राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में पशुधन की महत्वपूर्ण भूमिका

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Aug 26, 2005, 8:31:58 AM8/26/05
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राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में पशुधन की महत्वपूर्ण भूमिक
राकेश शर्मनिशीथ

सिंधघाटी की खुदाई से प्राप्त तथ्यों के आधार से स्पष्ट होता है कि हमारदेश की अर्थव्यवस्था में पशुधन का महत्व प्राचीन काल से चला आ रहा है । भारतीय मनीषियों ने पशुओं के संरक्षण तथपशु-पूजा का नियम बनाया था, जो वर्तमान समय तक चला आ रहा है । विश्व की कुल पशसंख्या का 19 प्रतिशत भारत में है । पशसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में प्रथम स्थान है, जबकि पशघनत्व की दृष्टि से द्वितीय स्थान पर है । पशुओं की बढतसंख्या की जरूरतों को पूरकरने के लिए भारत के पास व्यापक क्षमता है ।

महत्व

पशुधन आर्थिक विकास में अनेक तरह से अपनभूमिकनिभाता है। देश के लगभग 70 करोड़ व्यक्ति कृषि पर निर्भर हैं । इनमें से लगभग 7 करोड़ कृषकों द्वारपशुपालन कियजाता है। देश में कृषि उत्पादन में पशुपालन का योगदान 30 प्रतिशत है । ग्रामीणों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में पशुपालन काफसहायक है। एक अनुमान के अनुसार कृषि में पशुश्रम का कुल मूल्य 300 से 500 करोड़ रुपये है । पशुओं के गोबर से खाद प्राप्त होती है। उनकसींग, खुर एवहड्डियों का चूर्ण बनाकर कई तरह से उपयोग कियजाता है । ग्रामीण क्षेत्रों में यातायात के लिए पशुओं का विशेष उपयोग कियजाता है । एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में लगभग 1.5 करोड़ बैलगाड़ियां हैं । अनेक उद्योगों की आधारशिला भी पशुओपर निर्भर करती हैं, जैसे - चमड़उद्योग, ऊनउद्योग, वस्त्र उद्योग, मांस उद्योग, डेरउद्योग आदि मुख्य हैं । भारत में विशेष तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में यातायात के लिए पशुओं का विशेष उपयोग होता है ।

पशुओं से हमें विदेशमुद्रअर्जन करने में भी विशेष सहायतमिलती है । हमारराष्ट्रीय आय में पशुधन का विशेष योगदान है । कुल राष्ट्रीय आय का लगभग 10 प्रतिशत हमें पशुधन से प्राप्त होता है । देश में प्रोटीन की आवश्यकतपूरकरने में दूध, अंडऔर मांस का योगदान है । दूध की पैदावार के मामले में भारत आज दुनिया में शीर्ष स्थान पर है । गाय का दूध अमृत के समान तथबकरी का दूध औषधि तुल्य मानजाता है। वर्ष 1950-51 में दूध का उत्पादन मात्र एक करोड़ 70 लाख टन था, जो वर्ष 2002-03 में बढक़र 8 करोड़ 67 लाख टन हो गया है । पशुपालन तथइसससंबंधित उत्पादों के निर्यात से होनवालआय में काफवृध्दि हो रही है । 1991 में पशुधन और उसससम्बध्द उत्पादों से 59500 लाख रुपये का निर्यात हुआ, जबकि वर्ष 1996-97 में यह बढक़र 192500 लाख रुपये हो गया था ।

पशुधन की गणन

वर्ष 1951 में पशुधन की कुल संख्य27 करोड़ 30 लाख थी । वर्ष 1996 में की गयपशगणना के अनुसार भारत में गाय, भैंस, ऊंट, बकरएवमुर्गा-मुर्गी की संख्यक्रमश: 19.6,8.0, 1.5, 4.5, 12.0 एव61.9 करोड़ है । भारत में प्राप्त कुल पशसंख्या का 69 प्रतिशत कृषि में काम आनवालबैल, ऊंट आदि पशु हैं एव31 प्रतिशत दुधारपशु हैं।

देश और 28 राज्यों तथकेन्द्र शासित प्रदेशों की संयुक्त पशुधन की गणना की अनंतिम रिपोर्ट के अनुसार देश में 48.5 करोड़ पशुधन हैं । यह गणनसभराज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में एक वर्ष के रिकार्ड समय में की गई है और इसकसंदर्भ तिथि 15 अक्तूबर, 2003 रखगई है। इस गणना के दौरान ग्रामीण और शहरसभघरों से पशुओं, भैंसों, भेड़ों, बकरियों, सूअरों और अन्य पशुओं के बारे में आंकड़एकत्र कियगए हैं। संकर नस्ल के पशुओं की संख्या में 1997 से लेकर 2003 के दौरान 22.8 प्रतिशत और भैंसों की संख्या में 8.9 प्रतिशत की वृध्दि हुई1997 में देश में 19.9 करोड़ गाय-बैल तथ9 करोड़ भैंसें थीं, जबकि 1951 में यह संख्या में क्रमश15.5 करोड़ और 4.3 करोड़ थी । इस दौरान स्वदेशपशुओं की संख्या में 10.2 प्रतिशत की कमआई है । देश में अधिक लाभकारपशुओं को प्राथमिकता की ओर स्पष्ट रुझान नजर आया है । भेड़ों, बकरियों और सूअरों की संख्या में क्रमशः8.9 प्रतिशत, 1.3 प्रतिशत और 1.7 प्रतिशत की वृध्दि हुई है ।

