एक एस के बंसल नामक महात्मा के पास तीन शिष्य अशोक गर्ग , छर्रा और चेयरमैन अजमेर में दीक्षा लेने गये, महात्मा बंसल ने शिष्य बनाने से पूर्व पात्रता की परीक्षा कर लेने के मन्तव्य से पूछा:- "बताओ कान और आँख में कितना अन्तर है?"
चेयरमैन ने उत्तर दिया:- "केवल पाँच अंगुल का महाराज।"
अशोक गर्ग ने उत्तर दिया:- "महाराज आँख देखती है और कान केवल सुनते हैं इसलिये किसी बात की प्रामाणिकता के विषय में आँख का महत्व अधिक है।"
छर्रा ने निवेदन किया:- "भगवन्! कान का महत्व आँख से अधिक है।आँख केवल लौकिक एवं दृश्यमान जगत को ही देख पाती है किन्तु कान को पारलौकिक एवं पारमार्थिक विषय का पान करने का सौभाग्य प्राप्त है।"
महात्मा बंसल ने तीसरे शिष्य छर्रा को अपने पास गुरु दीक्षा के लिए रोक लिया और उन दोनों को कर्म एवं उपासना का उपदेश देकर अपनी विचारणा शक्ति बढ़ाने के लिए एक को लिवरमोर और दूसरे को इंदिरापुरम विदा कर दिया।
क्योंकि उनके सोचने की सीमा ब्रह्म तत्व की परिधि में अभी प्रवेश कर सकने योग्य, सूक्ष्म बनी न थी।