व्यथा: सोशल मीडिया एवं सार्वजनिक मंचों पर राष्ट्रविरोधी बयानों के संज्ञान तथा चुनावी पात्रता से संबंधित नियमों में संशोधन

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Sanjeev Goyal

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Dec 29, 2025, 9:46:04 AM (12 days ago) 12/29/25
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PMOPG/E/2025/0196444


 संबंधित मंत्रालय/आयोग : भारत निर्वाचन आयोग

 

हमारे लोकतांत्रिक राष्ट्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक नागरिक का एक मौलिक अधिकार है, किंतु यह स्वतंत्रता निरंकुश नहीं हो सकती और इसे राष्ट्र की एकता, अखंडता, संप्रभुता एवं सामाजिक सद्भाव के विरुद्ध प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। दुर्भाग्यवश, वर्तमान समय में यह देखने में आ रहा है कि कुछ व्यक्ति, विशेषकर राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े लोग, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में सोशल मीडिया एवं अन्य सार्वजनिक मंचों पर खुलेआम राष्ट्रविरोधी एवं समाजविरोधी बयान देते हैं।

 

यह अत्यंत चिंताजनक तथ्य है कि ऐसे बयान देने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध न तो समय पर प्रभावी कार्रवाई होती है और न ही उनके चुनाव लड़ने की पात्रता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। परिणामस्वरूप, राष्ट्र की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले व्यक्ति लचर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का लाभ उठाकर चुनाव लड़ते हैं और उच्च मंत्री पदों तक भी पहुँच सकते हैं।

 

यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जब किसी उम्मीदवार के नामांकन के समय उसके शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों, आय-व्यय विवरण, संपत्ति, आपराधिक पृष्ठभूमि तथा अन्य दस्तावेजों की विस्तृत जांच की जाती है, तो उसके द्वारा सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म या अन्य सार्वजनिक मंचों पर दिए गए वक्तव्यों को इस जांच प्रक्रिया में क्यों शामिल नहीं किया जाता। क्या राष्ट्र या सेना के प्रति अपमानजनक, विभाजनकारी या राष्ट्रविरोधी विचार व्यक्त करने वाला व्यक्ति जनप्रतिनिधि बनने के लिए उपयुक्त माना जा सकता है?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यदि तुलना की जाए, तो अमेरिका जैसे देशों में सोशल मीडिया पर देशविरोधी विचार व्यक्त करने मात्र से किसी अन्य व्यक्ति को देश में प्रवेश तक की अनुमति नहीं दी जाती। इसके विपरीत, हमारे देश में ऐसे वक्तव्य देने वाले व्यक्ति को चुनाव लड़ने और शासन व्यवस्था का हिस्सा बनने की अनुमति मिलना एक गंभीर नीतिगत विरोधाभास को दर्शाता है।

यह स्थिति न केवल लोकतंत्र की आत्मा के विपरीत है, बल्कि यह राष्ट्र की सुरक्षा, सामाजिक एकता और भावी पीढ़ियों के लिए भी गंभीर संदेश देती है। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह प्रवृत्ति और अधिक प्रोत्साहित होगी।

अतः यह विनम्र निवेदन है कि भारत निर्वाचन आयोग इस विषय पर गंभीरता से संज्ञान ले तथा चुनाव सुधारों के अंतर्गत ऐसे स्पष्ट एवं कठोर प्रावधान किए जाएँ, जिनके अंतर्गत:

  • चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के सोशल मीडिया एवं सार्वजनिक बयानों की जांच की जा सके,

  • राष्ट्रविरोधी, संविधान-विरोधी या समाज को विभाजित करने वाले वक्तव्यों को अयोग्यता का आधार बनाया जाए,

 

जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गरिमा एवं राष्ट्रहित की रक्षा सुनिश्चित की जा सके। यह कदम न केवल लोकतंत्र को सुदृढ़ करेगा, बल्कि राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को भी सशक्त करेगा।

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