क्या अंबेडकर वादियों के शासक बनने का सपना अधूरा रहेगा ?
डॉ संजीव खुदशाह
अंबेडकरवादी अक्सर यह दावा करते रहे हैं कि वे यहां के मूल निवासी हैं यहां के शासक है और उन्हें फिर शासक बनना है। वे अपनी हर समस्या का हल शासक बनने पर ही होगा यह मानते हैं। अंबेडकरवादी मूल समस्या छुआ-छूत , भेदभाव, ऊंच-नीच, असमानता, मनुवादी संस्कृति, गरीबी, अशिक्षा को मानते हैं। और उन्हें लगता है कि यह समस्या शासक बनने पर ही खत्म होगी। इसीलिए हर एक अंबेडकरवादी शासक बनना चाहता है। इन समस्याओं पर कोई फोकस नही करना चाहता, न ही संघर्ष करता है। विधानसभा - लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहता है। इसीलिए आप जब अपने विधानसभा या लोकसभा की लिस्ट देखेंगे तो उसमें 6-7 उम्मीदवार अंबेडकरवादी ही दिखाई पड़ेंगे। और लगभग सब की जमानत जप्त हो जाती है। शासक बनने के लिए एक ही सीट से इतने सारे अंबेडकरवादी बहुजनवादी खड़े हो जाते हैं की समझ में नहीं आता की वोट दें तो दे किसको। सभी शासक बनना चाहते हैं, लेकिन अकेले। बिना एक दूसरे का साथ लिए। यही अंबेडकरवादियों की बेसिक समस्या भी है। आइए पड़ताल करते हैं कि अंबेडकरवादियों के संगठनों का क्या हाल-चाल है। फिर बातचीत करेगे की ये कैसे शासक बनेगें। पहले बात करते हैं डॉक्टर अंबेडकर द्वारा बनाए गए दो संगठनों के बारे में।
अ. रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया
30 सितंबर 1956 को डॉ अंबेडकर ने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन को भंग करके नई राजनीतिक पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की घोषणा की थी जिसे बाद में पंजीकृत कराया गया। अपने आप को अंबेडकरवादी कहने वाले और पूरे देश को बौद्धमय बनाने का दावा करने वाले आपस में ही मिलजुल कर नहीं रहते। इन्होंने डॉ आंबेडकर के द्वारा बनाई गई राजनीतिक पार्टी का ही बैंड बजा डाला। इतने टुकड़े कर डाले कि उसे गिनना भी आसान नहीं है। RPI में 50 से अधिक छोटे-बड़े गुट हैं, लेकिन प्रमुख सक्रिय गुट निम्नलिखित हैं:
Republican Party of India (Athawale) - RPI(A)
नेतृत्व: रामदास आठवले (केंद्रीय राज्य मंत्री) सबसे प्रभावशाली और चुनावी सक्रिय गुट। NDA (BJP) गठबंधन में शामिल।
Bharipa Bahujan Mahasangh (BBM)
नेतृत्व: प्रकाश आंबेडकर (डॉ. आंबेडकर के पोते) Vanchit Bahujan Aghadi (VBA) के रूप में चुनाव लड़ता है। आठवले गुट के अलावा मुख्य विपक्षी/स्वतंत्र धड़ा।
Republican Party of India (Gavai) / RPI(Gavai)
नेतृत्व: राजेंद्र गवई (आर.एस. गवई के पुत्र) पुराना और महत्वपूर्ण गुट।
Republican Party of India (United) - RPI(United)
2009 में कई गुटों के एकीकरण से बना। नेतृत्व: जोगेंद्र कवाडे (या अन्य संयुक्त नेतृत्व)। कई बार स्प्लिट होता रहा।
Peoples Republican Party
अलग गुट, अंबेडकरवादी विचारधारा पर।
अन्य उल्लेखनीय गुट:
Republican Party of India (Kamble) - RPI(K)
Rashtriya Republican Party
Republican Party of India (S)