पंचवर्षीय योजनाए

वर्तमान में, विश्व में बढते जा रहऔद्योगिक पर्यावरण प्रदूषण एवमहंगविद्युत शक्ति का भारत अपनदेश में केवल अपनपरम्परागत पशुशक्ति को पुनसमृध्द करके ही इस समस्या का हल कर सकता है । इसबात को ध्यान में रखतहुए पशुधन के विकास के लिए विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में विशेष महत्व देतरही है । प्रथम पंचवर्षीय योजनपशुधन के विकास के लिए 8 करोड़ रुपये की राशि रखगई थी । इस राशि में उत्तरोत्तर वृध्दि होतगई और यह आठवीं योजना में 1285 तथनौंवयोजना में 1570 करोड़ रुपयतक पहुंच गई

विभिन्न कार्यक्रम

देश में देशनस्ल की गाय-बैलों की 27 और भैंसों की 7 नस्लें उपलब्ध हैं । इनकनस्ल में सुधार लाने के लिए कई केन्द्रीय और केन्द्र प्रायोजित कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं । जिन पशनस्ल की प्रजातियों के लुप्त होने का खतरपैदा हो गया है, उनकसंरक्षण और रक्षण किया जा रहा है । भावनस्ल में सुधार लाने के लिए उत्तम नस्ल के सांड और गाय पैदकरने के लिए प्रशीतित वीर्य और प्रशीतित भ्रूण उपलब्ध कराने के लिए विशिष्ट पशुओं का चयन और पंजीकरण कियजाता है। देश में सात केन्द्रीय पशप्रजनन फार्म हैं । ये सूरतगढ (राजस्थान), चिपलीमऔर सुनबेडा (उड़ीसा), धमरोड़ (गुजरात) हैसरघट्टा (कर्नाटक) अलमाडी (तमिलनाडु) और अंदेशनगर (उत्तर प्रदेश) में हैं। इसकअतिरिक्त अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिनमें शामिल हैं - सघन मवेशविकास कार्यक्रम, चारएवपोषण विकास योजना, गौशालविकास योजना, महत्वपूर्ण पशुधन आंकड़ों के लिए नमूनसर्वेक्षण कार्यक्रम

समस्याएएवसुझाव

हालांकि पशुधन के मामले में भारत का विश्व में प्रथम स्थान है परन्तफिर भी पशुपालन व्यवसाय पिछड़हुआ है । भारत में दुधारपशुओं में दुग्ध की मात्रअन्य देशों की तुलना में काफकम है । भारत में पशुपालन व्यवसाय के पिछड़होनएवउनकस्तर में गिरावट के मुख्य कारणों में शामिल हैं -- अनुपयोगपशुओं की अधिक संख्या, निर्धन किसान, अच्छनस्ल के पशुओं की कमी, पौष्टिक चारे का अभाव, दोषपूर्ण प्रजनन क्रिया, पशुओं के रोग एवबीमारियों का उचित इलाज का अभाव, पशुओं के क्रय-विक्रय की उचित व्यवस्था न होनऔर पशुपालन व्यवसाय के प्रति सरकार की उदासीनता का रुख आदि ।

वैसे तो समस्याओं में ही सुझाव निहित होते हैं। फिर भी पशुधन की उन्नति के लिए सर्वप्रथम सुझाव है कि इसउद्योग का दर्जप्रदान कियजाएजिस प्रकार अन्य उद्योग अनेक प्रकार की सुविधाएप्राप्त करते हैं उसप्रकार यदि पशुपालन व्यवसाय को सुविधाएप्राप्त होनलगे तो दिन दूनरात चौगुनउन्नति कर सकेंगे । समय-समय पर पशु-प्रदर्शनियों एवमेलों का आयोजन और पशुपालन व्यवसाय में लगदक्ष लोगों को पुरस्कृत कियजानचाहिएपत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, दूरदर्शन आदि प्रचार माध्यमों से पशुपालन व्यवसाय से होनवाललाभों से आम जनता को परिचित करानचाहिए ताकि अन्य व्यक्ति पुशपालन व्यवसाय के प्रति आकर्षित हो सकें । पशशक्ति बहुमुखशक्ति है, भारतवासइससभलप्रकार से परिचित भी हैं, आवश्यकता है केवल इस ओर ध्यान देने की ।


वैयक्तिक सहायक, पत्र सूचनकार्यालय, नई दिल्ल

 

 

 

 

 

 

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