kalidas, sringar tilak

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Agastya Kohli / अगस्त्य कोहली

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Aug 8, 2008, 2:41:03 AM8/8/08
to hi...@googlegroups.com
I've been looking for the following verse from "Sringar Tilak" (I believe its by Kalidasa). But I'm having trouble locating it in Devanagari. Obviously, written in roman, its hard to know what the Sanskrit verse really is. Any one know the verse (or have it in original) to transliterate accurately? thanks!


Aviditasukhaduhkham nirgunam vastu kincit

Jadamatir iha kascin moksa ityacacakse

Mama tu matam anangasmerata runyaghurnan-

Madakalamadir aksi- nivimokso hi moksah

रमण

unread,
Aug 9, 2008, 1:43:54 AM8/9/08
to हिंदी (Hindi)
I found the following book containing a part of the text:

http://books.google.com/books?id=pdxjAAAAMAAJ&q=Mama+tu+matam&dq=Mama+tu+matam&ei=Yy2dSLKVA4mkiwH1qaD6BA&pgis=1

Some of the text can be transliterated as below:

On Aug 8, 2:41 am, "Agastya Kohli / अगस्त्य कोहली"
<agast...@gmail.com> wrote:
> I've been looking for the following verse from "Sringar Tilak" (I believe
> its by Kalidasa). But I'm having trouble locating it in Devanagari.
> Obviously, written in roman, its hard to know what the Sanskrit verse really
> is. Any one know the verse (or have it in original) to transliterate
> accurately? thanks!
>
> Aviditasukhaduhkham nirgunam vastu kincit
अविदितसुखदुःखं निर्गुणं वस्तु किंचित्

> Jadamatir iha kascin moksa ityacacakse
जडमतिर् इह कश्चिन् मोक्ष इत्य चचक्षे
>
> Mama tu matam anangasmerata runyaghurnan-
ममतु मतं.....
>
> Madakalamadir aksi- nivimokso hi moksah
मद कल मदिरा अक्षी मोक्षो हि मोक्षः

narayan prasad

unread,
Aug 9, 2008, 3:10:33 AM8/9/08
to hi...@googlegroups.com
<< Any one know the verse (or have it in original) to transliterate accurately? >>

http://drisyadrisya.blogspot.com/2007/07/campus-samskritam.html

अविदितसुखदुःखं निर्गुणं वस्तु किञ्चित्‌
जडमतिरिह कश्चिन्मोक्ष इत्याचचक्षे।
मम तु मतमनङ्गस्मेरतारुण्यघूर्ण
प्रमुदितवनितानां नीविमोक्षो हि मोक्षः॥


---Narayan Prasad
 
Note: The text with the sandhi removed and the components of compound words hyphenated for easiness in understanding would look like this:

अविदित-सुख-दुःखं निर्गुणं वस्तु किञ्चित्‌
जडमतिः इह कश्चित् मोक्षः इति आचचक्षे।
मम तु मतम् अनङ्ग-स्मेर-तारुण्य-घूर्ण-
प्रमुदित-वनितानां नीवि-मोक्षः हि मोक्षः॥
 
 
2008/8/9, रमण <raman...@gmail.com>:

Anunad Singh

unread,
Aug 9, 2008, 6:31:56 AM8/9/08
to hi...@googlegroups.com
नारायण जी,

इसका देवनागरीकरण हो गया तो  हिन्दीकरण  करना भी उपयोगी रहेगा।   यह भी जानने की इच्छा है कि किसकी रचना है और सन्दर्भ क्या है।



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2008/8/9 narayan prasad <hin...@gmail.com>

Agastya Kohli / अगस्त्य कोहली

unread,
Aug 9, 2008, 4:04:19 PM8/9/08
to hi...@googlegroups.com
धन्यवाद नारायण जी।

एक कवित्त और है - यदि कोई इसे भी ढूँढ़ पाए या (शुद्ध) देवनागरीकरण कर पाए तो आभारी होऊँगा।  जहाँ तक मुझे पता लगा है, महाकवि हाल की गाथा सप्तशती (महाराष्ट्री प्राकृत) का अंश है -


Loo jurai, jurau!

