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Ashok Gangurde

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Oct 19, 2011, 9:17:11 PM10/19/11
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On 8/21/11, RAVI KUMAR MISHRA <mishra.k...@gmail.com> wrote:
> Aaji apko koi kyu dabayega.Aap apni baat khul kar kahiye.Main annabadi
> nahi hu aur nahi gandhi ya nehru badi lekin lokpal ke mudde par main
> Anna ke saath hu.
> rahi baat loktantrik-ta ki to aagar ye aandolan अलोकतान्त्रिक hai to
> ise rokne ke liye aap jaise log kanoon ka marg apnaye. Anna ya Anna ke
> samarthako ko kyu badnam kar rahe hai.
> Aur agar ye अलोकतान्त्रिक hai to ye gandhi wadita ke teen amulya
> dharohar SONIA,PRIYANKA aur RAHUL samne se iska birodh kyu nahi kar
> rahe hai.Akhirkar unke paass gandhi naam ka achook berhmastra hai.
>
> On 8/20/11, Ankur Mittal <mitt...@gmail.com> wrote:
>> *एक दिन सोनिया गांधी के सपने में महात्मा गांधीजी आकर बोले,"मैने मरते समय
>> कॉंग्रेस को*
>> *सादगी, ईमानदारी, टोपी, चश्मा और डंडा दिया था, कहॉं है वो?" *
>> *सोनिया ने अत्यंत विनम्रता से कहा,"टोपी तो राहुल लोगोंको पहना रहा है. *
>> *सादगी मेरे और प्रियंका के पास है. चश्मा मनमोहन के पास है. *
>> *ईमानदारी स्विस और ईटली के बैंक में सेफ है *
>> *और डंडा आम आदमी की सेवा में लगा रखा है
>> *
>> ललित जी बहुत अच्छा लिखते हो
>> किर्पया इसपे भी कुछ लिखिए.
>>
>>
>>
>>
>> 2011/8/19 Lalit Karma <lalit...@gmail.com>
>>
>>> क्रिकेट के बाद ऐसा जनसैलाब इस आन्दोलन में देखने को मिला है| क्रिकेट से भी
>>> बढकर यह आंधी चले|
>>>
>>> --
>>> Best Regards
>>> Swasth, Vyast Aur Mast
>>>
>>> Lalit Karma
>>> http://ramrasayan.blogspot.com/
>>> http://lalitkarma.blogspot.com/ <http://ramrasayan.blogspot.com/>
>>> +919981426193
>>>
>>>
>>
>>
>> --
>> BEST Regards
>> ANKUR MITTAL
>>
>
>
> --
> Thanks
> Ravi Kumar Mishra
> https://sites.google.com/site/ravikumarmishrarclub/
>


