बाल श्रम उन्मूलन के लिए आवश्यकता है वैकल्पिक रोजगार की

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Oct 9, 2006, 10:10:15 PM10/9/06
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बाल श्रम उन्मूलन के लिए आवश्यकता है वैकल्पिक रोजगार की
राकेश शर्मा निशीथ

घरेलू काम, सड़क ढाबों, होटलों आदि में बाल मजदूरी पर सरकारी प्रतिबंध 10 अक्तूबर से लागू हो रहा। बाल श्रम उन्मूलन और विनियमन अधिनियम 1986 के अंतर्गत 13 उद्योगों को बाल श्रम कानून के प्रतिबंधित भाग में रखा गया था । सामाजिक संगठनों, अंतर्राष्ट्रीय श्रम सुधार मानकों में परिवर्तन तथा न्यायालयों के हस्तक्षेप के कारण समय-समय पर सरकारी अधिसूचनाओं के माध्यमों से कुछ उद्योगों और कार्यों को प्रतिबंधित श्रेणी में शामिल किया जाता रहा है । गौरतलब है कि 14 वर्ष से कम आयु वालों के लिए सरकार ने 57 उत्पादन प्रक्रियाओं और 15 व्यवसायों को प्रतिबंधित कर दिया है । घरों और ढाबों को इस सूची में शामिल करने के बाद सरकार ने अधिसूचना जारी की थी । यह अधिसूचना 10 अक्तूबर, 2006 से प्रभावी हो जाएगी ।

      इस अधिनियम में प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति, जो इस अधिनियम के उपबंधों का उल्लंघन करते हुए किसी बच्चे को काम पर रखता है, तो उसे कम से कम तीन माह से लेकर एक वर्ष तक का कारावास या कम से कम 10,000 रुपये से लेकर 20,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों दंड दिया जा सकता है ।  इसके आरोप में पकड़े जाने पर किसी बच्चे को नौकर रखने पर छह महीने की कैद या 20,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों सजाएं हो सकती हैं । दूसरी बार यह अपराध करने पर सजाएं दुगुनी की जा सकती है । केन्द्र सरकार ने कानून को प्रभावी रूप से लागू कराने और बच्चों के परिवारों के पुनर्वास के लिए केन्द्र ने राज्य सरकारों से भी मदद मांगी है ।

सरकारी सेवा के नियमों में संशोधन

      इसी प्रकार की एक केन्द्रीय अधिसूचना 14 अक्तूबर 1999 की सरकारी कर्मचारियों के सेवा नियमों में संशोधन के माध्यम से जारी की गई । इसके माध्यम से सरकारी कर्मचारियों के सेवा नियमों में संशोधन किया गया है ताकि कोई भी सरकारी अधिकारी न तो बच्चे से घरेलू बाल मजदूरी करा सकता है और न ही नौकर रख सकता है । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक फैसले के परिणाम स्वरूप यह निर्णय एक छह वर्षीय बालक अशरफ के मामले में दिया गया था । दिल्ली के एक आईएएस अधिकारी ने अपने घरेलू नौकर द्वारा बच्चे के गिलास से बचे हुए दूध को पी लेने की सजा के तौर पर नौकर, अशरफ के शरीर को गर्म लोहे से दाग दिया था । इसके विरुध्द आवाज उठाई गई। श्री कैलाश सत्यार्थी के आंदोलन और मांगों के सामने मनवाधिकार आयोग ने इस पर कड़ी कार्रवाई का आदेश दिया और 1996 से अशरफ से शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे रपऊतार पकड़ चुका है । आज अशरफ न केवल पढ रहा है बल्कि विज्ञापन फिल्मों में एक्टिंग भी कर रहा है। कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने 31 अगस्त, 2006 को सभी सरकारी अधिकारियों को बच्चों को घरेलू नौकरों के रूप में नहीं रखने के लिए विस्तृत निर्देश जारी किये हैं ।

