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नेताजी अब छोड़कर, दिल्ली और भोपाल।
गांव-गांव में आ गए, लगन लगी चौपाल।।
कंबल कपड़े बॅट रहे, बॅट रहे हैं नोट।
यह तो मत का दान नहीं, बेंच रहे हैं नोट।।
रमुआ भी लगाये है, बड़े दिनों से आस।
कपड़े साथ लायेंगे, मंत्री जी के खास।।
झण्डे-बैनर से अटे, वाहन और दीवार।।
नेताजी ने दस्तक दी, जनता के घर द्वार।।
चारा, शक्कर, यूरिया, भ्रष्टाचार, ब्याज।
उल्टे लटके खूंटी पर, फिर मुद्दा बनी प्याज।।
पीपल, पनघट, आंगना, रंगे चुनावी रंग।
आम सभा, भाषण शुरू, आरोपों की जंग।
छुरा, रिवाल्वर साथ में, बॅटने लगी शराब।
गांवों में दहशत बनी, बढ़ने लगा तनाब।।
शतरंजी चालें चलीं, साम-दाम-दण्ड-भेद।
औ चमक रहे ऊपर से, कुरता टोप सफेद।।
चलते चुनावी रण में, जाती धर्म के तीर।
उतर गये रण में सभी, राजनीति के वीर।।
नेताओं, मंत्रिओं के, बदल गये हाव-भाव।
शासक ही बने सेवक, लो आ गए चुनाव।।
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Posted By दुनिया भर की to
दुनिया भर की on 11/01/2008 08:53:00 AM