoi, hou tam nama
Ehi! Nimajjasu pase,
Pupphavai! Na ei me nidda
संस्कृत काव्य बहुत कुछ आलंकारिक होता है और बहुधा अनेकार्थ भी । और यहाँ तो प्रस्तुत श्लोक के चतुर्थ पाद में पाठान्तर है । संस्कृत काव्य में मेरी गति नहीं ।
भगवद्गीता के अनुसार, मोक्ष का भागी वही हो सकता है जो सुख-दुःख, मान-अपमान, शत्रु-मित्र, निन्दा-प्रशंसा इत्यादि द्वन्द्वों में समत्व भावना प्राप्त कर चुका हो अर्थात् जो सुख प्राप्त होने पर प्रसन्न नहीं होता और दुःख में दुःखी नहीं होता ....। (देखें - भग॰ ६.७; १२.१७-१९)
---नारायण प्रसाद