बाल श्रम उन्मूलन - विकास की गारंटी

      अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के ग्लोबल इम्पलाइमेंट ट्रेंड के अनुसार दुनिया में करीब 18 करोड़ लोग बेरोजगार हैं और दुनिया भर में 24 करोड़ 60 लाख बच्चे काम-धंधे में लगे हैं । इस तुलनात्मक रिपोर्ट से पता चलता है कि बच्चों को स्कूल भेजकर अर्थव्यवस्था को दोहरा लाभ पहुंचाया जा सकता है । हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने रिपोर्ट में खुलासा किया है कि बाल मजदूरी पर होने वाला खर्च और आमदनी का अनुपात सात गुना है । यदि कोई देश बाल श्रम उन्मूलन में एक रुपया खर्च करता है तो कालांतर में उसे सात रुपये का फायदा होगा क्योंकि इन बच्चों को शिक्षित कर क्षमता का पूर्ण विकास होने से देश की आर्थिक सम्पन्नता बढेग़ी । संयुक्त राष्ट्र संघ की सबके लिए शिक्षा पर आयोजित  बैठक में स्वीकार किया गया कि बाल मजदूरी खत्म किए बिना सबके लिए शिक्षा का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता है ।

बालश्रम के विविध रूप

      बाल और श्रम अपने आप में निरीह एवं निरपवाद शब्द हैं, किन्तु जब ये दोनों मिलकर बालश्रम बन जाते हैं तो एक विकट सामाजिक बुराई का रूप ले लेते हैं । एक विद्वान के अनुसार बालश्रम किसी बालक द्वारा किया गया कोई भी ऐसा कार्य, जिसे सीधे तौर पर स्वयं बालक को या फिर उनके परिवारजनों को आर्थिक लाभ पहुंचाने के प्रयोजन से किया जाये और जिससे उसके स्वयं के शारीरिक, मानसिक या सामाजिक विकास में बाधा पहुंचे । भारत सरकार द्वारा नियुक्त बालश्रम पर समिति के अनुसार बालश्रम में बालकों की जनसंख्या का वह भाग आता है, जो या तो वैतनिक या अवैतनिक कार्यों पर नियुक्त हो । बाल मजदूर निम्न क्षेत्रों में अधिक रूप से पाए जाते हैं: क. असंगठित क्षेत्र-- होटल, ढाबा, फैक्टरी व दूकान, आटो वर्कशाप, अखबार बेचना, कोयला, अभ्रक चुनना, कचरा चुनना, खेती-बाड़ी, घर में नौकर का काम आदि ।  ख. संगठित क्षेत्र-- कालीन बुनाई, दियासलाई, आतिशबाजी, हथकरघा, चमड़ा, कांच, भवन निर्माण, पत्थर खदान, रत्न उद्योग, ताला उद्योग आदि ।

बाल श्रम के दुष्परिणाम

     बाल श्रम के कारणों को जानने के लिए श्रम मंत्रालय ने श्री एम एस गुरूपदस्वामी की अध्यक्षता में एक 16-सदस्यीय समिति का गठन किया था । समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था-- अत्यधिक निर्धनता, फायदेमंद रोजगार के अवसरों की कमी, अनिश्चित आजीविका और निम्न स्तरीय जीवन शैली, बाल श्रम को बड़े पैमाने पर फैलाने के मुख्य कारण हैं । बाल श्रमिक पहले खेतों के कामों में लगे रहते थे, किन्तु औद्योगीकरण एवं शहरीकरण के  बढने क़े साथ-साथ विभिन्न उद्योगों एवं व्यवसायों में बाल श्रमिकों को बड़े पैमाने पर नियोजित किया जाने लगा है । बाल-बालिका श्रमिकों का यौन-शोषण मालिकों, ठेकेदारों, एजेंन्टों, सहकर्मियों, अपराधियों आदि द्वारा किया जाता है ताकि बच्चों में इतना डर पैदा कर दिया जाए कि वे शोषण के विरूध्द आवाज तक नहीं उठा सकें।