Republican Party of India-Ambedkar (दीपक निकालजे / मोहनलाल पाटिल आदि)
Bharatiya Republican Paksha (BRP)
ब. भारतीय बौद्ध महासभा
डॉ अंबेडकर ने 4 मई 1955 में इसका गठन किया था इस संगठन का मकसद था कि बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया जाए नव बौद्धों को एक सूत्र में बांधा जाए। अंबेडकरवादी यह दावा करते हैं कि पूरे भारत को बुद्धिस्ट भारत बनाना है लेकिन यह संगठन भी कई टुकड़ों में बट गया और जातिगत संगठन बनकर रह गया। बौद्ध महासभा राज्य इकाई जिलों इकाई के बाद बौद्ध विहार की इकाई में बटा हुआ है। लेकिन आप किसी भी बौद्ध विहार के सदस्यों की लिस्ट तथा उनके पदाधिकारी की लिस्ट देखेंगे तो आपको पता चलेगा यह बौद्ध विहार नहीं बल्कि किसी खास जाति का मठ है। जिसमें दूसरे जातियों के बुद्धिस्टो का प्रवेश नहीं होता है। यह मठ, बुद्ध विहार के नाम पर खाप पंचायत चलाते हैं। यह उसी प्रकार अपने सदस्यों को बहिष्कृत करते हैं, सजा देते हैं। इस प्रकार की शिकायत आय दिन आते रहती है। इन अंबेडकरवादी बुद्धिष्टो ने डॉक्टर अंबेडकर की इस संस्था को भी कहीं का नहीं छोड़ा और कई गुट बना लिए। बौद्ध महासभा के केंद्रीय स्तर पर कई गुट हैं। इनमें से मुख्य तीन इस प्रकार है। वर्तमान प्रमुख धड़े/दावेदार (2026 तक):
राजरत्न आंबेडकर गुट
नेतृत्व: राजरत्न आंबेडकर (ट्रस्टी-चेयरमैन एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष) मुंबई मुख्यालय (tbsoi.org.in या tbsi.org.in) से जुड़ा। सबसे सक्रिय, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संगठनों (World Fellowship of Buddhists) से जुड़ा, धम्म दीक्षा कार्यक्रम चलाता है। आंबेडकर परिवार से सीधे जुड़ा।
चंद्रबोधि पाटिल गुट
नेतृत्व: चंद्रबोधि पाटिल (ट्रस्टी चेयरमैन / पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में दावा)। भोपाल/मध्य प्रदेश आधारित गतिविधियां। पुराने विवादों में सक्रिय रहे। कुछ कार्यक्रमों और वीडियो में "एकीकरण" की बातचीत में दिखते हैं।
भीमराव यशवंत आंबेडकर / मीराताई गुट
नेतृत्व: भीमराव यशवंत आंबेडकर (राष्ट्रीय वर्किंग प्रेसिडेंट / ट्रस्टी), मीराताई यशवंत आंबेडकर (पेट्रन)। आंबेडकर परिवार से जुड़ा, कुछ गतिविधियों में अलग या सहयोगी भूमिका।
यह बातचीत थी डॉक्टर अंबेडकर द्वारा बनाए गए संगठन की। अब हम कुछ दूसरे संगठनों की बात करेंगे खास तौर पर कांशीराम जी के द्वारा बनाए गए संगठन बामसेफ और बहुजन समाज पार्टी के बारे में। ऐसा माना जाता है कि मान्यवर कांशीराम ने अंबेडकर और फूले की विचारधारा को अन्य वंचित समाज के लिए सुलभ बनाने में बड़ा योगदान दिया और लोगों को मिशन से जोड़ा। बामसेफ खास तौर पर वंचित समाज के कर्मचारियों का संगठन था।
बामसेफ
बामसेफ (BAMCEF - Backward and Minority Communities Employees Federation) कई टुकड़ों/गुटों में बंटा हुआ। मुख्य विभाजन और स्थिति: स्थापना: कांशीराम और डी.के. खापर्डे आदि द्वारा 1978 में यह SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक कर्मचारियों का गैर-राजनीतिक सामाजिक संगठन था, जिसका उद्देश्य बहुजन/मूलनिवासी जागृति था।
