देहरादून में जुगरान नाम का एक फ़कीर रहता था उनका ज्यादातर समय इबादत और लोगो की मदद करने में जाता था, उनके घर में लोगो की भीड़ लगी रहती थी क्योंकि वो जो ideas बताते थे वो हमेशा कारगर साबित होते थे। एक दिन अचानक उन्हें अपने पडोसी चेयरमैन के घर से रोने की आवाज सुनी वो तुरंत वहा पहुंचे। जुगरान को पता चला कि चेयरमैन जब ख़रीदा हुआ माल ऊँटो पर लाद कर घर ला रहे थे, तब रस्ते में छर्रा डाकू ने उसको लुट लिया इसलिए वो पागल सा हो रहा था और आत्महत्या करने की बात कर रहा था। कुछ लोग उसको समझा रहे थे तब वह आवेश में आकर बोला “कंगाल होकर मैं कैसे जिन्दा रहूँगा मैं तो पूरी तरह से चुद गया हूँ ”। जुगरान ने पास आकर कहा “जब तुम पैदा हुए थे जब क्या धन तुम्हारे पास था”। चेयरमैन बोला, “नहीं वह तो मैंने बड़ा होकर अर्जित किया है”। जुगरान फिर बोला, “क्या लुटेरो ने श्रम करने वाले तुम्हारे हाथ पैरो को भी लुट लिया है”। चेयरमैन बोला “नहीं”। उसके बाद जुगरान ने सान्तवना देते हुआ कहा, “तुम्हारी असली दौलत हाथ पैर है औरे वो सही सलामत है फिर तुम अपने आप को कंगाल क्यों बता रहे हो?”
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