श्री हरिकोटा का सफर

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Jul 17, 2006, 12:43:46 PM7/17/06
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श्री हरिकोटा का सफर
- एच.आर.सुधीन्द्र

पुलीकैट झील के पार श्री हरिकोटा (शार) जाने वाली सड़क हमें भारतीय अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के प्रक्षेपण पैड (स्थल) तक ले जाती है। यह हमें अपनी जानी-पहचानी दुनिया से एक ऐसी दुनिया की ओर ले जाती है जो राकेटों और उपग्रहों से जुड़ी है। यहां आकर हम लांच पैड, यान असेम्बली इमारतों, अंतरिक्ष यान परीक्षण केन्द्रों और मिशन नियंत्रण केन्द्र के जादुई संसार में पहुंच जाते हैं। आंध्र प्रदेश के पूर्वी तट पर तकले के आकार के द्वीप श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र (एसडीएससी), भारत का अंतरिक्ष प्रक्षेपण स्टेशन है।

       पुलीकैट झील और बंगाल की खाड़ी से घिरे हुए इस द्वीप का चयन 1969 में उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए चुना गया। प्रक्षेपण स्टेशन बनाने के लिए, आबादी से दूर, भू-मध्य रेखा से इसकी निकटता को उपयुक्त माना गया  और सुरक्षित क्षेत्र के रूप में चुना गया। करीब 50 किलोमीटर तटीय रेखा इस द्वीप का कुल क्षेत्रफल 175 वर्ग किलोमीटर है। आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले के छोटे से शहर सुल्लुरपेटा से कुछ हटकर बसे इस स्थान पर चेन्नई, कोलकाता राष्ट्रीय राजमार्ग से 20 मिनट की वाहन यात्रा कर पहुंचा जा सकता है। चेन्नई से इसकी दूरी करीब 80 कि0मी0 है। यहां पर पहला परीक्षण 9 अक्तूबर, 1971 की रोहिणी- 125 नाम के छोटे से आवाज करने वाले राकेट का हुआ था। तब से यहां पर अनेक सुविधाओं का विस्तार किया गया है, जिससे कि यह भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की बढती अावश्यकताओं के अनुरूप काम कर सके।

       शार की सुविधाओं और व्यवस्थाओं का भ्रमण नि:संदेह स्मरणीय, महत्वपूर्ण और विशाल अनुभव है। एक ऐसा अनुभव जो जीवन भर याद रहे। शार की अनूठी विशेषताओं में 70 मीटर ऊंचा लांच टावर, 83 मीटर ऊंचा यान असेम्बली भवन, उड़ान के लिए तैयार उपग्रह प्रक्षेपण यान-मोबाइल लांच पेडस्टल को खींचने वाली 16 पहियों वाली बोगी, 120 मीटर ऊंचे तड़ित (आसमानी बिजली) संरक्षण मीनारें, 12 मीटर चौड़ा और साढे ग्यारह मीटर गहरा जेट डिपऊलेक्टर वेज और 34 पर्सनल कम्प्यूटरों के साथ-साथ मिशन नियंत्रण केन्द्र के विशाल मानीटर्स शामिल हैं।

सुविधाएं और गतिविधियां

       शार में पृथ्वी के निम्न कक्ष ध्रुवीय कक्ष, और भू-स्थैतिक अंतरण कक्ष में उपग्रह भेजने की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं। प्रक्षेपण परिसरों में यान असेम्बली, चेक आउट और  प्रक्षेपण अभियानों की सार संभाल के अलावा ईंधन भरने का काम होता है। यहां पर पृथ्वी के वातावरण के अध्ययन के लिए ध्वनि करने वाले राकेटों के प्रक्षेपण की भी सुविधाएं उपलब्ध हैं। लांच पैड पर एक-दूसरे से जोड़े जाने के लिए भेजने से पूर्व यहां पीएसएलवी (ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान), जी.एस.एल.वी.  (भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान) और उनकी उप प्रणालियों तथा अंतरिक्ष यानों की अलग-अलग कार्यशालाओं में पूरी जांच की जाती है। प्रणोदक उत्पादन संयंत्र की क्षमता 2.8 मीटर व्यास तक के राकेट मोटरों को तैयार करने की है। कंपन, धक्का, गति को तेज करने तथा तापीयआर्द्रता के परीक्षण की सुविधाएं भी यहां मौजूद हैं।

       प्रक्षेपण परिसर से करीब 6 कि0मी0 दूर स्थित मिशन नियंत्रण केन्द्र उपग्रह को कक्षा में छोड़े जाने से पहले उल्टी गिनती के चरण में उसके प्रक्षेपण संबंधी सभी कार्यों को संचालित करता है। उसके बाद का सारा नियंत्रण कर्नाटक के हासन स्थित मास्टर कंट्रोल सुविधा अथवा इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) के बंगलौर स्थित दूरमापी धावनपथ और निर्देशन सुविधा के हाथ चला जाता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उपग्रह संचार अथवा सुदूर संवेदी उद्देश्यों, किसके लिए हैं। शार के सामरिक ठिकानों में सीसीटीवी (क्लोज्ड सकिर्ट टेलीविजन) कवरेज की सुविधा भी है। बातचीत (दूरसंचार) के लिए इंटरकाम भी उपलब्ध है। परियोजना गतिविधियों के संचालन और संधारण के साथ-साथ शार में संरचनात्मक इंजीनियरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्प्यूटर सॉपऊटवेयर जैसे विषयों में शोध एवं विकास का कार्य भी होता है। इस केन्द्र में विकसित अनेक प्रौद्योगिकियों को व्यावसायिक उपयोग के लिए उद्योगों को दिया गया है।

