सूचना का अधिकार --
भ्रष्टाचार पर प्रहार
राकेश शर्मा निशीथ*
*वैयक्तिक सहायक, पत्र सूचना कार्यालय, मुख्यालय भारत सरकार
संविधान ने भारत के नागरिकों को मौलिक अधिकार दिए परन्तु वे सूचना के अधिकार के अभाव में अधिक कारगर नहीं हो पाए । पिछले पचास सालों से भारत के तमाम बुध्दिजीवी, पत्रकार तथा समाज के विभिन्न वर्गों के लोग यह मांग करते आ रहे थे कि उन्हें सरकारी सूचना मिलने का अधिकार होना चाहिए । औपनिवेशिक विरासत में मिले सरकारी गोपनीयता कानून की जगह सूचना का अधिकार (आरटीआई) पाने के लिए लगभग 50 वर्षों तक इंतजार करना पड़ा।
सूचना का अधिकार एक अहम मसला होने पर भी देश में व्यापक स्तर पर इस बारे में कभी कोई जन आंदोलन नहीं चलाया गया था । परन्तु इस बारे में एकमात्र आंदोलन मजदूर किसान शक्ति संगठन चला रहा था । इस संगठन के अंतर्गत मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरुणा रॉय राजस्थान के देवडूंगरी इलाके में अपना आंदोलन चला रही थी, जिसका मूलमंत्र था जानकारी ही लोकतंत्र का आधार है । 1992-93 में सूचना पाने के लिए पहली सभा की गई । अप्रैल, 1996 में ब्यावर में इसी मांग को लेकर चालीस दिन का धरना दिया गया, जिसने सारे देश का ध्यान इस तरफ खींचा । राजस्थान सरकार पर दबाव बढता गया और वर्ष 2000 में राजस्थान में सूचना का अधिकार कानून बना । इसके बाद गोवा और तमिलनाडु में भी सूचना का अधिकार कानून बनाया गया और देखते-देखते नौ राज्यों में सूचना का अधिकार कानून बन गया । ये राज्य हैं - दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, असम, गोवा तथा मध्यप्रदेश।
आवश्यकता
शासन में भ्रष्टाचार पनपने की वजह वह गोपनीयता होती है, जो कई बार गैर-जरूरी कारणों से बरती जाती है । देश की संप्रभुता, सुरक्षा, रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हित तथा विदेशों से रिश्तों के मद्देनजर कई बार सूचना छिपाना आवश्यक होता है परन्तु अनुभव यह किया जा रहा था कि गोपनीयता की आड़ में जहां प्रशासनिक कामकाज में बरती जा रही अनियमिताओं पर पर्दा डालने की कोशिश हुई, वहीं दूसरी ओर सूचना छिपाकर लोगों को उत्पीड़ित किया गया । इससे सरकारी तंत्र और जनता के बीच खाई दिनोंदिन चौड़ी होती जा रही थी । इस खाई को पाटने का काम सूचना का अधिकार करेगा, ऐसी उम्मीद की जा रही है ।
देश के नौ राज्यों में सूचना का अधिकार अपने राज्य के लोगों को दिया गया था परन्तु उनमें एकरूपता नहीं थी और वे सूचना हासिल करने वालों के लिए बेहद खर्चीली व्यवस्था साबित हो रहे थे । ऐसे में एक नया सर्वव्यापी सूचना का अधिकार कानून की आवश्यकता महसूस की गई। इसके परिणामस्वरूप सूचना के अधिकार का विधेयक संसद में पास किया गया । राष्ट्रपति द्वारा मंजूरी मिलने के बाद यह 12 अक्तूबर से सारे देश में लागू हो गया है ।
उद्देश्य
यह ऐतिहासिक कानून सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है। सूचना का अधिकार कानून की प्रस्तावना में इसका मूल उद्देश्य बताया गया है । इस कानून का मूल उद्देश्य है भ्रष्टाचार रोकना तथा जवाबदेही को बढावा देना । अंग्रेजों के जमाने में हर चीज को छिपाने का एक उद्देश्य था । इससे उन्हें शासन चलाने में मदद मिलती थी । लेकिन आज आजाद भारत में दुराव-छिपाव की कोई आवश्यकता नहीं है।
