चापलूसी का रिवाज हमारे देश में पुराने समय से ही चला आ रहा है .
और आज के इस गला काट प्रतिस्पर्धा के समय में आप अगर कहीं टिक सकते हैं तो वो दो तरीकों से पहला ये की आप इतने लायक हो की आपके आला अधिकारीयों को यानि बोस को आपकी योग्यता के आगे सभी नालायक लगे . दूसरा तरीका ये है की आप अपने वरिस्ट जनों की इतनी चापलूसी, चमचागिरी करें की वो इसका लोह...ा मान जाएँ और उनको ये लगने लग जाए की दफ्तर में काम नहीं होगा तो चलेगा पर चापलूसी नहीं हुई तो कम्पनी डूब जायेगी .. यानि सारा नफा नुकसान चापलूसी पर निर्भर हो जाएँ आपको वफादारी और चापलूसी के वो झंडे गाड़ने होंगे की सभी चापलूस आपकी चापलूसी और वफादारी के आगे मुहँ छुपाते फिरे .. और
इस बात की आपसे ट्यूशन करने पर मजबूर हो जाएँ.. मेने चापलूसी के बारे में एक बड़ा ही सुन्दर प्रसंग कहीं पढ़ा था जो ...हमारे वर्तमान में सरकारी और गैर सरकारी विभागों में अपने वरिस्ट जनों की चापलूसी करने वालों के लिए प्रेरणा स्रोत है .. बात अंग्रेजी शासन काल की है जब ..मध्यप्रदेश के किसी जिले में कोई अंग्रेज जिला कलक्टर हुआ करते थे ..सभी कर्मचारी, अधिकारी उनकी जी भर के चापलूसी करके अपनी वफादारी साबित करने के भरपूर प्रयास करते रहते थे. एक दिन उन्होंने एक थाली में कुछ वस्तुएं रख के उस थाली पर रुमाल ढँक दिया और सभी चापलूसों से पूछा की बताओ इस थाली में क्या है ..सभी चापलूस समवेत बोले ..हजूर इसमें गोल बैंगन हैं ..कलक्टर ने कहा बैंगन तो हैं पर गोल नहीं लम्बे वाले हैं . तो सब चापलूस बोले जी हाँ लम्बे वाले ही हैं ..अब कलक्टर को गुस्सा आया और बोला ..में जो कह रहा हूँ उसकी हाँ में हाँ क्यों मिला रहे हो अपनी भी तो राय दो ..इस पर सभी चापलूस बड़ी ही बेशर्मी से खिसिया कर बोले हजूर हम तो आपके पीछे हैं आप कहेंगे गोल हैं तो गोल ही होंगे और आप कहेंगे लम्बे हैं तो लम्बे ही होंगे ..इसे अंग्रेजी के सायीकोफेंसी कहते हैं .. चापलूस तो आज के ज़माने की अधिसंख्य आबादी हो गई है ..किसी भी दफ्तर में चापलूसी करना आजकल शिस्टाचार और सदाचार की श्रेणी में आता है.. पर मुद्दे की बात तो ये की कौन सबसे बड़ा चापलूस और वफादार है ..इसको अपने बोस के आगे प्रमाणित करना सबसे अहम् कार्य है .. और आजकल रातदिन इसी की होड़ लगी रहती है .. कोई अपने बोस के बच्चों को स्कूल छोड़ कर अपने आप को सबसे बड़ा चापलूस साबित करने का प्रयास करता है, तो कोई सब्जी तरकारी ला कर, तो कोई बोस के घर अपने गाँव से शुद्ध घी का डब्बा ला कर, तो कोई बिजली पानी के बिल जमा करवा के .. में कभी कभी ये सोचता हूँ की अब किसी के माथे पर तो ये नहीं लिखा है की फलाना अपने बोस का सबसे लाडला वाफ्दर चापलूस है या ढिमका है.. और इसका समाधान ढूंढने के लिए में सोचता हूँ की अब ईश्वर को भी नहीं पता था की ग़ुलामी और शुद्रता के कलयुग में मापदंड ही बदल जायेंगे और मानव रूपी चापलूस प्राणी को अपनी चापलूसी और वफादारी को साबित करने के लिए कठिनाई आने लग जायेगी और इस कार्य में भी बनावटीपन और फर्जीवाडा होने की आशंका हो जायेगी ..क्योंकि बोस किसी के मन में क्या है ये तो नहीं जान सकते ..तो फिर असली चापलूस और वफादार कौन है है ये रहस्य आसानी से खुल नहीं पायेगा .. मेरे मन में इसका समाधान सुझा वो ये था की अगर भगवान सबके पूंछ उगा दे तो इसका हल निकल आएगा ..भगवान नहीं भी उगा सके तो सभी चापलूस सर्जरी करवा कर पूंछ उगवा सकते हैं ..