जड़ी-बूटियां- एक अनमोल संसाधन
डॉ0 एम.ए.हक*
निदेशक- पर्यावरण एवं वन मंत्रालय
भारत एक विशाल जैव-विविधता वाला देश है। भारत में कुल भूमि का मात्र दो प्रतिशत क्षेत्र है, लेकिन इस धरती पर जितनी जैव विविधता है उसका 8 प्रतिशत भारत में है। भारत में सभी तरह की प्राकृतिक और कृषि-जलवायु संबंधी परिस्थितियां हैं। जैव-भौगोलिक दृष्टि से भारत की ऐसी स्थिति है कि यहां पर सभी तरह की प्राकृतिक स्थितियां पाए जाते हैं। देश में 420 से अधिक जीव-समूह हैं जिनके कारण भारत पौधों की उत्पति संबंधित संसाधनों का विशाल केन्द्र बन गया है।
यह समृध्द जैव-विविधता जड़ी-बूटियों में भी दिखाई देती है। अनुमानों के अनुसार भारत में लगभग 15 हजार किस्म की जड़ी बूटियां हैं जिनमें चैकित्सिक गुण हैं। इस समय इनमें से 8 हजार जड़ी बूटियां उपयोग में लाई जा रहीं हैं। ये है - आयुर्वेद चिकित्सा- 1769 किस्में, सिध्द चिकित्सा-1121 किस्में, यूनानी चिकित्सा- 751 किस्में, आमची या तिब्बती चिकित्सा-279 किस्में, लोक चिकित्सा- 4671 किस्में।
भारतीय परंपरा
भारत में चिकित्सा में जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करने की परम्परा लगभग 4000 वर्ष पुरानी है। यहां तक कि अभी भी देश में लाखों-करोड़ों लोग इस परम्परा पर निर्भर करते हैं। इसमें दो प्रकार की पध्दतियां हैं- एक संहिताबध्द चिकित्सा पध्दति और दूसरी लोक चिकित्सा पध्दति। लोक चिकित्सा पध्दति देशभर में जनजातीय समुदायों द्वारा व्यवहार में लाई जाती है। पीढी-दर-पीढी मौखिक रूप से यह पध्दति आगे चलती आ रही है। संहिताबध्द पध्दतियों में आयुर्वेद, सिध्द, यूनानी और तिब्बती पध्दतियां हैं। बीमारियों के उपचार के लिए, रोगों से मुक्ति के लिए और स्वस्थ्य जीवन के लिए इन सभी चिकित्सा पध्दतियों में पौधों और जड़ी-बूटियों का निश्चित रूप से उपयोग होता रहा है।
यदि हम आयुर्वेद को देखें, तो विभिन्न ग्रन्थों में लगभग 1400 जड़ी-बूटियों का उल्लेख है। चरक संहिता,सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय में 600 से भी अधिक जड़ी-बूटियों का संग्रह है। त्रऽग्वेद संभवत: सबसे प्राचीन ग्रन्थ है, जिसमें औषधियों वाले पौधों का वर्णन आता है। अथर्ववेद उससे बाद का है। उसमें भी बड़ी संख्या में जड़ी-बूटियों के औषधीय गुणों का वर्णन है। एक और ग्रन्थ-द्रव्यगुण शास्त्र में औषध विज्ञान की दृष्टि से जड़ी-बूटियों के बारे में जानकारी है। इसी प्रकार भारत में प्रचलित यूनानी और अन्य चिकित्सा पध्दतियां भी बहुत सीमा तक औषधीय जड़ी-बूटियों पर निर्भर हैं। जड़ी-बूटियों से निर्मित औषधियों की व्यापक मान्यता के पीछे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से मादक प्रभाव नहीं होता और न ही कोई अन्य प्रतिकूल प्रभाव होता है।
चिकित्सा की भारतीय पध्दतियों में संतुलित आहार पर पर्याप्त जोर दिया जाता है और रोगों के प्रति प्रतिरोधी क्षमता बढाने के लिए आहार में कुछ विशेष प्रकार की वस्तुओं को शामिल किया जाता है। औषधीय गुणों वाले पौधों के उत्पाद भी आहार में शामिल किये जाते हैं। उदाहरण के लिए इन सभी पध्दतियों में रेशेदार भोजन और चोकर पर जोर दिया जाता है। अब यह प्रमाणित हो गया है कि भोजन में चोकर की कमी के कारण कब्जी हो जाती है, जिससे कैंसर सहित कई तरह की समस्याएं पैदा हो जाती हैं। इसी प्रकार रोजमर्रा के भोजन में सब्जियों और फलों को शामिल करने पर भी जोर दिया गया है। आधुनिक अनुसंधान से प्रमाणित हो गया है कि इनमें विटामिनो और खनिजों की प्रचुर मात्रा है, जिनसे शरीर को संक्रमण और रोगों से लड़ने में शक्ति मिलती है। यहां तक कि मसालों में भी औषधीय गुण पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए पहाड़ी मिर्च, लहसुन, हल्दी, प्याज, अदरक, काली मिर्च, दालचीनी, कढी पत्ता आदि में ऐसे औषधीय गुण हैं, जिनसे स्वास्थ्य संबंधी विभिन्न समस्याओं का मुकाबला करने और कई तरह के रोगों का इलाज करने में सहायता मिलती है।