सूचना का अधिकार कानून के लागू होने पर प्रधान मंत्री, डॉ. मनमोहन सिंह ने आशा व्यक्त की थी कि -- विकास का फायदा सभी वर्गों के लोगों तक पहुंचेगा, जहां तक हो सके भ्रष्टाचार का अंत होगा और यह कानून आम लोगों को शासन में भागीदारी दिलाएगा । भ्रष्टाचार को देशद्रोह के संदर्भ में देखा जाना चाहिए । देशद्रोह के विषय में सिसरो ने कहा था कि कोई देश अपने मूर्खों के बावजूद बना रह सकता है, यहां तक कि महत्वाकांक्षियों के बावजूद भी, लेकिन वह भीतर के देशद्रोह को नहीं झेल सकता । दरवाजे पार खड़ा दुश्मन कम खतरनाक है, क्योंकि उसे पहचाना जा सकता है, लेकिन गद्दार तो दरवाजे के भीतर ही लोगों के बीच मौजूद होता है ।
कानून से बाहर
कुछ लोग सूचना के अधिकार का गलत फायदा भी उठा सकते हैं । इस बात को ध्यान में रखते हुए सूचना का अधिकार कानून की धारा 24 के अनुच्छेद 1 में राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़े विभागों को जैसे खुफिया विभाग, संवेदनशील विभाग, वैज्ञानिक शोध विभाग, परमाणु एवं उपग्रह विभाग तथा ऐसे विभागों की सूचनाओं को, जिनसे देश को नुकसान हो सकता है,इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है । इसके अंतर्गत आईबी, रॉ, एन्फोर्समेंट डाइरेक्टरेट, असम राइफल्स, सीआईएसएफ और एनएसजी जैसी 18 खुफिया या सुरक्षा एजेंसियों को छूट दी गई है । इस कानून की धारा 24 अनुच्छेद 2 में सरकार को गजट घोषणा के जरिए इस सूची में फेरबदल का अधिकार दिया गया है ।
प्रावधान
वर्ष 2002 में राजग सरकार ने भी सूचना की आजादी का एक विधेयक पारित करवाया था परन्तु वह अधिसूचित न हो पाने के कारण कानून नहीं बन सका । नए सूचना के अधिकार में सूचना पाने का अधिकार हर नागरिक को दिया गया है जबकि 2002 में आए विधेयक में सिर्फ सूचना लेने की स्वत्रंता थी। मांगी गई सूचना अधिकारी देते है या नहीं यह उनके ऊपर था । परन्तु इस कानून में यदि कोई अधिकारी सूचना देने में आनाकानी करता है तो उस पर 25,000 रुपये जुर्माना और उसकी चरित्र पंजिका में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज हो जाएगी ।
अमेरिका यह दावा करता है कि सूचना के अधिकार का विचार उसकी देन है । परन्तु सचाई यह है कि स्वीडन की सरकार ने वर्ष 1766 में ही यह कानून पास कर दिया था । विश्व में भारत सहित 55 देशों में सूचना के अधिकार का कानून बन चुका है । विभिन्न देशों द्वारा बनाए गए सूचना का अधिकार कानूनों का अध्ययन करके ही भारत में सूचना का अधिकार विधेयक तैयार किया गया था और इसमें भी 150 संशोधन हुए थे । इतने संशोधन शायद ही पहले किसी विधेयक में हुए होंगे। नए सूचना के अधिकार अधिनियम में मांगी गई सूचना देने में कोताही करने वाले अधिकारियों को कड़ा दंड देने, निश्चित समय में जानकारियां प्रदान करने, सूचना हासिल करने की प्रक्रिया को सस्ता व सरल बनाने तथा एक केन्द्रीय सूचना आयोग बनाने आदि का प्रावधान किया गया है ।
लोकतंत्र की सफलता के लिए नागरिकों को पारदर्शी रूप से जानकारी देना जरूरी माना गया है । सूचना देने से न सिर्फ भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा बल्कि सरकार और उसके तमाम घटकों की जवाबदेही भी सुनिश्चित होगी । इसी बात को ध्यान में रखते हुए सूचना आयुक्त के रूप में एक संवैधानिक निकाय गठित किया गया है। जिस प्रकार चुनाव आयुक्त और सतर्कता आयुक्त स्वायत्तपूर्ण भूमिका निभाते हैं, ऐसी ही भूमिका सूचना आयुक्त की भी होगी। सूचना आयुक्त पर आरटीआई के प्रावधानों को कारगर बनाने की जिम्मेदारी तय की गई है । जम्मू-कश्मीर कैडर के 1968 बैच के आईएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह पंचायती राज सचिव के पद से रिटायर होने के बाद नव गठित सूचना आयोग के पहले अध्यक्ष बनाये गए हैं ।