इससे फायदा ये होगा की सभी चापलूसों में पालतू कुत्तों के गुणधर्म विकसित हो जायेंगे.. दफ्तर में कार्य की गुणवत्ता बढ़ाने और अच्छे कर्मयोगी चापलूसों का पता लगाने या उनकी कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए कम्पनी द्वारा पूंछ की सर्जरी के लिए मेडिकल एड भी दिए जाने का प्रावधान हो सकता है ..और पूंछ का घाव भरे तब तक के मेडिकल अवकाश की व्यवस्था भी ..इसके लिए अलग से हेड भी सृजित किया जा सकता है .. सुबह दस बजे ज्योंही सभी बोस दफ्तर पहुंचेंगे सभी चापलूसों की पूंछे स्वत स्फूर्त यानि जिस प्रकार मालिक को देख कर कुत्ते की पूंछ स्वाभविक तौर पर हिलने लगती है उसी भाव से सभी चापलूसों की पूंछे भी हिलने लग जायेगी .. इस स्वामिभक्त आचरण से सभी मालिक स्वत ही समझ जायेंगे की उनके समक्ष दूम हिलाने वाले चापलूस वास्तव में चापलूसी कर अपनी वफादारी का परिचय दे रहें हैं या नाटक कर रहें हैं .. चापलूसी के इस अभिनव उपक्रम में जिसकी पूंछ सतत और तेजी से हिलती दुलती रहेगी वो उच्च स्तर का चापलूस प्रमाणित होगा..जिसे बोस दफ्तर के वार्षिक आयोजन पर अपने उल्लेखनीय कार्यों और नवाचार प्रयासों का उपयोग कर प्रगति कर दफ्तर को नवीनतम ऊँचाइयों पर पहुँचाने के लिए पदोन्नत और सम्मानित कर सकेंगे..और जो सतत पूंछ हिलाने में असफल रहेंगे उनके बारे में ये मान लिया जाएगा की उनका आचरण दफ्तर के अनुशासन के विरुद्ध है इस कारण दफ्तर के कार्यों का नुकसान हुआ है अतः क्यों ना ऐसे कर्मियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाए.. मुझे लगता है की इसके बाद सभी चापलूसों में इस बात की होड़ लग जायेगी की कौन कितनी देर तक अपनी पूंछ हिला कर बोस को अपनी चापलूसी और वफादारी का प्रमाण दे सकता है ..इस क्रम में कई चापलूस इस कार्य में इतने माहिर हो जायेंगे की उनको कई अन्य विभागों के बोस अपनी सरपरस्ती में लेने के लिए तेयार हो जायेंगे . होगा ये की किसी कम्पनी के छोटे बोस के पास ज्यादा चापलूसी करने वाला चापलूस होगा तो बड़ा बोस अपने छोटे बोस से कहेगा ..यार शर्मा तेरा ये चापलूस तो बड़ी गज़ब की चापलूसी करता है यार ..अब देख ना में आधे घंटे से तेरे केबिन में बैठा हूँ ,,मेरे आते ही चाय नाश्ते का इंतजाम तो इसने किया ही पर इसने मेरे जूते उतार कर अपने रुमाल से चमकाए और तभी से लगातार अपनी पूंछ मेरे सामने हिला रहा है ..भई में तो इसकी चापलूसी का कायल हो गया ..में तेरे प्रमोशन का बंदोबस्त करवा देता हूँ तू मुझे तेरे इस चापलूस को मेरे यहाँ भेज दे ..अरे यार मेरे वाले को कोई तमीज़ ही नहीं है जब आता हु तो एक बार पूंछ हिला कर बेठ जाता है अरे भी कोई बात हुई ..पूंछ है किसलिए अरे भई अपने बोस को देख के हिलाने के लिए ही तो है.. कई चापलूस जो अपनी पत्नियों से थर्राते हैं उनकी तो डबल ड्यूटी हो जायेगी दफ्तर में बोस के आगे पूंछ हिलाओ तो घर जाते ही पत्नी के आगे .. मुहल्ले की सभी पत्नियाँ जब कभी एक साथ बैठेंगी तो अपने अपने पतियों की पूंछ हिलाने की रफ्तार के बारे में चर्चा कर अभिभूत होंगी तो कोई अपने पति को कोसेगी की उसका पति बराबर पूंछ नहीं हिलाने के कारण टाइम से प्रमोशन नहीं पा सका ..
DURGA PRASAD JUGRAN
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Sep 5, 2015, 9:59:41 AM9/5/15
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गर्ग साहब सचमुच सबको खुश करने की क्षमता रखते हैं ।
ASHOK KUMAR Gupta
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Sep 5, 2015, 10:01:29 AM9/5/15
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