Vaanijjam hoi, hou tam nama

Ehi! Nimajjasu pase,

Pupphavai! Na ei me nidda

narayan prasad

unread,
Aug 10, 2008, 10:43:16 AM8/10/08
to hi...@googlegroups.com
अनुनाद जी,
      शृंगारतिलकम् कालिदास रचित बयाया जाता है, परन्तु यह कालिदास वह कालिदास नहीं है जिसने रघुवंशम् और कुमारसम्भवम् काव्यों की रचना की है ।
   मैंने शृंगारतिलकम् नामक पुस्तक देखी नहीं । अतः यह बता नहीं सकता कि निम्नलिखित श्लोक का सन्दर्भ क्या है ।

अविदित-सुख-दुःखं निर्गुणं वस्तु किञ्चित्‌
जडमतिः इह कश्चित् मोक्षः इति आचचक्षे।
मम तु मतम् अनङ्ग-स्मेर-तारुण्य-घूर्ण-
प्रमुदित-वनितानां नीवि-मोक्षः हि मोक्षः॥
   या
मद-कल-मदिरा-अक्षी नीवि-मोक्षः हि मोक्षः॥

   संस्कृत काव्य बहुत कुछ आलंकारिक होता है और बहुधा अनेकार्थ भी । और यहाँ तो प्रस्तुत श्लोक के चतुर्थ पाद में पाठान्तर है । संस्कृत काव्य में मेरी गति नहीं ।

  जिस कड़ी की सहायता से मैंने श्लोक उद्धृत किया उस श्लोक के चतुर्थ पाद का शाब्दिक अर्थ लिया जाय तो कुछ अश्लील अर्थ भी निकाला जा सकता है । रमण जी द्वारा दी गयी कड़ी के श्लोक का चतुर्थ पाद थोड़ा बेहतर दिखता है । खैर, प्रस्तुत श्लोक का भावार्थ कुछ इस प्रकार दिया जा सकता है -

"मोक्ष अविदित सुख-दुःख वाली कोई निर्गुण वस्तु है ऐसा किसी जड़मति ने कहा (है / होगा) । मेरा तो मत है कि अनंग (कामदेव) पीड़ित कामुका स्त्री के नेत्र-बाणों से मोक्ष मिलना ही मोक्ष है ।"

भगवद्गीता के अनुसार, मोक्ष का भागी वही हो सकता है जो सुख-दुःख, मान-अपमान, शत्रु-मित्र,  निन्दा-प्रशंसा इत्यादि द्वन्द्वों में समत्व भावना प्राप्त कर चुका हो अर्थात् जो सुख प्राप्त होने पर प्रसन्न नहीं होता और दुःख में दुःखी नहीं होता ....। (देखें - भग॰ ६.७; १२.१७-१९)

---नारायण प्रसाद



2008/8/9, Anunad Singh <anu...@gmail.com>:

Agastya Kohli / अगस्त्य कोहली

unread,
Aug 10, 2008, 3:00:07 PM8/10/08
to hi...@googlegroups.com
नारायण / अनुनाद जी,

आज कल मैं एक नाटक पढ़ रहा हूँ जिसमें संस्कृत की चार/पाँच प्रेम-कविताओं का संदर्भ है - उन्हीं में से एक यह है, और दूसरी हाल की पंक्तियाँ हैं। प्रेम कविताएँ होने के नाते, इन में जो भाव व्यक्त किये गए हैं, वे गीता अथवा और किसी भी आध्यात्मिक ग्रंथ से शायद ही सहमत हों। किंतु हर बार जब मुझे संस्कृत में इस प्रकार की रचनाएँ मिलती हैं, तब याद हो आता है कि संस्कृत केवल आध्यात्म या धर्म की भाषा नहीं है। यह जीती जागती भाषा है (थी?) जिसमें हर मानवी भाव व्यक्त किया जाता रहा है। जो बातें अब हमें 'अश्लील' भी लग सकती हैं, वे भी "देवों की भाषा" में लिखी और कही गयी हैं।

मैं यह नहीं कह सकता कि इन कविताअों को तब भी उस समाज में कोई सम्मान से ग्रहण करता था या वे भी इन्हें अश्लील ही मानते थे, पर संस्कृत साहित्य का एक अंग तो ये फिर भी हैं ही, अौर शायद उस समय के समाज में क्या स्वीकार्य था अौर क्या नहीं, इस का कुछ आभास भी देती हैं।

महाकवि हाल की जो पंक्तियाँ मैंने कल भेजी थीं, क्या वे देवनागरी में अभी तक किसी को मिली हैं?

सादर,

अगस्त्य

2008/8/10 narayan prasad <hin...@gmail.com>
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