     बाल मजदूरों का शारीरिक शोषण भी अधिक मात्रा में किया जाता है । सिर पर बोझा ढोने, ज्वलनशील भट्टियों के निकट काम करने, कोई चीज खींचने के लिए अंतिम दम तक जोर लगाने, गन्दे व बदबूदार कार्यों के कारण उनकी अनुमानित आयु एक-तिहाई रह जाती है । खानों एवं खदानों में बच्चों को भेजने को प्राथमिकता इसलिए दी जाती है कि उनमें वयस्क नहीं घुस सकते । जब वे बड़े होते हैं तो उनकी छंटनी कर दी जाती है । शोर करने वाली मशीनों पर काम करने वाले बच्चे प्रायः बहरे हो जाते हैं और धूल के कारण नजला हो जाता है ।

बाल श्रम विरोधी कानून

      20 वीं सदी के शुरू में प्रथम विश्व युध्द के बाद श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता समझी गई । वर्ष 1919 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना की गई । बच्चों को विनियमित करने का प्रावधान किया गया । 12 वर्ष से अधिक उम्र वाले बच्चों को ही काम करने का सुझाव इस संगठन ने दिया । भारत में 1929 में रॉयल कमीशन की स्थापना हुई, जिसने अपनी रिपोर्ट 1931 में दी । इस रिपोर्ट में बच्चों के काम की दशाओं का दु:खद वर्णन किया गया था। बाल श्रमिक विरोधी कानून की शुरूआत बाल अधिनियम से होती है । बाल श्रम के उन्मूलन के लिए सर्वप्रथम ब्रिटिश शासन काल में वर्ष 1881 में खदानों एवं कारखानों में काम कर रहे बच्चों की सुरक्षा का कानूनी प्रावधान किया गया ।  इसमें सात वर्ष के नीचे के बच्चों को कारखाने में काम करने की मनाही थी ।

      इसके बाद के प्रमुख अधिनियम इस प्रकार हैं: खदान अधिनियम 1901, फैक्टरी अधिनियम 1911, भारतीय खदान अधिनियम 1923, फैक्टरी संशोधित अधिनियम 1926, भारतीय बंदरगाह अधिनियम (संशोधित) 1931, चाय बागान मजदूर अधिनियम 1932, बाल बंधुआ श्रम अधिनियम 1933, फैक्टरी (  संशोधित) अधिनियम 1934, भारतीय खदान (संशोधित ) अधिनियम 1935, बाल रोजगार अधिनियम 1938, फैक्टरी अधिनियम 1948, बाल रोजगार(संशोधित) अधिनियम 1951, बागान श्रम अधिनियम 1951, खदान अधिनियम 1951, खदान अधिनियम 1952, फैक्टरी (संशोधित) अधिनियम 1954, व्यापारिक जहाजरानी अधिनियम 1958, मोटर ट्रांसपोर्ट मजदूर अधिनियम 1961, बीडी एवं सिगार मजदूर(सेवा शर्ते) अधिनियम 1966,बालरोजगार(संशोधित्) अधिनियम 1978 एवं बाल श्रम (उन्मूलन तथा नियमन)अधिनियम 1986 मुख्य हैं । इसके बाद 1987 में राष्ट्रीय बाल श्रम नीति में भी बाल श्रम उन्मूलन के लिए अनेक प्रावधान किए गए ।

संविधान में प्रावधान

      भारतीय संविधान में बाल श्रम पर रोक लगाई गई है । हमारे मौलिक अधिकारों के अध्याय 3 में अनुच्छेद 23 के अंतर्गत बेगार पर निषेध लगा दिया गया है, अर्थात कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से बलात काम नहीं ले सकता ।  अनुच्छेद 24 में प्रावधान किया गया है कि चौदह वर्ष से कम उम्र के किसी बच्चे को किसी कारखाने  या खदान या अन्य किसी खतरनाक रोजगार में नियोजित नहीं किया जाएगा । अनुच्छेद 39 (ई) में यह प्रावधान है कि राज्य ऐसी व्यवस्था करेगा जिससे पुरुष और स्त्री मजदूरों के स्वास्थ्य एवं शक्ति तथा बच्चों की नाजुक उम्र का दुरूपयोग न हो और भारत के नागरिक आर्थिक  जरुरत से मजबूर होकर ऐसा कार्य (पेशा) न करें जो उनकी उम्र या ताकत के प्रतिकूल हो । अनुच्छेद 39 (एफ) में प्रावधान है कि राज्य ऐसी सुविधाओं एवं अवसरों की व्यवस्था करेगा जिससे बच्चे स्वतंत्रता एवं सम्मान के साथ तथा स्वस्थ  तरीके से विकसित हों तथा उनका बचपन एवं जवानी शोषण व नैतिक तथा भौतिक परित्याग से सुरक्षित हो ।  अनुच्छेद 45 में प्रावधान है कि राज्य भारतीय संविधान लागू होने के दस वर्षों के अंदर 14 वर्ष की उम्र तक के बच्चों को मुक्त एवं अनिवार्य शिक्षा देने की कोशिश करेगा ।

