| 22-03-26 | प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' | रिवाइज: 07-04-09 मधुबन |
कारण शब्द से मुक्त रह चलन और चेहरे से मुक्ति देने वाले मुक्तिदाता बनो, सेवा के उमंग-उत्साह के साथ सदा बेहद की वैराग्य वृत्ति में रहो
| वरदान:- | कर्म करते हुए कर्म के बन्धन से मुक्त रहने वाले सहजयोगी स्वत: योगी भव जो महावीर बच्चे हैं उन्हें साकारी दुनिया की कोई भी आकर्षण अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर सकती। वे स्वयं को एक सेकण्ड में न्यारा और बाप का प्यारा बना सकते हैं। डायरेक्शन मिलते ही शरीर से परे अशरीरी, आत्म-अभिमानी, बन्धन-मुक्त, योगयुक्त स्थिति का अनुभव करने वाले ही सहजयोगी, स्वत: योगी, सदा योगी, कर्मयोगी और श्रेष्ठ योगी हैं। वह जब चाहें, जितना समय चाहें अपने संकल्प, श्वांस को एक प्राणेश्वर बाप की याद में स्थित कर सकते हैं। |
| स्लोगन:- | एकरस स्थिति के श्रेष्ठ आसन पर विराजमान रहना - यही तपस्वी आत्मा की निशानी है। |
ये अव्यक्त इशारे- “निश्चय के फाउण्डेशन को मजबूत कर सदा निर्भय और निश्चिंत रहो"
यह निश्चय व स्मृति और समर्थी रखो कि अनेक बार बाप के बने हैं व मायाजीत बने हैं, तो अब बनना क्या मुश्किल है! क्या यह स्मृति स्पष्ट नहीं है कि मुझ श्रेष्ठ आत्मा ने विजयी बनने का पार्ट अनेक बार बजाया है? अगर स्मृति स्पष्ट नहीं है तो इससे सिद्ध है कि बाप के आगे स्वयं को स्पष्ट नहीं किया है।