सुदर्शन ऋषि और डुमार (डोमार) समाज
संजीव खुदशाह
जो व्यक्ति अपना इतिहास नहीं जानता
वह कभी नया इतिहास नहीं बना सकता।
· डॉ भीमराव अंबेडकर
जब वाल्मीकि समाज के तर्ज पर कुछ लोगों ने सुदर्शन समाज का गठन सुदर्शन ऋषि के आधार पर किए जाने का बीड़ा उठाया तो उनके मन में सकारात्मक विचार ही थे। वे सोच रहे थे की इस बहाने डोमार समाज के लोग गंदे नाम (मेहतर, भंगी, स्वीपर) से छुटकारा ले लेंगे। धर्म कर्म के काम में लग जाएंगे। एक नई पहचान होगी। लोग संगठित होंगे और जिस प्रकार वाल्मीकि नाम से जाति प्रमाण पत्र बनता है। वैसे ही समाज में सुदर्शन नाम से जाति प्रमाण पत्र बनने लगेगा। गौरतलब है कि वे गंदे जाति नाम या पहचान स्वीपर, भंगी, मेहतर शब्द से निजात पाना चाहते थे। उन्होंने सुदर्शन समाज के बैनर तले 27 जातियों को जो उनके समकक्ष थी। जोड़ने का प्रयास किया। हालांकि इस संगठन में न ही इन जातियों का प्रतिनिधित्व था। न ही जमीनी तौर पर 27 जाति के लोग सुदर्शन से जुड़ना चाहते थे। इसीलिए सुदर्शन समाज और सुदर्शन ऋषि का प्रचार केवल डुमार या जिसे डोमार भी कहते हैं। उनके बीच ही रहा और प्रतिनिधित्व भी डोमार जाति को ही दिया गया।
पूरे भारत में डोमार जाति की जनसंख्या को लेकर एकमत नहीं है। क्योंकि जनगणना में भी उनकी जानकारी सही नहीं मिल पाती है। इसका कारण यह है कि डोमार जाति के लोग अपनी जाति कहीं कुछ कहीं कुछ लिखवाते हैं। जैसे भंगी मेहतर कहीं जमादार भी लिख देते हैं। इसलिए सही-सही इनकी संख्या की जानकारी नहीं मिल पाती है। फिर भी एक अनुमान है कि पूरे देश में डोमार-डुमार जातियों की संख्या 5 से 7 लाख होगी। दलित जातियों के लिहाज से यह संख्या छोटी नहीं है। इसके हजारों संगठन है। नागपुर कानपुर जबलपुर में इस जाति के लोग बड़ी संख्या में निवास करते हैं। थोड़ी बहुत संख्या छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और झारखंड में भी है।
मूल रूप से यह जाति बुंदेलखंड और बघेलखंड में निवास करती है या इनका यही मूल स्थान है यह भी कह सकते हैं। आज से करीब 200 साल पहले जब उत्तर भारत में अकाल पड़ा तो अंग्रेजों के काल में यह जातियां खाने कमाने के लिए बड़ी संख्या में शहर की तरफ आई। उन जगहों में आकर बस गई जहां पर रेलवे लाइन का काम चल रहा था। नए नगर बन रहे थे। इन जगहों में इन्हें जो काम मिला वह उन्होंने किया। कहीं वह सफाई कर्मी बन गए, कहीं मैला उठाने लगे, तो कहीं पर अच्छे कामों में भी लगे। सूअर पालन और बैंड बजाने का इनका पुश्तैनी काम था। अपनी मूल स्थान पर वे कभी इन गंदे कामों में नहीं जुड़े थे। इनका मूल व्यवसाय खेती किसानी, बांस के समान बनाना, जचकी के लिए दाई का काम, बैंड बजाने का काम, मुखाग्नि देने का काम करते थे। क्योंकि अछूत थे इसीलिए वे वहां भी प्रताड़ित थे। आज भी प्रताड़ित है।
जैसे ही आजादी मिली इनके कर्ताधर्ताओं को यानी कि समाज के मुखियाओं को यह समझ में आने लगा की यह गंदा पेशा, उनका अपना काम नहीं है। और इससे मुक्त होना होगा। यह जातियां वाल्मीकि बस्ती के आसपास ही बसाई गई और इनका एक जैसा ही कलचर बन गया। वाल्मीकि समाज वाल्मीकि ऋषि के नाम पर पहले से ही संगठित था और संगठित हो रहा था। इन लोगों ने उनसे प्रेरणा लेकर सुदर्शन समाज के नाम से संगठन बनाने का प्रयास किया। जैसा कि मैंने पहले बताया है की सुदर्शन समाज गठन का मुख्य कारण था। अपनी नई और अच्छी पहचान बनाना। सफाई पेशे से जुड़ी ऐसी जातियां जो की वाल्मीकि नहीं है उन्होंने सुदर्शन ऋषि से जोड़ने का प्रयास किया।
ऐसा नहीं है की डोमार समाज के लोग केवल सुदर्शन से ही जुड़े रहे ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिलते हैं आजादी के पहले भी आजादी के बाद भी की किस प्रकार इन्होंने अपना पंचायत डोमार समाज के नाम से बनाया और उत्थान के लिए बहुत सारे कार्य किया।
जबलपुर के कवि कालूराम मंजर ने 1961 को एक किताब का प्रकाशन किया जिसका नाम था "कुरीति प्रक्षालन आदि डोम डुमार समाज" इस किताब में उन्होंने जाति सुधार, जाति का नामकरण, शब्द पर विश्लेषण, हम चांडाल नहीं हैं, वंशावली, देवक डोम आदि के बारे में विस्तार में जानकारी प्रकाशित किया है।