--
A S Gangurde

Ashok Gangurde

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Oct 19, 2011, 9:16:36 PM10/19/11
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On 9/27/11, राजीव तनेजा <rajivta...@gmail.com> wrote:
> *यार ने ही लूट लिया कच्छा यार का*
> ****राजीव तनेजा****
>
>
> [image:
> 121]<http://lh5.ggpht.com/-XE_SekUOTSs/ToFM7qyNukI/AAAAAAAAG2E/iOcIMIHEqn4/s1600-h/121%25255B2%25255D.jpg>
>
> "उफ़्फ़!…ये कमर का दर्द तो मेरी जान ले के रहेगा"मेरा कराहते हुए डाक्टर के
> क्लीनिक में प्रवेश...
>
> "डाक्टर साहब...नमस्कार"....
>
> "कहिए!...तनेजा जी...कैसे हैं आप?"....
>
> "अब...यकीनन...बढ़िया तो हूँ नहीं...तभी तो आपके पास आया हूँ"....
>
> "जी!...ये तो मैं क्लीनिक में आपके एंट्री लेते ही समझ गया था"....
>
> "जी!...
>
> "बताइये!...क्या तकलीफ है आपको?"...
>
> "तकलीफ का तो क्या बताऊँ डाक्टर साहब?...अजीब-अजीब किस्म के रंगहीन सपने आ रहे
> हैं आजकल...कभी मैं बाईक पे तो कभी बाईक मुझ पर सवार नज़र आती है".....
>
> "इसके अलावा और कोई तकलीफ?"...
>
> "इंजर-पिंजर...सब ढीले हुए पड़े हैं"...
>
> "बाईक के?"...
>
> "नहीं!...मेरे"....
>
> "मोबिल ऑइल चैक किया?"...
>
> "अपना?"...
>
> "नहीं!...बाईक का"...
>
> "नहीं!...
>
> "तो फिर करवा लो"....
>
> "जी!....
>
> "और कोई दिक्कत?"...
>
> "पूरा बदन दुख रहा है"...
>
> "बाईक का?"...
>
> "नहीं!...मेरा"...
>
> "और कोई परेशानी?"...
>
> "दर्द के मारे बुरा हाल है"...
>
> "डैन्ट-वैन्ट चैक किया?"...
>
> "ऊपरी तौर पर तो कुछ नहीं दिख रहा है लेकिन अन्दर का कुछ पता नहीं"...
>
> "हम्म!...तुम एक काम करो"...
>
> "जी!...
>
> "वहाँ...उस कमरे में जा के स्ट्रेचर पे लेट जाओ...इत्मीनान से सबकुछ चैक करना
> पड़ेगा"....
>
> "जी!....
>
> "मैं बस... अभी दो मिनट में कच्छा ढीला करके आता हूँ"...
>
> "क्क...कच्छा?"....
>
> "जी!....
>
> "किसका?"...
>
> "तुम्हारी भाभी का"....
>
> "वो टाईट पहनती हैं?"......
>
> "आमतौर पर तो नहीं"...
>
> "लेकिन आज पहना है?"मेरे चेहरे पर जिज्ञासा थी...
>
> "पता नहीं"...
>
> "पता नहीं...फिर भी जा रहे हैं?"...
>
> "कहाँ?"....
>
> "कच्छा ढीला करने?"...
>
> "हाँ!....
>
> "आपको इंट्यूशन हुआ?"...
>
> "किस चीज़ का?"....
>
> "कच्छे के टाईट होने का"....
>
> "इसमें इंट्यूशन की क्या बात है?.....मैंने खुद चैक किया है"....
>
> "कच्छा?"...
>
> "हाँ!...
>
> "कब?"....
>
> “कब...क्या?...अभी तुम्हारे आने से जस्ट दो मिनट पहले"....
>
> "ओह!...अच्छा...इसका मतलब भाभी जी यहीं कहीं आस-पास ही हैं"मैं सतर्कता भरी नज़र
> से इधर-उधर ताकता हुआ बोला....
>
> "मेरे क्लीनिक में भला उसका क्या काम?....अपना सुबह आती है और झाड़ू-पोंछा करके
> वापिस चली जाती है"....
>
> "भाभी?"...
>
> "नहीं!...नौकरानी"....
>
> "तो?"....
>
> "तो तुम्हारी भाभी का मेरे क्लीनिक में भला क्या काम?"...
>
> "जी!...लेकिन वो कच्छा.....
>
> "ओह!...अच्छा...वो तो मैं भूल ही गया था...तुम चलो...जा के उस कमरे में
> लेटो...मैं बस...दो मिनट में कच्छा ढीला करके आता हूँ"...
>
> "दो मिनट में हो तो जाएगा ना?"मैं उठने का उपक्रम करता हुआ बोला....
>
> "अरे!...कमाल करते हो यार तुम भी.... दो मिनट में तो पूरी *मैग्गी *उबल जाती है
> और यहाँ तो बस... नाड़े के बाएँ सिरे को ज़रा हाथ से पकड़ के थोड़ा सा झटका
> दे...कच्छा ही तो ढीला करना है....कोई पलंग पे बैठ कूद-कूद के बच्चे थोड़े ही
> पैदा करने है?".....
>
> "जी!...ये बात तो है"....
>
> "ठीक है...तो तुम जा के आराम से उस कमरे में स्ट्रेचर पे लेटो...मैं बस अभी दो
> मिनट में आया"डाक्टर साहब भी उठने का उपक्रम करते हुए बोले....
>
> "जी!...वैसे.... कच्छा तो भाभी जी का ही है ना?"मेरे स्वर में संशय था....
>
> "अब यार...तुमसे भला क्या छुपाना?.... दरअसल... कच्छा तेरी भाभी का नहीं बल्कि
> उसकी सहेली का है"....
>
> "भय्यी!...वाह....बहुत बढ़िया....ये हुई ना बात....कच्छा भाभी जी का नहीं बल्कि
> उनकी सहेली का है"मैं उछल कर ताली बजाता हुआ बोला...
>
> "जी!....
>
> "और उसे ढीला कर रहे हैं आप?"...
>
> "जी!....
>
> "फिर तो भय्यी...पार्टी बनती है हमारी"...
>
> "वो कैसे?"...
>
> "बड़े ही बेशर्म किस्म के इनसान जो हैं आप"....
>
> "इसमें बेशर्म की क्या बात है?...हक बनता है मेरा"....
>
> "वो कैसे?"...
>
> "कैसे....क्या?...वो खुद भी तो कई बार....
>
> "आपका कच्छा ढीला कर देती है?"...
>
> "नहीं!....टाईट....ढीला तो मैं अपने आप खुद ही कर लेता हूँ"....
>
> "ओह!...अच्छा...समझ गया"....
>
> "क्या?"...
>
> "यही की आपका उससे और उसका आपसे टांका भिड़ा हुआ है"....
>
