राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में पशुधन
की महत्वपूर्ण भूमिका
राकेश शर्मा निशीथ
सिंधु घाटी की खुदाई से प्राप्त तथ्यों के आधार से स्पष्ट होता है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था में पशुधन का महत्व प्राचीन काल से चला आ रहा है । भारतीय मनीषियों ने पशुओं के संरक्षण तथा पशु-पूजा का नियम बनाया था, जो वर्तमान समय तक चला आ रहा है । विश्व की कुल पशु संख्या का 19 प्रतिशत भारत में है । पशु संख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में प्रथम स्थान है, जबकि पशु घनत्व की दृष्टि से द्वितीय स्थान पर है । पशुओं की बढती संख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत के पास व्यापक क्षमता है ।
महत्व
पशुधन आर्थिक विकास में अनेक तरह से अपनी भूमिका निभाता है। देश के लगभग 70 करोड़ व्यक्ति कृषि पर निर्भर हैं । इनमें से लगभग 7 करोड़ कृषकों द्वारा पशुपालन किया जाता है। देश में कृषि उत्पादन में पशुपालन का योगदान 30 प्रतिशत है । ग्रामीणों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में पशुपालन काफी सहायक है। एक अनुमान के अनुसार कृषि में पशुश्रम का कुल मूल्य 300 से 500 करोड़ रुपये है । पशुओं के गोबर से खाद प्राप्त होती है। उनके सींग, खुर एवं हड्डियों का चूर्ण बनाकर कई तरह से उपयोग किया जाता है । ग्रामीण क्षेत्रों में यातायात के लिए पशुओं का विशेष उपयोग किया जाता है । एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में लगभग 1.5 करोड़ बैलगाड़ियां हैं । अनेक उद्योगों की आधारशिला भी पशुओं पर निर्भर करती हैं, जैसे - चमड़ा उद्योग, ऊनी उद्योग, वस्त्र उद्योग, मांस उद्योग, डेरी उद्योग आदि मुख्य हैं । भारत में विशेष तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में यातायात के लिए पशुओं का विशेष उपयोग होता है ।
पशुओं से हमें विदेशी मुद्रा अर्जन करने में भी विशेष सहायता मिलती है । हमारी राष्ट्रीय आय में पशुधन का विशेष योगदान है । कुल राष्ट्रीय आय का लगभग 10 प्रतिशत हमें पशुधन से प्राप्त होता है । देश में प्रोटीन की आवश्यकता पूरा करने में दूध, अंडे और मांस का योगदान है । दूध की पैदावार के मामले में भारत आज दुनिया में शीर्ष स्थान पर है । गाय का दूध अमृत के समान तथा बकरी का दूध औषधि तुल्य माना जाता है। वर्ष 1950-51 में दूध का उत्पादन मात्र एक करोड़ 70 लाख टन था, जो वर्ष 2002-03 में बढक़र 8 करोड़ 67 लाख टन हो गया है । पशुपालन तथा इससे संबंधित उत्पादों के निर्यात से होने वाली आय में काफी वृध्दि हो रही है । 1991 में पशुधन और उससे सम्बध्द उत्पादों से 59500 लाख रुपये का निर्यात हुआ, जबकि वर्ष 1996-97 में यह बढक़र 192500 लाख रुपये हो गया था ।
पशुधन की गणना
वर्ष 1951 में पशुधन की कुल संख्या 27 करोड़ 30 लाख थी । वर्ष 1996 में की गयी पशु गणना के अनुसार भारत में गाय, भैंस, ऊंट, बकरी एवं मुर्गा-मुर्गी की संख्या क्रमश: 19.6,8.0, 1.5, 4.5, 12.0 एवं 61.9 करोड़ है । भारत में प्राप्त कुल पशु संख्या का 69 प्रतिशत कृषि में काम आने वाले बैल, ऊंट आदि पशु हैं एवं 31 प्रतिशत दुधारू पशु हैं।
देश और 28 राज्यों तथा केन्द्र शासित प्रदेशों की संयुक्त पशुधन की गणना की अनंतिम रिपोर्ट के अनुसार देश में 48.5 करोड़ पशुधन हैं । यह गणना सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में एक वर्ष के रिकार्ड समय में की गई है और इसकी संदर्भ तिथि 15 अक्तूबर, 2003 रखी गई है। इस गणना के दौरान ग्रामीण और शहरी सभी घरों से पशुओं, भैंसों, भेड़ों, बकरियों, सूअरों और अन्य पशुओं के बारे में आंकड़े एकत्र किये गए हैं। संकर नस्ल के पशुओं की संख्या में 1997 से लेकर 2003 के दौरान 22.8 प्रतिशत और भैंसों की संख्या में 8.9 प्रतिशत की वृध्दि हुई । 1997 में देश में 19.9 करोड़ गाय-बैल तथा 9 करोड़ भैंसें थीं, जबकि 1951 में यह संख्या में क्रमशः 15.5 करोड़ और 4.3 करोड़ थी । इस दौरान स्वदेशी पशुओं की संख्या में 10.2 प्रतिशत की कमी आई है । देश में अधिक लाभकारी पशुओं को प्राथमिकता की ओर स्पष्ट रुझान नजर आया है । भेड़ों, बकरियों और सूअरों की संख्या में क्रमशः8.9 प्रतिशत, 1.3 प्रतिशत और 1.7 प्रतिशत की वृध्दि हुई है ।