इस कानून के अंतर्गत आम व्यक्ति भी किसी भी मंत्री या अफसर की फाइलें, रिकार्ड, टिप्पणी, दस्तावेज, आदेश, स्मरण पत्र, विश्लेषण अनुबंध, लॉग बुक आदि को देख सकेगा और उनकी प्रमाणित प्रतिलिपि भी प्राप्त कर सकेगा । उसे केवल फोटोकॉपी आदि का खर्च देना होगा । जो व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे हैं, उन्हें सूचना पाने के लिए न्यूनतम खर्च भी नहीं देना होगा । यह व्यवस्था केन्द्र, राज्य, जिला और पंचायत तक की समस्त सरकारी संस्थाओं पर लागू होगी । उन संस्थाओं को भी इसके घेरे में आना होगा जो सरकारी अनुदानों से चलती हैं । जो अधिकारी सूचना नहीं देगा या गलत सूचना देगा उस पर जुर्माना होगा । विधेयक में पहले सजा का प्रावधान था अब उसे हटा दिया गया है । यदि जीवन-मृत्यु या व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला हो तो सूचना 48 घंटे में ही देनी होगी । मांगी गई सूचनाएं ठीक तरह से दी जाएं और शीघ्र दी जाएं यह देखने के लिए केन्द्र और राज्यों में सूचना आयोग बनाए जाएंगे ।
इस कानून का सबसे अधिक फायदा तो पत्रकारों को मिलेगा जो सूचना पाने के लिए दर-दर भटकते रहते थे । अब उन्हें आधिकारिक रूप से सूचना लेने का अधिकार प्राप्त हो गया है । इससे आम व्यक्ति किसी भी परियोजना में क्या हो रहा है, किस कंपनी को ठेका मिल रहा है, किसको लाभ और किसको हानि हो रही है सब पता लगा लेगा । देश में अनेक एनजीओ बने हुए हैं जो सरकार से अनुदान लेते हैं और फर्जी कागजों पर काम दिखाकर पैसा ऐंठ लेते हैं । अब इन एनजीओ को भी सरकार इस दायरे में ले आई है । किस एनजीओ में पैसा कैसे और कहां खर्च हो रहा है इसका हिसाब-किताब अब हर आदमी प्राप्त कर सकेगा ।
सुझाव
सूचना का अधिकार कानून और भी सुधारा जाए। इसमें यह संशोधन किया जाए कि एक तयशुदा समय के बाद सभी सरकारी फाइलें जनता के लिए खोल दी जाएंगी । सरकारी सूचना को आम जनता तक पहुंचाने के लिए यह भी आवश्यक हो गया है कि सारे सरकारी दफ्तरों का कंप्यूटरीकरण जितना जल्दी हो सके किया जाए । इससे आसानी से सूचनाएं मुहैया कराई जा सकेंगी ।
सूचना नहीं देने, देरी करने या उसे नष्ट करने की एवज में उचित दंड की व्यवस्था नहीं की गयी है । देरी करने पर प्रतिदिन 250 रुपये और ज्यादा से ज्यादा 25,000 रुपये की सजा रखी गयी है। यह मामूली दंड है । इससे संबंधित प्रावधान में अभी भी संशोधन की गुंजाइश है ।
जनता को किस तरह सूचना दी जाये, इसे लेकर सरकारी कर्मचारी या अधिकारियों को किसी तरह का दिशानिर्देश या प्रशिक्षण नहीं दिया गया है । सूचना का अधिकार से कैसे लाभ उठाया जाये इस संदर्भ में नागरिकों को कोई जानकारी नहीं दी गई है । इस कारण केन्द्र ने राज्यों को तत्काल शैक्षणिक कार्यक्रम शुरू करने का निर्देश दिया है । सरकारी कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने के आदेश दिये गये हैं ताकि जनता को समय पर सही सूचना दी जा सके । सूचना अधिकारियों के नाम, पदनाम, पता आदि प्रकाशित करना राज्य सरकारों के लिए अनिवार्य बनाया गया है ।
सूचना के अधिकार का कानून प्रशासन की गुप्त गतिविधियों और छल कपट में लिपटे फैसलों को उजागर करने का कारगर हथियार बन सकता है । जिन देशों में भी नागरिकों को सूचना का अधिकार प्राप्त है वहां प्रशासन की गंदगी साफ करने में इसकी अहम भूमिका रही है । जानबूझकर पैदा किए जाने वाले कुहासे पर सूचना का अधिकार कुछ प्रहार कर सकेगा, इसकी कुछ आस तो अब बंधती नजर आ रही है । (पसूका)
*वैयक्तिक सहायक, पत्र सूचना कार्यालय, मुख्यालय भारत सरकार