II JAIGURUDEV II, II NAMO BUDHAYA II, II OM VANDE MAATRAM II
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From:
Baba Jaigurudev <babajai...@gmail.com>
Date: 2010/11/29
Subject: jaigurudev news-30.11.2010
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जयगुरूदेव समाचार
मथुरा 29 नवम्बर 2010
मथुरा आश्रम पर सेवादारों के आने से सेवाऐं तेजी से आरम्भ हो गई हैं।
विभिन्न सेवाओं में सेवादार तेजी से लगे हैं और उनका प्रयास है कि समय से
सभी व्यवस्थायें सुचारू रूप से आरम्भ हो जाऐं। मन्दिर की सजावट हो रही है
पर रात में जब उसे जांचने के लिए चलाया जाता है तो अति मनोहारी दृश्य
दिखता है। परम पूज्य स्वामी जी महाराज आश्रम पर ही हैं।
लोग सुमिरन ठीक से नहीं करते। जो पाँचों नामों का भेद दिया है उसका
सुमिरन करते समय लोग माला फेरते हैं परन्तु मन संसार में रमा रहता है। दो-
चार-दस दाने तो नाम के सुमिरन में निकले फिर 10-15 दाने और निकल गए पर मन
कहाँ चला गया यह पता नहीं। यह मन तो संसार के कामों के चिन्तन में लग
गया। कुछ लोग सुमिरन करते समय तरह-तरह की गुनावनों में लगे रहते हैं। कुछ
लोग झपकी लेते रहते हैं। यह पता भी नहीं चलता कि क्या सुमिर रहे हैं। कुछ
को जब ख्याल आता है तो यह भी याद नहीं रहता कि सुमिरन किस नाम का कर रहे
थे। इस प्रकार के सुमिरन से तो कोई लाभ नहीं हो सकता और जो सुमिरन ठीक
नहीं कर सकता है वह ध्यान नहीं कर सकेगा। और जो सुमिरन तथा ध्यान नहीं कर
सकते वह भजन कैसे करेंगे। सुमिरन ही परमार्थ की कुँजी है। बिना इसकी
सहायता के कोई भी इस ओर नहीं चल सकता। सभी महात्माओं ने इसकी प्रधानता
रखी है। सुमिरन ही में हर स्थान के धनी प्रसन्न होकर अपने द्वार खोल
देते हैं तब वह जीव आगे जा सकता है।
हर महात्मा ने यद्यपि वे पूर्ण गति को प्राप्त थे तथा संत थे बराबर
सुमिरन किया है। सुमिरन अंतिम स्वाँस तक करना पड़ेगा। एक बार मैंने अपने
स्वामी जी महाराज से पूछा कि स्वामी जी आप सुमिरन क्यों करते हैं, आपको
इसकी क्या जरूरत है ? कहने लगे ‘‘बेटे! सुमिरन तो अन्त समय तक करना है
क्योंकि सुमिरन तो स्थान के धनियों का होता है। उनके इस काल देश में जब
तक यह शरीर है तब तक उनका सुमिरन करने से वे प्रसन्न रहते हैं। वैसे तो
पूर्ण पुरूष हर प्रकार से सर्व समर्थ होते हैं परन्तु फिर भी सुमिरन कभी
नहीं छोड़ते। अब यह तो वे जाने कि उसका फल वे किसको देते हैं।
तो सुमिरन बिलकुल ठीक से करो। यही परमार्थ की कुँजी है। सुमिरन करते समय
जिस धनी के नाम का सुमिरन करते हो उसी के रूप का ध्यान हो। मन को वहीं
लगाए रहो। जब रूप का चिंतन होगा तो उस रूप से प्यार होगा। रूप में प्यार
होगा तो हर स्थान के धनी के रूप में ही मध्य में गुरू का स्वरूप विद्यमान
है। स्वरूप का ध्यान करते हुए सुमिरन का ध्यान करते हुए सुमिरन करने पर
वह प्रकट हो जाता है। उस रूप से खूब प्यार हो तब ध्यान बनेगा। ध्यान के
बनने पर भजन भी बनेगा। जो लोग सुमिरन ठीेक से नहीं करते उनका साधन बन ही
नहीं सकता है। सुमिरन बिना नागा हमेशा करना चाहिऐ।
सुमिरन का समय पूर्ण निश्चित होना चाहिए, ध्यान और भजन तो चाहे जब भी कर
सकते हैं, परन्तु सुमिरन का एक निश्चित समय होना चाहिए। उसी समय प्रतिदिन
सुमिरन ठीक से चित्त को स्थिर करके मन लगाकर बड़े प्रेम से करना चाहिए।
जिस धनी का नाम सुमिर रहे हों उसी के रूप का ध्यान होना चाहिए।
स्थान के धनी जब तक प्रसन्न नहीं होगें वे आगे रास्ता नहीं देंगे इस लिए
जीव कभी आगे जा ही नहीं सकेगा। जब धनी के रूप का सुमिरन बड़े प्यार से
करते हैं तो वह धनी प्रसन्न होकर अपनी ध्वनि देता है। उसकी ध्वनी के
सहारे तब जीव आगे चलता है। धनी प्रसन्न होकर जब अपना मुख खोल देता है तो
उसे आगे जाने का मार्ग मिलता है।
गुरू का स्वरूप हर स्थान पर है। हर धनी के रूप के भीतर गुरू का स्वरूप
मौजूद है। बड़े प्यार से उसे प्रकट कर लेना चाहिए। जब गुरू अन्तर में
प्रकट हो जाते हैं तो वे जीव को अपने संग-संग आगे ले जाते हैं। गुरू के
ही स्वरूप के सहारे आगे की रसाई होती है। और अन्तर के सूक्ष्मकाल माया के
अंग दूर किए जाते हैं।