बाल श्रम उन्मूलन के उपाए

      सबसे पहले यह जरूरी है कि बाल मजदूरी समाप्त नहीं होने की धारणा को तोड़ना पड़ेगा ।

बाल मजदूरी प्रथा के कई कारण हैं लेकिन मुख्य कारण गरीबी, वयस्कों की बेरोजगारी तथा कम मजदूरी दर है । इसलिए विभिन्न विभागों के समन्वयन से विकास एवं कल्याण कार्यक्रमों का सीधा लाभ बाल मजदूरों के परिवारों को मिलना चाहिए जिससे उन परिवारों को बाल मजदूरों के जरिए मिलने वाली आय का वैकल्पिक स्रोत मिल सके । इतना ही नहीं, ऐसे गरीब एवं वंचित परिवारों में स्वास्थ्य, पोषाहार, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सस्ते खाद्यान्न, कपड़े, मिट्टी का तेल तथा अन्य आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराई जाएं, जिससे उन परिवारों में मृत्यु-दर और जन्म दर कम हो तथा उनकी औसत आयु बढे ।

      बाल श्रमिकों को मुक्त कराने के पश्चात उनके पुनर्वास की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए । अन्यथा बाल श्रमिक आजीविका के साधनों से वंचित रहकर असमाजिक कार्यों की ओर उन्मुख होकर अनेक समस्याएं उत्पन्न कर सकते हैं। पारंपरिक व्यवसाय को बढावा देने के लिए व्यवसाय में लगे छोटे सदस्यों को प्रशिक्षण एवं स्थानीय ग्रामीण बैंकों को त्रऽण दिलवा कर उनकी स्थिति मजबूत करनी चाहिए । स्कूलों के पाठयक्रमों में बाल श्रम प्रथा उन्मूलन से संबंधित एक अध्याय शामिल किया जाए । बाल श्रमिकों की शिक्षा का उचित प्रबंध करने के साथ ही उनको प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शिल्प कला की शिक्षा भी दी जानी चाहिए क्योंकि देश में काफी बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे हैं, जो हस्तकला के क्षेत्र में अपने परिवार का हाथ बंटाते हैं । हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था बाल मजदूरों को बढाने के लिए भी जिम्मेदार है । देश में एक तरफ तो स्कूलों का अभाव है और जहां स्कूल हैं भी वहां वह गरीब बच्चों की पहुंच के बाहर हैं। अगर गरीब बच्चे किसी तरह पढ-लिख भी लिए तो उसे नौकरी नहीं मिलती । ग्रामवासियों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि शिक्षा प्राप्त करना उनके लिए पैसे और समय दोनों की बर्बादी है अत: रोजगारपरक शिक्षा की व्यवस्था ही बाल मजदूरों की बाढ काे रोक सकती है।

      बाल श्रम उन्मूलन अकेले सरकार की जिम्मेदारी नहीं है । वास्तव में यह ऐसा कार्यक्रम है, जिसके लिए बाल श्रम को एक सामाजिक और आर्थिक समस्या मानते हुए एक राष्ट्रीय अभियान चलाया जाना चाहिए । इस दिशा में अपेक्षित परिवर्तनों के लिए हमें व्यापक और केन्द्रित नीतियां और कार्यक्रम तैयार करने होंगे । इस दिशा में निरंतर शोध की आवश्यकता है ताकि बाल श्रमिकों के लिए क्रियान्वित शैक्षिक कायक्रमों को वास्तविकता में धरातल से जोड़ा जा सके ।