बामसेफ (BAMCEF) नाम से कई संगठन/गुट काम कर रहे हैं। मुख्य जानकारी: 1986 का बड़ा विभाजन: कांशीराम के BSP फोकस के बाद संगठन टूटा। एक हिस्सा BSP से जुड़ा (शेडो BAMCEF), दूसरा गैर-राजनीतिक BAMCEF रजिस्टर्ड हुआ (डी.के. खापर्डे के नेतृत्व में)। वर्तमान स्थिति: एक ही नाम (BAMCEF) पर कई गुट/धड़े सक्रिय हैं। सटीक संख्या तय नहीं (क्योंकि कई अनरजिस्टर्ड/स्थानीय हैं), लेकिन व्यावहारिक रूप से 5-6 प्रमुख और कुल 20+ छोटे-बड़े गुट माने जाते हैं।
प्रमुख सक्रिय गुट/संगठन:
वामन मेश्राम गुट — सबसे सक्रिय, राष्ट्रीय मूलनिवासी संघ और भारत मुक्ति मोर्चा आदि सहयोगी संगठनों के साथ। 42वें राष्ट्रीय अधिवेशन (2025) जैसे बड़े कार्यक्रम आयोजित करता है।
बी.डी. बोरकर गुट (डी.के. खापर्डे मेमोरियल ट्रस्ट) — गैर-राजनीतिक परंपरा पर जोर, कई अधिवेशन आयोजित किए।
एस.एस. धम्मी गुट — पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष से जुड़ा, अलग गतिविधियां।
शेडो BAMCEF — BSP से जुड़ा माना जाता है (मायावती के नेतृत्व में)।
अन्य छोटे गुट — सुरेश माने, झल्ली, काले आदि से जुड़े, कुछ राजनीतिक दलों (BMP, PPID आदि) में बदल गए।
नोट: कई गुट एक ही रजिस्ट्रेशन का दावा करते हैं, जिससे कानूनी/व्यावहारिक विवाद बढ़ता है। RPI की तरह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, नेतृत्व विवाद और रणनीति (गैर-राजनीतिक vs राजनीतिक समर्थन) के कारण यह बिखराव हुआ।
बहुजन समाज पार्टी
बाकी संगठनों की तरह बहुजन समाज पार्टी का भी वही हाल हुआ। इस पार्टी में टूट तो नहीं आई लेकिन यह पार्टी बिखर गई और शून्य पर आ पहुंची है। आज इसके गिने चुने निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। इस पार्टी के नेताओं ने भी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को सर्वोपरि माना। वर्षों से मायावती इसकी एकमात्र अध्यक्ष बनी हुई है न तो पार्टी में चुनाव होता है न ही किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन किया जाता है। जबकि यह पार्टी दावा करती है कि वह संविधान और लोकतंत्र की पक्षधर है।
मायावती और BSP में वैचारिक गिरावट की आलोचना (2026 तक की स्थिति):
मायावती और बहुजन समाज पार्टी (BSP) की वैचारिक गिरावट की चर्चा मुख्य रूप से कांशीराम के मूल बहुजनवाद (Bahujan Hitay Bahujan Sukhay) से सर्वजनवाद (Sarvajan Hitay Sarvajan Sukhay) की ओर शिफ्ट, राजनीतिक समझौतों और व्यावहारिक निष्क्रियता पर आधारित है। मुख्य आलोचनाएं: बहुजन से सर्वजन की ओर बदलाव (2007): कांशीराम का मूल फोकस SC/ST/OBC/माइनॉरिटी (बहुजन) पर था। 2007 UP चुनाव से पहले मायावती ने ब्राह्मणों सहित ऊपरी जातियों को शामिल कर सर्वजन फॉर्मूला अपनाया। आलोचक कहते हैं कि इससे अंबेडकरवादी/फुले-अंबेडकर विचारधारा का dilution हुआ। पार्टी की क्रांतिकारी पहचान कमजोर पड़ी और कोर वोट बैंक (खासकर युवा दलित) में असंतोष बढ़ा।
