PRSEC/E/2025/0071061
संबंधित विभाग : दिल्ली सरकार
दिल्ली के प्रत्येक जिले में गौशालाओं की स्थापना का सरकार का हाल ही का निर्णय अत्यंत सराहनीय, दूरदर्शी एवं समयोचित है। यह पहल न केवल निराश्रित एवं बेसहारा गौवंश के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि शहरी स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण तथा सतत विकास के लक्ष्यों को भी सुदृढ़ करती है। इस निर्णय के लिए मैं सरकार की भूरी-भूरी प्रशंसा करता हूँ।
गौशालाओं की स्थापना से उत्पन्न होने वाले संसाधनों, विशेषकर गोबर, का यदि वैज्ञानिक एवं योजनाबद्ध ढंग से उपयोग किया जाए, तो यह पहल बहुआयामी लाभ प्रदान कर सकती है। इस संदर्भ में मेरा विनम्र सुझाव है कि सभी प्रस्तावित एवं संचालित गौशालाओं में स्थापना के प्रथम दिन से ही गोबर के 100% उपयोग को अनिवार्य किया जाए तथा इसके लिए स्पष्ट, लिखित एवं निगरानी-युक्त नियम बनाए जाएँ। गोबर को ईंधन-ईंटों (ब्रिकेट्स) अथवा उपलों के रूप में ढालकर श्मशान घाटों में दाह-संस्कार हेतु प्रयोग किया जा सकता है। इससे लकड़ी एवं अन्य पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम होगी, वनों के संरक्षण में सहायता मिलेगी तथा दाह-संस्कार की प्रक्रिया अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनेगी। चूँकि गोबर एक पूर्णतः प्राकृतिक एवं नवीकरणीय ईंधन है, इसलिए इसका उपयोग कार्बन उत्सर्जन को भी सीमित करने में सहायक सिद्ध होगा।
इसके अतिरिक्त, यह अत्यंत आवश्यक है कि गौशालाओं से उत्पन्न किसी भी प्रकार के गोबर या उससे बने अपशिष्ट को सीवर तंत्र, नालों या जल स्रोतों में न बहाया जाए। ऐसा करने से जल-प्रदूषण, सीवर जाम तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसके स्थान पर गोबर का उपयोग खाद, जैव-ईंधन, या अन्य उपयोगी उत्पादों के निर्माण में किया जाना चाहिए।
यदि इस पूरी व्यवस्था के लिए एक समर्पित संचालन तंत्र, प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा नियमित निरीक्षण प्रणाली विकसित की जाए, तो यह योजना आत्मनिर्भर भी बन सकती है तथा स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी सृजित कर सकती है। साथ ही, यह पहल “स्वच्छ भारत”, “हरित ऊर्जा” एवं पर्यावरण संरक्षण जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों को भी प्रत्यक्ष रूप से सुदृढ़ करेगी।
अतः मैं सरकार से निवेदन करता हूँ कि गौशालाओं की स्थापना के साथ-साथ गोबर के पूर्ण, वैज्ञानिक एवं पर्यावरण-अनुकूल उपयोग हेतु ठोस नीति एवं दिशानिर्देश जारी किए जाएँ।