बहुजन समाज के लिए नैरेटिव का महत्‍व संजीव खुदशाह

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sanjeev khudshah

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Aug 13, 2023, 3:44:06 AMAug 13
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बहुजन समाज के लिए नैरेटिव  का महत्‍व

संजीव खुदशाह

पहले यह जानना आवश्यक है कि नैरेटिव  है क्या और वह कितना महत्वपूर्ण है। तभी आप जान पाएंगे की नैरेटिव  कैसे सेट करें? हिंदी में नैरेटिव  का सीधा सीधा कोई मीनिंग नहीं है। इस कारण हिंदी भाषा भाषी नेटिव का मतलब नहीं समझ पाते हैं या उसकी मीनिंग नहीं बता पाते। डिक्शनरी में नैरेटिव  का मतलब व्याख्यान, व्याख्या, कहानी आदि कहा गया है। लेकिन यह नैरेटिव का सही मतलब नहीं है।

मेरे हिसाब से नैरेटिव  का मतलब होता है एक मान्यता को गढ़ना। (यह एक मुहावरा भी हो सकता है।) मान्यता सही या गलत दोनों हो सकती है। जैसे फिल्मों में  एक नैरेटिव गढ़ा की ठाकुर बदमाश होते हैं शोषण करते हैं। ब्राम्हण लेखकों ने एक नैरेटिव गढ़ा की ब्राह्मण गरीब होता है। संभ्रांत वर्ग अपने फायदे के अनुसार हमेशा नैरेटिव  गढ़ता रहा है। वंचित वर्ग को इसके बारे में कुछ पता नहीं होता है वह इन नैरेटिव  का शिकार होता है।

कुछ प्रसिद्ध नैरेटिव गढ़े गए हैं इसे आप इस सूची में देख सकते हैं।

ठाकुर शोषण करते हैं,

ब्राह्मण गरीब होता है,

मुस्लिम लव जिहाद करते हैं,

डॉ आंबेडकर दलितों के नेता है,

जेएनयू के छात्र देशद्रोही होते हैं,

आरक्षण के कारण अयोग्‍य लोग नौकरी में आ जाते है।

नैरेटिव  शब्द तब से चर्चा में आया जब 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्र में बनी। लोगों को यह समझ में आने लगा की नैरेटिव  का क्या महत्व होता है? कैसे नैरेटिव के द्वारा मान्यताओं को प्रचारित किया जाता है, उसे गढ़ा जाता है। और इसी बल पर सरकारें बनाई जाती हैं या फिर गिराई जाती है।

अपने हिसाब से नैरेटिव गढ़ने का काम आर एस एस लंबे समय से करती रही है। उन्होंने हिंदुओं के एक बड़े समूह के बीच कई नैरेटिव  को गढ़ा है। यह सही भी हो सकते हैं और गलत भी। आर एस एस ने लव जिहाद, धारा 370, आरक्षण के विरुद्ध नैरेटिव को गढ़ा है। लोगों के बीच इन मान्यताओं का प्रचार किया है। प्रचार करने वाले लोग यह भली-भांति जानते हैं कि उनका नैरेटिव सही है या फिर फेक है। लेकिन लक्षित व्यक्ति को यह नहीं मालूम होता है।

बहुजन आंदोलन और नैरेटिव

बहुजन आंदोलन में नैरेटिव  का खास महत्व है। बहुजन आंदोलन याने अंबेडकरी आंदोलन ने जाने-अनजाने कई नए नए नैरेटिव  गढ़े हैं। जैसे संविधान सबको समानता का अधिकार देता है। बहुजन आंदोलन के लोग इमानदार और देशभक्त होते हैं।

बहुजन आंदोलन के कुछ नैरेटिव  को लेकर बुजुर्वा वर्ग परेशान भी रहता है। जैसे दलित शब्द । दलित शब्द को इस ढंग से गढ़ा गया है। जिसके कारण वह जागरूक, आंदोलन कर्ता, हिंदुओं से अलग, पीड़ित शोषित नजर आता है। इसी कारण दलित शब्द के पीछे गढ़े गए नैरेटिव से सवर्णों को परेशानी रहती है। और वह दलित शब्द को बैन करने या उस पर प्रतिबंध लगाने की बात करते हैं। उन्‍होने कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया। इससे आप समझ सकते हैं कि नैरेटिव  कितने महत्वपूर्ण होते हैं।

बहुजन आंदोलन ने मनु स्मृति को लेकर नया नरेटिव्स गढ़ा है। अब लोगों के दिमाग में यह है की मनुस्मृति एक ऊच-नीच भेदभाव बढ़ाने वाली किताब है। इसके नैरेटिव सेट करने शुरूआत उस समय हुई जब सर्वप्रथम डॉ अंबेडकर ने मनुस्मृति को सार्वजनिक रूप से दहन किया था। लगातार इस पर बातचीत होती रही, लोग लिखते और पढ़ते रहें, इस प्रकार मनुस्मृति को लेकर नया नैरेटिव  गढ़ा गया।