> "पागल हो गए हो क्या तुम जो उस जैसी नेक एवं पावन... सती-सावित्री टाईप की
> स्त्री पर ऐसी घटिया तोहमत लगा रहे हो?"...
>
> "मैं लगा रहा हूँ?"...
>
> "और नहीं तो क्या मैं लगा रहा हूँ?"...
>
> "कच्छा ढीला किसने करना है?"...
>
> "मैंने"....
>
> "तो फिर घटिया कौन हुआ?"...
>
> "कौन हुआ?"...
>
> "तुम हुए"....
>
> "वो कैसे?"...
>
> "कच्छा किसका है?"....
>
> "मेरी बीवी का"...
>
> "बीवी का या उसकी सहेली का?"...
>
> "एक ही बात है"....
>
> "एक ही बात कैसे है?...बीवी...बीवी होती है और सहेली...सहेली"...
>
> "जी!...सो तो है"...
>
> "तो फिर कच्छा किसका है?"...
>
> "मेरा"....
>
> "मेरा?"...
>
> "नहीं!...मेरा"...
>
> "लेकिन कैसे?"...
>
> "कैसे...क्या?...*जिसकी लाठी...उसकी भैंस*"...
>
> "मैं कुछ समझा नहीं"....
>
> "क्या नहीं समझे?...लाठी या भैंस?"...
>
> "भ्भ...भैंस"....
>
> "भैंस?"...
>
> "न्न... नहीं!...लाठी?".....
>
> "लाठी?"...
>
> "न्न!.... नहीं...कच्छा"....
>
> "कच्छा?"...
>
> "ह्ह...हाँ!...कच्छा?"...
>
> "बहुत अच्छा"...
>
> "क्या बहुत अच्छा?"....
>
> "कच्छा"....
>
> "मैं कुछ समझा नहीं"...
>
> "अरे!...भाई...कच्छा तो सचमुच में बड़ा ही अच्छा था....तभी तो मेरा दिल उस पर आ
> गया था"...
>
> "यू मीन टू से दैट आपका दिल अपनी बीवी की सहेली पर नहीं बल्कि उसके उस कच्छे पर
> आ गया था जो उसने पहना हुआ था?"...
>
> "तुम पागल हो?"...
>
> "कैसे?"...
>
> "उसने कौन सा कच्छा पहना है?...इस बारे में मुझे कैसे पता होगा?"...
>
> "तो फिर तुम्हें किस बात का पता था?"...
>
> "इसी बात का कि उस कच्छे को...उस दिन उसने नहीं पहना था"मैं एक-एक शब्द को चबा
> कर बोलता हुआ बोला...
>
> "वो कैसे?"...
>
> "कैसे...क्या?....मैंने उस दिन उसे...उसकी बालकनी में नहा कर सूखते हुए देख
> लिया था"....
>
> "सहेली को?"....
>
> "नहीं!...उसके कच्चे को"...
>
> "तो?"...
>
> "तो क्या?...आँधी आई और....
>
> "और उड़ गया कच्छा?"...
>
> "जी!...
>
> "बहुत अच्छा"....
>
> "क्या बहुत अच्छा?"...
>
> "यही कि उसका कच्छा उड़ा और आपने लपक लिया"...
>
> "जी!...
>
> "गुड!....ये तो वही बात हुई कि *यार ने ही लूट लिया कच्छा यार का*"...
>
> "जी!...बिलकुल...
>
> "आपको लाज ना आई?"...
>
> "जब उसे नहीं आई तो मुझे भला क्यों आएगी?"...
>
> "मैं कुछ समझा नहीं"...
>
> "पिछली बार जब हमारा कच्छा उड़ा था तो उसने लपक लिया था"....
>
> "दैट्स नाईस".....
>
> "क्या नाईस?....पूरे तीन दिन बाद वापिस किया था वो भी...
>
> "ढीला करके?"....
>
> "नहीं!...टाईट करके"...
>
> "तो?"...
>
> "तो क्या?...हम भी उसे तीन दिन बाद वापिस कर देंगे"...
>
> "ढीला करके?"...
>
> "नहीं!...टाईट करके"...
>
> "ओह!...अच्छा"...
>
> "जी!....
>
> "वैसे!...अब कहाँ है?"...
>
> "बीवी?"...
>
> "नहीं!...
>
> “उसकी सहेली?"...
>
> "नहीं!... उसका कच्छा"...
>
> "यहीं है"...
>
> "नर्स ने पहना है?"मैं जाती हुई नर्स को ऊपर से नीचे तक गौर से देखता हुआ
> बोला... ...
>
> "नहीं!...मैंने"...
>
> "अ...आपने?"...
>
> "हाँ!...मैंने"...
>
> "आप मेरे साथ मज़ाक कर रहे हैं ना?"...
>
> "तुम क्या मेरे साली हो जो मैं तुम्हारे साथ मज़ाक करूंगा?...मज़ाक तो उलटा मेरे
> साथ मेरी बीवी ने किया है"डाक्टर साहब रूआँसे स्वर में बोले...
>
> "वो कैसे?"...
>
> "मेरा कच्छा ना धो के"...
>
> "ओह!...
>
> "इसलिए तो आज मजबूरी में ये टाईट वाला लेडीज कच्छा पहन के काम चलाना पड़ रहा
> है"... ..
>
> "ओह!...
>
> "मजबूरी जो कराए...कम है"...
>
> "जी!...ये बात तो है... *मजबूरी जो कराए...कम है*"....
>
> [image:
> briefs-271x300]<http://lh4.ggpht.com/-WEkr-XJMndw/ToFM-c_5HyI/AAAAAAAAG2M/gtz_9NU4JV8/s1600-h/briefs-271x300%25255B2%25255D.jpg>
>
> *क्रमश:*
>
> ***राजीव तनेजा***
>
> http://hansteraho.com
>
> rajivta...@gmail.com
>
> +919810821361
>
> +919213766753
>
>
>
> --
> Posted By राजीव तनेजा to हँसते
> रहो<http://www.hansteraho.com/2011/09/blog-post_27.html>on 9/27/2011
> 09:41:00 AM
>
>
>
> --
> राजीव तनेजा
> हँसते रहो Hanste Raho
>
> http://www.hansteraho.com
>
> Rajiv's Yahoo Group
>
> http://movies.groups.yahoo.com/group/fun_masterg9/
>
> +919213766753, +919810821361
>
>
> --~--~---------~--~----~------------~-------~--~----~
> कृपया हिन्दी कविताओं को देवनागरी में टंकणित करने का प्रयास करें।
> यदि आप नये हैं तो http://uninagari.kaulonline.com टूल को आजमायें। हिन्दी में
> लेखन आपके हिन्दी प्रेम का द्योतक है।
> हिन्दी टूलकिट डाउनलोड करने के लिए नीचे दिए हुए लिंक पर जाएँ
> http://cid-e984d9afe36362b0.skydrive.live.com/browse.aspx/setups
>


