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Date: Wed, 4 Dec 2013 13:55:26 +0530
Subject: Lekh : दुष्कर्म और जजों की दुविधा
To:
दुष्कर्म और जजों की
दुविधा<
http://www.vpvaidik.com/%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7>
नया इंडिया, 04 दिसंबर 2013 : सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अशोक
गांगुली के बचाव में कैसे-कैसे लोग क्या-क्या बोल रहे हैं? खुद गांगुली कह रहे
हैं कि उनकी तुलना तेजपाल से न की जाए। क्यों न की जाए? क्या इसलिए कि तेजपाल
पत्रकार है और आप न्यायाधीश हैं? क्या पत्रकार की कोई इज्जत नहीं होती? क्या
मान-हानि सिर्फ जजों की ही होती है? अत्याचार या अपराध कोई भी करे, खबर सभी की
ली जानी चाहिए। और जो अपने आपको औरों से ज्यादा महत्वपूर्ण समझें, उसकी खबर तो
और भी ज्यादा ली जानी चाहिए। भारतीय न्यायशास्त्रों में इसका जोरदार समर्थन हुआ
है। यदि महामात्य और उसका भृत्य एक ही तरह का अपराध करें तो महामात्य की सजा
उससे कई गुना कठोर होती है। गांगुली के मामले में आरोप लगानेवाली विधि-
प्रशिक्षु, कन्या को जांच करने वाले तीनों जजों के रवैए ने परेशान और शर्मिंदा
किया ही था, अब पूर्व प्रधान न्यायाधीश और महान्यायवादी ने भी ऐसे बयान दे डाले
हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से गांगुली का पक्ष लेते हैं। दोनों की राय है कि ऐसे
आरोप तो लगते ही रहते हैं। आरोपों का क्या? कोई भी कुछ भी आरोप लगा सकता है।
गांगुली आजकल जिस पद पर हैं (बंगाल के मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष), उससे वे
इस्तीफा क्यों दें? याने वे उसकी जांच-रिपोर्ट आने तक अपने पद पर टिके रहें। इन
सज्जनों ने यह भी पूछा है कि रिपोर्ट में अगर गांगुली सही-सलामत निकल आते हैं
तो फिर उनका क्या होगा? इसमें शक नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय के जज और मानव
अधिकार आयोग के अध्यक्ष के नाते गांगुली ने अनेक ऐतिहासिक फैसले किए हैं और
उनकी दक्षता की छाप उनके सहयोगियों पर अब भी बनी हुई है लेकिन उन पर लगे
दुष्कर्म के आरोपों का खंडन उन्होंने जिस दबी जुबान से किया है, उसी ने उन्हें
कठघरे में खड़ा कर दिया है। यदि गांगुली या किसी पर भी कोई चरित्र-हनन का इतना
गंभीर आरोप निराधार ही लगा दे तो उसकी प्रतिक्रिया कितनी भयंकर हो सकती है,
इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। चरित्र-हनन तो शरीर-हनन याने हत्या से भी अधिक
जघन्य-कर्म है। यदि यह आरोप निराधार था तो जस्टिस गांगुली ने उस लड़की को कठोर
सजा देने की बात इशारे से भी क्यों नहीं कही? वास्तव में कोई उच्च पदस्थ जज ऐसे
मामले में उलझ जाए, यह तथ्य सारे जजों को व्यथित करने वाला है। इसीलिए जांच
करने वाले जजों ने अपनी जांच में भी जरा सख्ती दिखाई होगी। इसी सख्ती से वह
लड़की परेशान हो गई होगी। अब उनके सामने यह दुविधा भी होगी कि उस जांच के
नतीजों को सार्वजनिक कैसे करें? यदि गांगुली का दोष पाया गया तो सभी के लिए
पसोपेश होगा और यदि गांगुली निर्दोष होंगे तो उस प्रशिक्षु कन्या को सजा दी जाए
या नहीं? यदि दी जाए तो क्या दी जाए?