BJP के साथ समझौते/निकटता:
2017-2019 में BSP-BJP गठबंधन (UP में समर्थन) और बाद में नरम रुख की आलोचना। कई आलोचक इसे Hindutva के साथ समझौता मानते हैं, जो मूल अंबेडकरवादी विरोधी विचारधारा के खिलाफ है। विपक्षी मुद्दों (संविधान बचाओ, सामाजिक न्याय) पर BSP की चुप्पी या हल्की आलोचना को BJP का B-Team कहकर देखा जाता है।
संगठनात्मक और नेतृत्व संबंधी गिरावट:
दूसरी पंक्ति के नेतृत्व का अभाव, परिवारवाद (आकाश आनंद का बार-बार आना-जाना), और ग्रासरूट आंदोलन से दूरी। भ्रष्टाचार के आरोपों, व्यक्तिगत संपत्ति/मूर्तियों पर फोकस ने सामाजिक न्याय की छवि को नुकसान पहुंचाया। चुनावी और सामाजिक प्रभाव: 2007 के बाद BSP का वोट शेयर लगातार गिरा (2024 लोकसभा में ~2-9% UP में)। दलित युवा चंद्रशेखर आजाद जैसे नए चेहरों की ओर मुड़ रहे हैं। पार्टी अब मुख्य रूप से जाटव वोट बैंक पर निर्भर है, व्यापक बहुजन एकता कमजोर हुई।
आंतरिक अस्थिरता: द्वितीय पंक्तियों के नेताओ को साईड लाईन किया गया। कई वरिष्ठ नेता (जैसे स्वामी प्रसाद मौर्य, लालजी वर्मा, राम अचल राजभर, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, दानिश अली आदि) पार्टी छोड़कर SP, BJP या Congress में चले गए।
5. भाई भतिजा वाद आकाश आनंद (मायावती के भतीजे) का मामला: 2023 में उत्तराधिकारी घोषित, फिर अनुशासनहीनता पर निकाले गए (2025 में), फिर वापस लाए गए और नेशनल कोऑर्डिनेटर/कन्वीनर बनाया गया। यह परिवारवद और परिवार के भीतर अस्थिरता दिखाता है।
दलित आंदोलन के अन्य महत्वपूर्ण नेता जिन्होंने सिद्धांत के बजाय अपनी निजी महत्वाकांक्षा को ऊपर रखा।
रामविलास पासवान- वह अपने आप को एक दलित नेता के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं लेकिन पद पाने के लिए वह किसी भी पार्टी से गले मिल जाते थे। उन्हें इसी कारण मौसम वैज्ञानिक कहा जाता है।
उदित राज- वह अपने आप को बड़े अंबेडकरवादी बताते थे और उन्होंने बड़े-बड़े दावे किए दूसरे अंबेडकरवादियों को हमेशा कोसते रहे 2003 में इंडियन जस्टिस पार्टी का गठन किया। 2014 में जिस पार्टी (BJP) को हुए जिंदगी भर कोसते रहे उसी में जाकर मिल गए।
रामदास अठावले- उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत दलित पैंथर से की, बाद में वह रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया में आ गए और अपने आप को डॉक्टर अंबेडकर का सच्चा अनुयाई बताते हुए भारतीय जनता पार्टी की शरण में चले गए मंत्री पद पाने की खातिर।
मायावती – बार बार ब्राम्हणों एव सवर्णो को कमजोर एवं पीडित बताना। बी जे पी की तारीफ करना। इ डब्लू एस आरक्षण का खुल कर समर्थन करना। दलितों की प्रताड़ना पर मौन रहना।
इस प्रकार इसमें और भी नाम है जैसे जीतन राम मांझी, चिराग पासवान जिन्होने अपने विचारधारा के साथ धोखा किया।
अंबेडकरवादी बुद्धिष्टो की मुख्य समस्या
1. जातियों में बटे हुए हैं आपस में जातिवाद चरमपर है. संगठन में भी जातिवाद स्पष्ट दिखता है.