--
A S Gangurde

rituraj ddd

unread,
Oct 24, 2011, 9:40:21 AM10/24/11
to hanst...@googlegroups.com
Sir,
 
Aapki kvitaye itne acchchi lagti h phir is group ko kyo chod rhe h ?
 
Mera aapse namra nivedan h ki aap is group ko na chode or hme apni kvitao ka lutf uthane de.
 
aapka prashanshak
Rituraj

2011/10/20 Ashok Gangurde <as.ga...@gmail.com>

girish pankaj

unread,
Oct 25, 2011, 12:35:04 AM10/25/11
to hanst...@googlegroups.com
आदरणीय,
दीपोत्सव
की हार्दिक शुभकामनाएँ 
हर चेहरा मुस्कान भरा हो,
हर आँगन नाचे खुशहाली.
जिस दिन ऐसी दुनिया देखें,
समझे तब सच्ची दीवाली.

गिरीश पंकज

२४ अक्तूबर २०११ ७:१० अपराह्न को, rituraj ddd <ritur...@gmail.com> ने लिखा:



--
गिरीश पंकज
संपादक, " सद्भावना दर्पण"
सदस्य, " साहित्य अकादमी", नई दिल्ली.
जी-३१,  नया पंचशील नगर,
रायपुर. छत्तीसगढ़. ४९२००१
मोबाइल : ०९४२५२ १२७२०
1- http://sadbhawanadarpan.blogspot.com
2 - http://girishpankajkevyangya.blogspot.com
3 -http://girish-pankaj.blogspot.com

Ashok Gangurde

unread,
Oct 27, 2011, 4:26:23 PM10/27/11
to hanst...@googlegroups.com
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A S Gangurde

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