दीक्षांत को गाउन की गुलामी से मुक्त
करें<
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नया इंडिया, 1 दिसंबर 2013 : वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में
एक अत्यंत प्रतिभाशाली स्नातक ने नया इतिहास बनाया। सुमनचंद्र पंत नामक इस
स्नातक ने दीक्षांत समारोह के अवसर पर काला गाउन पहनने से इंकार कर दिया। उसने
कहा मैं अपने धोती, कुर्ते और शॉल में ही अपनी उपाधि (साहित्याचार्य) ग्रहण
करुंगा। गाउन वगैरह गुलामी के प्रतीक हैं। अंग्रेजों के अवशेष हैं। इस पवित्र
दीक्षांत के अवसर पर मैं उनको धारण नहीं करुंगा। ज्यों ही राज्यपाल बी.एल. जोशी,
उप-कुलपति विंदाप्रसाद मिश्र आदि मंच पर पहुंचे, अफसरों ने पंत से दुबारा आग्रह
किया कि वह गाउन पहने। पंत नहीं माने। उनकी देखादेखी कुछ अन्य स्नातकों ने भी
गाउन का विरोध किया। इन सभी स्नातकों को विवि के अधिकारियों ने निकाल बाहर
किया। उप-कुलपति का कहना है कि यह सब ‘नाटक’ था। ऐसे उपकुलपति को और वह भी
संस्कृत विश्वविद्यालय के उपकुलपति को और संपूर्णानंदजी के नाम पर बने विवि के
उप-कुलपति को तो अविलंब बर्खास्त किया जाना चाहिए।
इस विवि का उप-कुलपति तो संस्कृतज्ञ होना चाहिए लेकिन यह कैसे संस्कृतज्ञ है,
जिसे भारत की परंपराओं का ज्ञान नहीं है? क्या उसे पता नहीं कि हमारे गुरुकुलों
में दीक्षांत समारोह कैसे होते थे? इस विवि को तो अंग्रेजों की गुलामी छोड़ने
और भारतीय परंपरा का समारंभ करने में अग्रणी होना चाहिए था लेकिन उसके छात्रों
ने जो सही रास्ता दिखाया, उसे भी दुराग्रही अधिकारी मानने को तैयार नहीं है।
जिस छात्र सुमन पंत ने यह मांग की थी, उसे नौ स्वर्ण पदक मिल चुके हैं। पंत और
उसके साथियों का वाराणसी में सार्वजनिक अभिनंदन आयोजित किया जाना चाहिए। वि.वि.
का यह बहाना बिल्कुल असत्य है कि ऐन वक्त पर उठाई गई मांग को वह कैसे पूरा करता?
वास्तव में पंत ने इस बारे में उ.प्र. के राजभवन को काफी पहले लिख दिया था।
जुलाई 2013 में एक अन्य स्नातक उमेशचंद्र शुक्ला ने भी राज्यपाल को लिख दिया
था। राज्यपाल बी एल जोशी एक निष्ठावान संस्कृतप्रेमी हैं और स्वयं अत्यंत
संस्कारवान व्यक्ति हैं। आश्चर्य है कि वे भी इस मामले में मौन रहे। हो सकता है
कि उनके अफसरों ने इसे छोटा-मोटा मामला समझकर उन्हें कुछ बताया ही नहीं। लेकिन
अब जोशीजी से उम्मीद की जाती है कि वे उप-कुलपति को फटकार लगाएं और विवि के
कुलपति के नाते वे इन गाउनविरोधी स्नातकों के लिए वाराणसी या लखनऊ राजभवन में
विशेष दीक्षांत समारोह का आयोजन करें। दीक्षांत में गाउन का विरोध केंद्रीय
मंत्री जयराम रमेश भी कर चुके हैं। जरुरी यह है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय (
भ्रष्ट नाम-मानव संसाधन) समस्त राज्य सरकारों और सारे विश्वविद्यालयों को जरुरी
निर्देश भेजे कि वे दीक्षांत समारोहों को इस गाउन की गुलामी से मुक्त करें।
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