उपग्रह प्रक्षेपण यान

       भारत ने दो प्रकार के उपग्रह प्रक्षेपण यानों की रूपरेखा तैयार कर उनको प्रचालित किया है। इनमें से एक है ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी), जिससे भारतीय सुदूर संवेदी उपग्रह प्रक्षेपित किए जाते हैं और दूसरा भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी) जिससे इन्सैट परिवार के उपग्रह छोड़े जाते हैं। पीएसएलवी के चार चरण होते हैं और यह 1600 कि0ग्रा0 भार का उपग्रह ध्रुवीय कक्षा में प्रस्थापित कर सकता है। ध्रुवीय कक्षाएं 600 से 1000 कि0मी0 के बीच कम ऊंचाई पर होती है। जिनसे धरती का सूक्ष्म अनुवीक्षण किया जा सके। इन कक्षाओं को सूर्य-समकालिक कक्षाएं कहा जाता है क्योंकि इनमें उपग्रहों को किसी निश्चित स्थान पर स्थानीय समयानुसार निश्चित समय पर गुजारा जा सकता है। इससे स्थिर सूर्य प्रकाश में चित्र लेने में उपग्रहों को मदद मिलती है। पीएसएलवी उपग्रहों को भू-स्थैतिक अंतरण कक्षा और पृथ्वी की निम्न कक्षाओं में प्रस्थापित कर सकता है। भारत के पास सर्वाधिक सुदूर संवेदी उपग्रहों का समूह है। भारत का प्रथम चन्द्र अभियान चन्द्रयान-1 (प्रथम) जो 2008 में छोड़ा जाएगा, पीएसएलवी से ही प्रक्षेपित होगा।

      जीएसएलवी दो हजार किलोग्राम भार के उपग्रह को भू-स्थैतिक अंतरण कक्षा में प्रक्षेपित कर सकता है। उसके बाद अंतरिक्ष यान 36 हजार कि0मी0 की ऊंचाई पर भू-स्थैतिक कक्षा में पहुंच जाता है। यह एक तीन चरणों वाला यान होता है। तीसरे चरण में एक क्रायोजेनिक इंजन लगा होता है। इस इंजन में तरल हाइड्रोजन का प्रयोग ईंधन के रूप में और तरल आक्सीजन का आक्सीकारक के रूप में किया जाता है।

       भारत जीएसएलवी मार्क-3 नाम के एक नए प्रक्षेपण यान का विकास कर रहा है जो 4 टन तक के भार को भू-स्थैतिक अंतरण कक्षा में प्रक्षेपित कर सकता है। मार्क-3 कार्यक्रम के समर्थन के लिए, एसडीएससी, शार में नई सुविधाएं जुटाई जा रही हैं। उन्नत सुविधाओं से प्रतिवर्ष 4 प्रक्षेपण किए जा सकेंगे। जीएसएलवी मार्क-3 का उड़ान भरते समय वजन 629 टन का होगा और यह 42.4 मीटर ऊंचा होगा। इसरो ने स्पेस कैप्सूल रिकवरी एक्सपोर्टमेंट - एसआरई (अंतरिक्ष कैप्सूल पुन: प्राप्ति प्रयोग) की शुरूआत कर अपनी गतिविधियों में एक नया आयाम जोड़ा है। एसआरई का उद्देश्य प्रक्षेपित  भार (सामग्री) (पेलोड) को सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाना है। कैप्सूल को पुन: प्राप्त करने की प्रौद्योगिकी बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे लागत में कमी आती है और पुन: प्राप्त प्रणाली का दोबारा उपयोग हो सकता है। कार्यक्रम के तहत हवा में गिराने (एयरड्राप) और पुन: प्राप्त करने के कुछ परीक्षण एसडीएससी, शार में सफलतापूर्वक किए जा चुके हैं।

       भारतीय अंतरिक्ष प्रणाली आज राष्ट्रीय अधोसंरचना का महत्वपूर्ण अवयव बन गई है। दूरसंचार, दूरदर्शन (टेलीविजन) प्रसारण, मौसम विज्ञान, आपदा चेतावनी, दूर चिकित्सा, प्राकृतिक संसाधन सर्वेक्षण और प्रबंधन, दूरवर्ती शिक्षा और खोजबीन तथा बचाव अभियान जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं की कल्पना भी बिना अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के हस्तक्षेप के नहीं की जा सकती। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी ने भारत को विश्व में ऊंचा स्थान दिलाया है। इसमें सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र, श्रीहरिकोटा की भूमिका अनूठी और अमूल्य है।

सूचना सहायक, पत्र सूचना कार्यालय, बंगलौर

 

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