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to arbind kumar, Kharagpuri
विधि की विडम्बना
लिवर मोर के भगवान
जिनके अनेकों अनेक नौकर चाकर होते थे। जिनके जयकारे करते करते लोग थकते नहीं थे , वही आज विदेशी भूमि में बर्तन मांज रहे हैं और झाड़ू फ़टका लगा रहे हैं। यकायक ये देखकर भूषण की कुछ पंग्तियाँ याद आ गयीं। मित्र जुगरान टिप्पणी करें।
ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी,
ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं।
कंद मूल भोग करें कंद मूल भोग करें
तीन बेर खातीं, ते वे तीन बेर खाती हैं।
भूषन शिथिल अंग भूषन शिथिल अंग,
बिजन डुलातीं ते वे बिजन डुलाती हैं।
‘भूषन’ भनत सिवराज बीर तेरे त्रास,
नगन जड़ातीं ते वे नगन जड़ाती हैं॥
अर्थ -
(१) ऊंचे घोर मंदर – ऊंचे विशाल घर-महल / ऊंचे विशाल पहाड़
(२) कंद मूल – राजघराने में खाने के प्रयोग में लाये जाने वाले जायकेदार कंद-मूल वगैरह / जंगल में कंद की मूल यानि जड़
(३) तीन बेर खातीं – तीन समय खाती थीं / [मात्र] तीन बेर [फल] खाती हैं
(४) भूषन शिथिल अंग – अंग भूषणों के बोझ से शिथिल हो जाते थे / भूख की वजह से उन के अंग शिथिल हो गए हैं
(५) बिजन डुलातीं – जिनके इर्द गिर्द पंखे डुलाये जाते थे / वे जंगल-जंगल भटक रही हैं
(६) नगन जड़ातीं – जो नगों से जड़ी हुई रहती थीं / नग्न दिखती हैं।
DURGA PRASAD JUGRAN
unread,
Mar 17, 2017, 2:04:36 AM3/17/17
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to ASHOK KUMAR Gupta, Kharagpuri, arbind kumar
अतिशयोक्ति भले ही लगती हो,
लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में बीते दिन याद करके एक हूक तो उठती ही होगी।