10वीं योजना में बाल श्रम उन्मूलन

      जनगणना के अनंतिम आंकड़ों के अनुसार 5-14 वर्ष की आयु वर्ग में कामकाजी बच्चों की संख्या 1.259 करोड़ है । बाल श्रम उन्मूलन के लिए 10वीं योजना में राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना के अंतर्गत कवर किए जाने वाले जिलों की संख्या 100 से बढाक़र 250 कर दी गई है । ताकि बाल श्रम की बहुलता वाले क्षेत्रों में बाल श्रमिकों का पुनर्वास किया जा सके ।

      दोपहर का भोजन कार्यक्रम से मिलने वाली खाद्य सुरक्षा का बाल श्रमिकों की संख्या कम करने पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। सबको शिक्षा मुहैया कराने के उद्देश्य से शुरू किए गए सर्व शिक्षा अभियान से भी बच्चों के बीच साक्षरता के स्तर में उल्लेखनीय वृध्दि हुई है। विशेष स्कूलों की स्थापना राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना के अंतर्गत शुरु की गई है ।

      बाल श्रम का उन्मूलन करने के लिए सरकार ने एक राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (एनसीएलपी) स्कीम तैयार की है । इस स्कीम के अंतर्गत कामकाजी बच्चों को कार्य से हटाया जाता है और विशेष स्कूलों में डाला जाता है, ताकि उन्हें शिक्षा की औपचारिक प्रणाली की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके । इस योजना को, जो 1988 में देश के बारह जिलों में आरंभ की गई थी, दसवीं योजना के दौरान 21 राज्यों के 250 जिलों को शामिल करने के लिए बढा दिया गया है ।       

      भारत सरकार और अमरीकी श्रम विभाग ने देश के 21 जिलों में बाल श्रमिको के पुनर्वास क लिए इंडस (इंडो-यूएस) नामक एक संयुक्त परियोजना आरंभ की है । इस परियोजना का लक्ष्य एक केन्द्रित और एकीकृत रूप से परियोजनागत क्षेत्र में जोखिमकारी उद्योगों में बाल श्रम का पूरी तरह उन्मूलन करना है । इस परियोजना के अंतर्गत कार्य से हटाए गए 80,000 से अधिक बच्चे लाभान्वित होंगे।

      देश के 72 नगरों में मुसीबत मे फंसे बच्चों के लिए एक नि:शुल्क टेलीफोन हेल्पलाइन सेवा उपलब्ध कराई गई है जो चौबीस घंटे उपलबध रहेगी। इसके नि:शुल्क फोन नम्बर 1098 है। इस नम्बर पर कोई भी बच्चा या उसकी तरफ से कोई भी सबंधित वयस्क संपर्क कर सकता है। फोन किये जाने पर बच्चों को तुरंत आपातकालीन सहायता प्रदान की जाएगी, जिसमें मेडिकल सहायता, शरण, बच्चों को संबंधी तक पहुंचाना, बचाव और परामर्श प्रदान किया जाएगा । महिला और बाल विकास मंत्रालय ने बाल सेवओं का कार्य चाईल्ड लाईन फाउंडेशन को सौंपा है यह सरकार का एक स्वैच्छिक संगठन हैं ।

      चाइल्ड लेबर (प्रिवेंशन एंड रेगुलेशन) एक्ट 1986 के अंतर्गत खतरनाक समझे जाने वाले 64 पेशों में 14 साल से कम उम्र के बच्चों को लगाने पर पहले से ही रोक थी । इसका दायरा अब घर और ढाबों-होटलों तक बढा दिया गया है । घरेलू बाल मजदूरी को खत्म करने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से जारी नए आदेश से बाल मजदूरी खत्म करने की दिशा में नया रास्ता खुला है।

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