जितने अपने थे सब पराये थे

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ASHOK KUMAR Gupta

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Jul 1, 2016, 4:41:23 PM7/1/16
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जितने अपने थे सब पराये थे 

जितने अपने थे सब पराये थे 
हम हवा को गले लगाये थे 
जितनी कसमें थी सब शर्मिंदा थी 
जितने वादे थे वो सर झुकाये थे 

जितने आंसू थे सब  बेगाने थे 
जितने मेहमान थे बिन बुलाये थे 
सब किताबेंपढ़ी पढ़ाई थी 
सारे किस्से सुने-सुनाये थे 
एक बंजर जमीन के सीने में 
मैंने कुछ आसमान उगाये थे '
सिर्फ दो घूँट प्यास कि खातिर 
उम्र भर धुप में नहाये थे 

हाशिये पे खड़े हुए हैं हम 
हमने खुद हासिये उगाये थे 
मैं अकेला उदास बैठा था '
सामने कभी हमने कहकहे लगाये थे 

है गलत उसको बेवफा कहना 
हम कहाँ दूध के धुले धुलाए थे 
आज काँटों भरा मुकद्दर है 
"खड्ग" कभी हमने भी गुल खिलाये थे

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