2. संगठन के लिए कम, निजी उन्नति (स्वार्थ) के लिए ज्यादा काम करते हैं। इसीलिए सिद्धांतों से सबसे ज्यादा धोखाधड़ी होती है।
3. एक अंबेडकरवादी अपने आप को दूसरों से ज्यादा सच्चा और ऊंचा अंबेडकरवादी मानता है यानी अंबेडकर वादियों में भी ऊंच नीच है। इस कारण वे एक दूसरे को अपना दोस्त नहीं बल्कि दुश्मन मानते हैं।
4. डॉ आंबेडकर के ड्रीम प्रोजेक्ट के विरुद्ध काम करते हैं. डॉ अंबेडकर का ड्रीम प्रोजेक्ट था जाति का उन्मूलन और सबको प्रतिनिधित्व। जातियों में बटे ये अंबेडकरवादी अपने से छोटी जातियों को प्रतिनिधित्व देने के लिए तैयार नहीं है। न ही उनसे रोटी बेटी का संबंध बनाना चाहते हैं। संबंध बनाना तो दूर वह अपने संगठनों तक में प्रवेश नहीं देते हैं। भले इसके लिए वे सवर्णो को कोसते रहे।
अब तक आपको पता चल चुका होगा कि अंबेडकरवादियों के शासक बनने का सपना अधूरा क्यों है। चलिए अब बात करते हैं कि अगर वह शासक बनना चाहते हैं तो क्या गलतियां हो रही है और इसे दूर कैसे करें।
शासक बनना चाहते है तो क्या करे
1. यदि शासक बनना है तो सबसे पहले काम यह करना होगा कि बहुजन जातियों में एकता लानी होगी कम से कम इन जातियों के नेता आपस में एकजुट हो इनमें एकता हो। सर्व सम्मति से किसी एक व्यक्ति को चुनाव में खड़ा किया जाए और सब उसके लिए मेहनत करें।
2. बहुजन समाज की हर जाति को लेकर चलें, छोटी सी छोटी वंचित जातियों की बात करें, उनकी समस्याओं को सुने, ताकि आपको किसी एक जाति का नेता होने का ठप्पा ना लगे।
3. राजनीतिज्ञ विशेषज्ञों की राय को माना जाए। बहुजन विद्वानों के सलाह को गौर किया जाए क्योंकि राजनीति विचार के धरातल पर चलती है और कोई जरूरी नहीं की जो राजनीति करता हो वह उसका विशेषज्ञ भी हो। अक्सर अंबेडकरवादी व्यक्ति अपने को ही विद्वान समझता है, नेता भी समझता है, लेखक भी समझता है। याने, वह अपने आप को ऑल इन वन समझता है। जो कि गलत है। ऐसा हो नहीं सकता, असंभव है। इसीलिए राजनीतिक विशेषज्ञों की राय को मानना चाहिए। अक्सर राजनीतिज्ञ विशेषज्ञों की राय को गौर नहीं किया जाता है, उल्टे लोग उन्हें ट्रोल करते हैं।
4. संगठन व्यक्ति केंद्रित न हो। इसका नियमित चुनाव हो और अध्यक्ष बदले जाएं, संगठन चलाने के लिए प्रबंध कमेटी हो। जो यह ध्यान रखें कि संगठन में डेमोक्रेसी का पालन किया जा रहा है या नहीं। जब किसी बहुजनवादी संगठन में अध्यक्ष नहीं बदलता है तो टूट की स्थिति आ जाती है। इसीलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था को सर्वोपरि रखा जाए।
5. प्रचारक रखे जाएं आपकी विचारधारा और आपके दृष्टिकोण को बताने के लिए आपको बड़ी संख्या में फुल टाइम प्रचारक की जरूरत पड़ेगी जो की 5 साल अपने विचारधारा को लोगों तक पहुंचाएं।
6. अपने निर्वाचन के क्षेत्र में जन मुद्दों को लेकर लगातार संघर्ष करें। लोगों को यह नहीं लगना चाहिए कि आप सिर्फ चुनाव के समय सक्रिय हो जाते हैं बाकी समय मजे मारते हैं।
--
SUBSCRIBE YOUTUBE CHANNEL https://www.youtube.com/channel/UCvKfEVTBc57lj5X_57i3LNA?sub_confirmation=1
This Group will have an opportunity to discuss threadbare the issues of common interests related to the sc,st,obc and those from weaker sections of the society. I welcome you to this group and request you to become a member and send Articles, Essays, Stories and Reports on related issues.
===================================================
Imp Note:-Sender will legally responsible for there content & email.
Please visit for new updates.
https://www.dmaindia.online/
=====================================================
---
You received this message because you are subscribed to the Google Groups "Dalit Movement Association" group.
To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an email to dalit-movement-asso...@googlegroups.com.
To view this discussion, visit https://groups.google.com/d/msgid/dalit-movement-association-/CAJJAAq570QewqbcthWSchc6WRw%3D-jYGcEMcDtrzb_DdPbKsiCQ%40mail.gmail.com.