पंचवर्षीय योजनाएं
वर्तमान में, विश्व में बढते जा रहे औद्योगिक पर्यावरण प्रदूषण एवं महंगी विद्युत शक्ति का भारत अपने देश में केवल अपने परम्परागत पशुशक्ति को पुनः समृध्द करके ही इस समस्या का हल कर सकता है । इसी बात को ध्यान में रखते हुए पशुधन के विकास के लिए विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में विशेष महत्व देती रही है । प्रथम पंचवर्षीय योजना पशुधन के विकास के लिए 8 करोड़ रुपये की राशि रखी गई थी । इस राशि में उत्तरोत्तर वृध्दि होती गई और यह आठवीं योजना में 1285 तथा नौंवी योजना में 1570 करोड़ रुपये तक पहुंच गई ।
विभिन्न कार्यक्रम
देश में देशी नस्ल की गाय-बैलों की 27 और भैंसों की 7 नस्लें उपलब्ध हैं । इनकी नस्ल में सुधार लाने के लिए कई केन्द्रीय और केन्द्र प्रायोजित कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं । जिन पशु नस्ल की प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है, उनका संरक्षण और रक्षण किया जा रहा है । भावी नस्ल में सुधार लाने के लिए उत्तम नस्ल के सांड और गाय पैदा करने के लिए प्रशीतित वीर्य और प्रशीतित भ्रूण उपलब्ध कराने के लिए विशिष्ट पशुओं का चयन और पंजीकरण किया जाता है। देश में सात केन्द्रीय पशु प्रजनन फार्म हैं । ये सूरतगढ (राजस्थान), चिपलीमा और सुनबेडा (उड़ीसा), धमरोड़ (गुजरात) हैसरघट्टा (कर्नाटक) अलमाडी (तमिलनाडु) और अंदेशनगर (उत्तर प्रदेश) में हैं। इसके अतिरिक्त अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिनमें शामिल हैं - सघन मवेशी विकास कार्यक्रम, चारा एवं पोषण विकास योजना, गौशाला विकास योजना, महत्वपूर्ण पशुधन आंकड़ों के लिए नमूना सर्वेक्षण कार्यक्रम ।
समस्याएं एवं सुझाव
हालांकि पशुधन के मामले में भारत का विश्व में प्रथम स्थान है परन्तु फिर भी पशुपालन व्यवसाय पिछड़ा हुआ है । भारत में दुधारू पशुओं में दुग्ध की मात्रा अन्य देशों की तुलना में काफी कम है । भारत में पशुपालन व्यवसाय के पिछड़ा होने एवं उनके स्तर में गिरावट के मुख्य कारणों में शामिल हैं -- अनुपयोगी पशुओं की अधिक संख्या, निर्धन किसान, अच्छी नस्ल के पशुओं की कमी, पौष्टिक चारे का अभाव, दोषपूर्ण प्रजनन क्रिया, पशुओं के रोग एवं बीमारियों का उचित इलाज का अभाव, पशुओं के क्रय-विक्रय की उचित व्यवस्था न होना और पशुपालन व्यवसाय के प्रति सरकार की उदासीनता का रुख आदि ।
वैसे तो समस्याओं में ही सुझाव निहित होते हैं। फिर भी पशुधन की उन्नति के लिए सर्वप्रथम सुझाव है कि इसे उद्योग का दर्जा प्रदान किया जाए । जिस प्रकार अन्य उद्योग अनेक प्रकार की सुविधाएं प्राप्त करते हैं उसी प्रकार यदि पशुपालन व्यवसाय को सुविधाएं प्राप्त होने लगे तो दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति कर सकेंगे । समय-समय पर पशु-प्रदर्शनियों एवं मेलों का आयोजन और पशुपालन व्यवसाय में लगे दक्ष लोगों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए । पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, दूरदर्शन आदि प्रचार माध्यमों से पशुपालन व्यवसाय से होने वाले लाभों से आम जनता को परिचित कराना चाहिए ताकि अन्य व्यक्ति पुशपालन व्यवसाय के प्रति आकर्षित हो सकें । पशु शक्ति बहुमुखी शक्ति है, भारतवासी इससे भली प्रकार से परिचित भी हैं, आवश्यकता है केवल इस ओर ध्यान देने की ।
वैयक्तिक सहायक, पत्र सूचना
कार्यालय, नई दिल्ली