लोक चिकित्सा (घरेलू चिकित्सा) पध्दतियों में भी औषधीय गुणों, भोजन और पौष्टिकता के लिए पौधों का उपयोग किया जाता है। वनों में या वनों के आसपास तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग आसपास के क्षेत्रों में या जंगलों मे उपलब्ध कई प्रकार के पौधों के उत्पादनों का इस्तेमाल करते हैं। इसी प्राचीन परम्परा के कारण लोग सामान्य तौर पर स्वस्थ जीवन व्यतीत करते आ रहे हैं, हालांकि गरीबी या अन्य कारणों से उनके भोजन में कुछ कमी रह जाती है। उदाहरण के लिए बेल एक जंगली उत्पाद है और गांवों के आसपास भी पैदा होता है। लोग खुराक के तौर पर इसक गूंदे का इस्तेमाल करते हैं। आधुनिक शोध ने साबित कर दिया है कि इसमें टैनिन (चर्म शोधन क्षमता) और लासा की प्रचुर मात्रा होती है। यह बहुत ही पौष्टिक होता है और पाचन शक्ति में सहायक होता है। फलों के गूदे से हैजा, दस्त आदि को नियंत्रण में रखने मे सहायता मिलती है। इससे उदर, जिगर और हृदय को ताकत मिलती है। इसी प्रकार आंवले का इस्तेमाल चटनी, अचार या मुरब्बे में किया जाता है। चरक संहिता में इसे बहुत ही स्फूर्तिदायक बताया गया है। आधुनिक अध्ययनो से भी प्रमाणित हो गया है कि आंवले में प्रचुर मात्रा में विटामिन सी और पैक्टिन (कंकतांग) होता है, जिसमें सेब के मुकाबले 150 गुणा से भी अधिक विटामिन सी होता है। फलों में भी टैनिन होता है, जिससे भंडारण और प्रसंस्करण के दौरान विटामिन सी की रक्षा होती है। आंवले के पैक्टिन से कोलेस्ट्रोल कम होता है और बिम्बबाणुओं के जुड़ाव को रोकता है, जिससे हृदय को सुरक्षा मिलती है। फलों से रक्त निर्माण में सहायता मिलती है और जिगर ठीक रहता है। पाचन शक्ति में सहायता मिलती है तथा अम्लता (ऐसीडिटी) नियंत्रित रहती है। आंवला आयु के प्रभाव को रोकने में भी गुणकारी है। यह खराब ऊतकों के स्थान पर नए ऊतक बनाने में सहायक है।
एक और उपयोगी वस्तु है इमली। इमली का इस्तेमाल कढी, चटनी आदि में होता है। इसके गूदे का सीधे इस्तेमाल होता है। कच्चे फलों का इस्तेमाल आहार के संरक्षण के लिए किया जाता है। गूदे में काफी मात्रा में लौह, कैल्शियम, पोटेशियम फास्फोरस, रिबोपऊलेविन, थियामिन, नियासिन, कोर्बोहाइड्रेट, फाइबर चीनी आदि होते है। हरे फलों में भी विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में होता है। फलों में और वृक्ष के अन्य भागों में ग्लाइकोसाइड और कुछ क्षारीय तत्व होते हैं। इसी प्रकार भोजन में प्याज, लहसुन, हल्दी, अदरक आदि के इस्तेमाल से कई तरह की समस्याओं से रक्षा होती है। भारतीय चिकित्सा पध्दतियों और लोक चिकित्सा पध्दतियों के योगदान को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी स्वीकारा है।
औषधीय जड़ी-बूटियां और उद्योग
देश में औषधीय जड़ी-बूटियों पर आधारित जो उद्योग हैं, उनका वार्षिक व्यवसाय 42 अरब रुपए का है और हर साल इसमें लगभग 20 प्रतिशत वृध्दि का अनुमान है। देश में सैकडों विनिर्माता और निर्यातक हैं, जो इससे लाभ उठा रहे हैं और बड़ी संख्या में लोगों को इन गतिविधियां से प्रत्यक्ष और अप्रत्य रूप से रोजगार मिला हुआ है।
औषधीय जड़ी-बूटियों को खतरा
लगभग 800 से 900 औषधीय जड़ी-बूटियां ऐसी हैं, जिनका अखिल भारतीय स्तर पर व्यापार होता है। इनमें से लगभग 700 वनों से प्राप्त होती हैं और अधिकतर की फसलें बड़ी मात्रा में उगाई जाती है। जैसे नीम, सेना, आंवला,अशोक, हरड़, गुलंचा, खस, अश्वगन्धा, सर्पगन्धा आदि। सीमा से अधिक और गैर-वैज्ञानिक तरीकों से फसल लेने के कारण कई जड़ी-बूटियों के लिए खतरा पैदा हो गया है। यह बहुत संभव है कि बहुत जल्दी ये जड़ी-बूटियां लुप्तप्राय: हो सकती हैं। ऐसी औषधीय जड़ी-बूटियों की सूची काफी लम्बी है, जिनके लुप्त होने का कम या ज्यादा खतरा है। इनमें से कुछ हैं-वाचा, बेल, झार-हल्दी, करिहारी, अमृतपाला, चम्पा, पीपली, सर्पगन्धा, अशोक, अर्जुन आदि। वालक नामक का एक पौधा ऐसा है, जो पहले जंगलों में मिलता था, लेकिन अब कहीं दिखाई नहीं देता।