लोकतंत्र में नैरेटिव  का महत्व

लोकतंत्र में नैरेटिव  का बड़ा महत्व है चुकिं लोकतांत्रिक व्यवस्था वोट से चलती है और आम जनता वोट देने के पहले विचार करती है और विचार का उद्भव नरेटिव्स के कारण होता है। जो नैरेटिव बनाए जाते हैं उस हिसाब से वोटर्स वोट देने हेतु प्रेरित होते हैं। वोट किसे देना है या किसे नहीं देना है। यह नैरेटिव  तय करते हैं। इसका प्रयोग भारतीय जनता पार्टी ने बखूबी किया है और उन्होंने कई नए नैरेटिव गढ़े हैं।

विपक्ष भी नैरेटिव गढ़ने में पीछे नहीं रहे जैसे- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर कई नैरेटिव गढ़े गए है, कुछ नैरेटिव आर एस एस की कार्यशैली को लेकर गढ़े गए। लेकिन यह इतना प्रभावशाली नहीं रहे। इसके कई कारण हैं जिस पर कभी और चर्चा करेगे।  आइए पहले जानते हैं कि नैरेटिव कैसे गढ़े जाते हैं।

नैरेटिव कैसे गढ़े जाते हैं?

नए नैरेटिव गढ़ने में कई बार सालों लग जाते हैं। इसके लिए बहुत सारे सुबूतों तथ्‍यों की जरूरत होती है। यह सबूत सही भी हो सकते हैं गलत भी। ये गढ़ने वाले के मकसद पर निर्भर करता है। जिस तबके को नैरेटिव से प्रभावित करना है, उसे यकीन दिलवाना पड़ता है कि जो सुबूत या तथ्य उनको बताए जा रहे हैं वह सही है । कुछ दिनो के बाद वह तबका यह मान चुका होता है कि जो नरेटिप्स उसके सामने पेश किए गए हैं। वह सही है। जैसे- भले झूठ हो, लेकिन एक तबका यह मानता है की जेएनयू देशद्रोहियों का अड्डा हैं। इसी प्रकार कट्टरपंथियों द्वारा मुसलमानों, सिखों तथा ईसाइयों को लेकर भी नकारात्मक नैरेटिव  गढ़े गए।

वंचितों को नए नैरेटिव  गढ़ने होंगे

सोशल मीडिया आने के पहले नैरेटिव गढ़ने का अधिकार सिर्फ उच्‍च जातियों के पास था क्‍योकि मीडिया उनके पास था। लेकिन सोशल मीडिया आने के बाद पिछड़ी जातियां भी न केवल अपना नैरेटिव गढ़ सकती बल्‍कि उसके खिलाफ गढ़े गये नैरेटिव का जवाब दे सकती है।

वंचितों और महिलाओं को लेकर उच्च जातियों ने कई नकारात्‍मक नैरेटिव गढ़े हैं जैसे चोरी डकैती, लूटमार, वंचित जाति के लोग करते हैं। सारे गलत काम वही करते हैं। महिलाओें पर भरोसा नहीं किया जा सकता। पिछड़ी जाति को सरकार से फ्री में राशन और संसाधन मिलता है, वो हमारे टैक्‍स के पैसे से पलती है। वंचित जाति आरक्षण खोर है इनमें कोई योग्यता नहीं होती।

इन नेगेटिव नैरेटिव  के विरुद्ध वंचित जाति को नए नैरेटिव  गढ़ने होंगे। कुछ उसके बचाव के लिए, कुछ जवाब के लिए, तो कुछ नरेटिप्स हमला करने के लिए गढ़ने‌ होंगे। जैसे कि मैंने पूर्व में बताया है कि जाने अनजाने वंचित जातियों ने कुछ नैरेटिव  गढ़े हैं।

नैरेटिव  के फायदे और नुकसान

नैरेटिव या मान्‍यता अगर कोई प्रयास न भी करे तो भी परिस्थिति वश बन जाता है। किन्‍तु यदि किसी विद्वेष के कारण किसी समुदाय के खिलाफ गलत नैरेटिव गढ़ा जाता है तो यह मानव जाति के लिए नुकसान देह है। यदि ऐसे नैरेटिव के साथ सरकार भी खड़ी है तो इससे बड़ा दुर्भाग्‍य नहीं हो सकता। उस देश को नुकसान पहुँचना तय है।

इसी प्रकार किसी अच्‍छे संदेश को लोगो तक पहुचाना है तो उसके लिए सकारात्‍मक नैरेटिव कारगर होते है। आम लोगो तक पहुचने में आसानी होती है। जैसे भेदभाव करना बुरी बात है, शिक्षा वह शेरनी का दूध्‍द है जो पीयेगा दहाड़ेगा।




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