गंगा की 10 लाख किमी की 18 लाख जलधाराएं गायब

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Gopal Krishna

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May 26, 2026, 6:16:15 AM (11 days ago) May 26
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Source: https://www.nature.com/articles/s41598-025-08841-2 

 IIT धनबाद की टीम ने 7 छोटी नदियों व उनके 56 वाटरशेड्स का किया अध्ययन

गंगा की 10 लाख किमी की 18 लाख जलधाराएं गायब

रवि मिश्रा | दैनिक भास्करI धनबाद

पिछले 50 वर्षों में गंगा नदी की करीब 18 लाख जलधाराएं गायब हो गई हैं। हम रोज औतसन ११ प्राकृतिक जलधाराएं खो रहे हैं। यह खुलासा आईआईटी धनबाद के शोध में हुआ है। यह संस्थान के पर्यावरण विज्ञान इंजीनियरिंग विभाग प्रो. अंशुमाली और उनकी टीम ने किया है। उन्होंने झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में 7 छोटी नदियों और उनके 56 वाटरशेड्स का अध्ययन किया, जो गंगा में जाकर मिलती हैं। 

टीम ने पाया कि आधे दशक में हर दिन करीब 55 किमी के औसत से 10 लाख कमी की जलधाराएं गुम हो गईं। जल निकास घनत्व भी दो किमी से घटकर 0.9 किमी रह गया है। अंधाधुंध भूमि उपयोग, कृषि विस्तार, बुनियादी ढांचे का विकास, कोयला - खनिज खनन और अनियंत्रित रेत खनन जैसी वजहों से नदियां सिकुड़ती गईं। -
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ये छोटी नदियां गंगा की धाराओं को प्रबल बनाती हैं नदी
कतरी दामोदर
• खुदिया-बराकर- दामोदर
-संगम (गंगा) हुगली (गंगा)
बांकी-नॉर्थ कोयल-सोन गंगा
• दानरो-नॉर्थ कोयल-सोन गंगा
खुदार-केन-यमुना गंगा
गंगा उर्मिल-केन-यमुना
• बोदला -बेतवा - यमुना गंगा
(कतरी और खुदिया नदियां झारखंड के धनबाद जिले, दानरो व बांकी नदियां गढ़वा जिले से होकर बहती हैं। वहीं, खुदार व उर्मिल नदियां एमपी के छतरपुर और बोदला नदी मध्य प्रदेश में बहती है। )

अंधाधुंध भूमि उपयोग, अनियंत्रित खनन इसकी बड़ी वजह
सुझाव ... सरकारी योजनाओं में संशोधन से भी प्राकृतिक धाराओं का पुनरुद्धार संभव पहले देश की जमीन का 9-10% हिस्सा रिवर बेसिन में आता था। अब यह घटकर 0.5-3% रह गया है। ऐसे में कृषि, शहरी, औद्योगिक और संरक्षित क्षेत्रों में नदियों को उनके पुराने स्वरूप
लाने के लिए भूमि अधिग्रहण जरूरी हो गया है। नमामि गंगे, जल जीवन मिशन जैसी सरकारी योजनाओं में संशोधन कर अगर नदियों के लिए जमीन अधिग्रहण को जोड़ लिया जाए, तो उससे भी प्राकृतिक धाराओं का पुनरुद्धार संभव है।

बचाव.... नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को बचाने के लिए जमीन अधिग्रहण किया जाए केंद्र सरकार के पास नदी बेसिनों के नुकसान का डेटा नहीं है। ऐसे में जरूरी है कि जलधाराओं की संख्या, लंबाई और जल निकास घनत्व में कमी के आधार पर नदी लाल सूची श्रेणियों - मानदंडों को लागू किया जाए। नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को बचाने के लिए जमीन का अधिग्रहण किया जाए। एक डेडिकेटेड सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना हो, जो वाटरशेड के संदर्भ-वर्ष और वर्तमान वर्ष के आंकड़े तैयार करे। निगरानी करे।

• असर.... भूजल की कमी के साथ बादल फटने, भूस्खलन, बाढ़ जैसी आपदाएं बढ़ रहीं प्रो. अंशुमाली बताते हैं कि उनकी टीम ने 7 प्रमुख वाटरशेड्स (छोटी नदियां ) और 56 सब- वाटरशेड्स का अध्ययन किया। इसमें वाटरशेड के वृक्षाकार जालतंत्र की बनावट में गिरावट के कारण गंगा नदी बेसिन के क्षेत्रों में बादल फटने, भूस्खलन, अचानक बाढ़, भूजल की कमी और मरुस्थलीकरण जैसी आपदाएं बढ़ रही हैं।

टीम ने अपने शोध में नदी बेसिनों के संरक्षण के लिए नए कानून बनाने और उनके पुनरुद्धार के लिए जमीन का अधिग्रहण करने की जरूरत बताई है।

भास्कर नॉलेज • 2023 के संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन में लॉन्च हुआ था फ्रेशवाटर चैलेंज : साल 2023 के संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन में फ्रेशवाटर चैलेंज को लॉन्च किया गया था। उसका मुख्य उद्देश्य मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करना और उन्हें पुनर्जीवित करना है। इसके तहत साल 2030 तक दूषित और क्षतिग्रस्त 3 लाख किमी नदियों को बहाल करना और 350 मिलियन हेक्टेयर वेटलैंड का जीर्णोद्धार करना है। 

प्रो. अंशुमाली कहते हैं कि अगर भारत में जलधाराओं के आकार व रूप के सत्यापन और संरक्षण की शुरुआत जल्द नहीं की गई, तो फ्रेशवाटर चैलेंज के लक्ष्यों को हासिल करना मुश्किल हो जाएगा।

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