औषधीय जड़ी-बूटियों के संरक्षण के प्रयास
वनों से प्राप्त 29 प्रकार के पौधों, पौधों के हिस्सों और उनके उत्पादों तथा अर्कों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा हुआ है। हालांकि इनसे बनी औषधियों पर प्रतिबंध नहीं है। एक राष्ट्रीय औषधि जड़-बूटी बोर्ड का गठन किया गया है। केन्द्रीय बोर्ड ने पहले चरण में विकास और संवर्ध्दन के लिए 28 पौधों की किस्मों को चुना है। औषधीय जड़ी-बूटियो के उत्पादन के लिए प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है, ताकि केवल वनो पर ही निर्भरता न रहे। राज्यों में भी इसी तरह के बोर्डों का गठन किया जा रहा है।
देश में 91 राष्ट्रीय पार्क और 506 वन्व प्राणी विहार हैं, जिनका क्षेत्र देश के
भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 4.8 प्रतिशत है। राष्ट्रीय पार्कों
और वन्य प्राणी विहारों का मुख्य उद्देश्य वन्य प्राणियों की रक्षा करना है,
लेकिन जब एक बड़े क्षेत्र की रक्षा होती है तो वहां पर मौजूद सभी
प्रकार की वनस्पति की भी रक्षा होती है, जिससे औषधीय
जड़ी-बूटियों का भी संरक्षण होता है। इसी प्रकार
बॉटनीकल गार्डन्स हैं, जो औषधीय पौधों सहित कई प्रकार के पौधों का संरक्षण करते हैं । एक और प्रयास है-जीवमंडल
विहारों का घोषित करना। इस प्रयास के अन्तर्गत
प्राकृतिक स्थलों और समृध्द जैव- विविधता वाले क्षेत्रों के संरक्षण में
सहायता मिलती है।
वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम का 1991 में संशोधन करके इसमें कुछ विशिष्ट पौधों को भी शामिल किया गया है। अधिनियम में शिक्षा, अनुसंधान या वनस्पति संग्रहालय की आवश्यकता के अलावा वनों से या कुछ निर्दिष्ट क्षेत्रों से विशेष प्रकार के पौधों के इकट्ठा करने पर प्रतिबंध लगाया गया है।
एक और प्रयास औषधीय जड़ी-बूटियों में समृध्द वन क्षेत्रों को औषधीय जड़ी-बूटी संरक्षण क्षेत्र घोषित करना है, जिनको कानूनी संरक्षण प्रदान किया गया है। इन क्षेत्रों से पौधों और जड़ी-बूटियों को व्यापार के लिए इकट्ठा नहीं किया जा सकता। इस समय ऐसे 55 क्षेत्र हैं, जो औषधीय जड़ी-बूटियां संरक्षण क्षेत्र कहलाते हैं।
देश के अन्दर महत्वपूर्ण औषधीय और सुगन्धित पौधों के संरक्षण और संवर्ध्दन के लिए चार राष्ट्रीय जीन बैंक भी बनाए गए हैं। इन बैंकों में पौधों को, उनके बीजों को और जीन-पदार्थों को विशेष सुरक्षित परिस्थितियों में रक्षा जाता है।
जैव विविधता कानून देश के अन्दर समृध्द जैव-विविधता और सम्बध्द ज्ञान के संरक्षण के लिए जैव विज्ञान विविधता अधिनियम-2002 बनाया गया। इसके अन्तर्गत राष्ट्रीय जैव-विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव-विविधता बोर्डों और स्थानीय निकायों में जैव-विविधता प्रबंधन समितियों के गठन का प्रावधान है। जैव-विविधता के संसाधनों और इससे संबंधित जानकारी का इस्तेमाल करने के लिए विदेशी नागरिकोंसंगठनों को राष्ट्रीय जैव-विविधता प्राधिकरण की पूर्वानुमति लेनी होती है। किसी भी पौधे या जड़ी-बूटी का व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल करने से पहले भारतीय उद्योगों को राज्य जैव-विविधता बोर्डों को पूर्व सूचना देनी होती है। बोर्ड चाहे तो उनकी इस गतिविधि पर रोक लगा सकते हैं। भारतीय नागरिक, वैद्य, हकीम आदि अपने इस्तेमाल के लिए या औषधियां तैयार करने के लिए और अनुसंधान के लिए बेरोकटोक इन संसाधनों का इस्तेमाल कर सकते हैं। देश के अन्दर औषधीय जड़ी-बूटियों से संबंधित जो परम्परागत ज्ञान उपलबध है, उसका दस्तावेज बनाने के लिए एक परम्परागत ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी भी बनाई जा रही है। (पसूका)