इसी प्रकार जबलपुर से ही "सामाजिक मार्गदर्शिका" नाम से 29 मार्च 1993 को एक पत्रिका का प्रकाशन किया गया. इसके संपादक मंडल एस के वर्मा, एच बी तांबे, एच एस पाठक, आर के देवक, बी पी चमकेल थे। इस पत्रिका में उन्होंने 1885 के पहले के पूर्वज चौधरी, मुखिया, साखीदार आदि की जानकारी को संग्रहित किया है। 1901 से लेकर 1993 तक के संगठनों का विस्तार से विवरण दिया है। कई अखाड़ा, भजन मंडली, मित्र मंडली के नाम से बने संगठनों का विवरण मिलता है। इसी पत्रिका में यह भी जानकारी मिलती है कि 1972 में "मध्य प्रदेश डोम डुमार संघ" का पहली बार रजिस्ट्रेशन किया गया। जिसके अध्यक्ष पूर्व विधायक मंगल पराग थे। महामंत्री श्री नारायण कोषाध्यक्ष यूलीचंद मलिक , संगठन मंत्री मैनाराम बड़गैया थे। इसी दौरान डोमार समाज अंबेडकर से भी जुड़ रहा था। 1973 में "डॉक्टर अंबेडकर साहित्य प्रचार मंडल का गठन किया" इसके संस्थापक थे इंद्रपाल गौतम, शिवनाथ चौधरी, श्रवण कुमार वर्मा, दुर्गा प्रसाद चुहटेल। यहां पर 1982 में "सुदर्शन समाज एवं डोम डुमार प्रबंधक समिति" का गठन हुआ इसके संस्थापक थे हरिप्रसाद भारतीय, मैनाराम बड़गैया, जालिम सिंह , प्रेमलाल ठाकुर, हरिशंकर पाठक, तुलाराम कर्सा, चंदन लाल पसेरीया, बाबूलाल मलिक, प्रसादी लाल बिरहा आदि। 1990 में "डोम डुमार एकता समिति बिलहरी" का गठन हुआ। 1990 में ही "बाबा अंबेडकर जनहित कल्याण समिति" का गठन हुआ। 1991 में "मध्य प्रदेश युवा डोमार महासंघ" का गठन किया गया। जिसके अध्यक्ष थे रविंद्र चंदेल, महामंत्री दिलीप कुंडे, कोषाध्यक्ष राम प्रसाद ग्रावकर इत्यादि। इसी पत्रिका में जन्म से संबंधित छठी, मूल, बरहो, जन्मदिन के जो रीति रिवाज हैं। उनका जिक्र किया गया है। सगाई, फलदान, लगन, सिंगार का सामान, चिकट, बारात का टीका, द्वारचार, बारात का भोज, समधौरा, पैर पूजन, भंवर, विदाई आदि का जिक्र किया गया है। मृत्यु के रस्मो रिवाज का भी जिक्र है। इसी प्रकार अच्छी बात यह है की विधवा और विदुर विभाग का भी इसमें विवरण दिया गया है। जबलपुर में ही मध्य प्रदेश डोम डुमार समाज महासंघ का गठन रामेश्वर गौतेल के द्वारा किया गया लेकिन इनकी क्रिया कलाप की जानकारी नहीं मिलती है।
ठीक इसी प्रकार बिलासपुर में बापू नगर में जो संगठन बने हुए डुमार समाज के नाम पर बनाए गए। इनका बाकायदा निर्वाचन होता है और समाज के लिए अच्छा कुछ करने का प्रयास किया जाता है। आज से 20 साल पहले यह संगठन जाति पंचायत की तरह काम करता था। लेकिन अब यह संगठन शिक्षा रोजगार स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर भी काम कर रहा है। बिलासपुर में ही कर्बला और दूसरे मोहल्ले में रहने वाले लोग सुदर्शन के नाम पर संगठन बनाकर काम करते थे। और अभी भी कर रहे हैं। डॉ अंबेडकर को लेकर भी कई संगठन बनाए गए हैं उस पर भी काम किया जा रहा है। रायपुर की राजधानी छत्तीसगढ़ में 2010 में दलित मूवमेंट एसोशिएशन नाम की संस्था का पंजीयन कराया गया और अंबेडकर जयंती के दिन बड़े सामाजिक कार्यक्रम कराए जाते थे। इस संगठन ने एक पत्रिका का प्रकाशन किया जिसका नाम दलित उत्थान पत्रिका था। करीब 3 साल से छत्तीसगढ़ डोमार समाज का गठन किया गया है जिसके सदस्य और पदाधिकारी हर जिले में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। इसी प्रकार खड़कपुर नागपुर में भी लोग कहीं पर सुदर्शन के नाम पर तो कहीं पर मेहतर भंगी के नाम पर संगठन बनाकर काम करते हैं। लेकिन डूमार समाज में जो बड़े सम्मेलन हुए और जो बड़े कार्यक्रम किए गए। वह कार्यक्रम अखिल भारतीय सुदर्शन समाज के बैनर तले किए गए।
अखिल भारतीय सुदर्शन समाज के सबसे पहले अध्यक्ष राम सिंह खरे इलाहाबाद और सचिव मकरंद लाल भारतीय कानपुर से थे। इन्हें सुदर्शन समाज का फाउंडर भी माना जाता है। चूंकि यह दोनों डोमार समाज के थे। इसलिए डोमार समाज के लोग बड़ी संख्या में इस संगठन से जुड़े और काम किया। खड़कपुर में इसी संस्था के बैनर तले एक स्कूल का भी संचालन किया गया। जिसमें गोपाल दास बाघमार शिक्षक थे। आगे चलकर वे इसी संस्था के अध्यक्ष बन गए। गोपाल दास बाघमार 1999 में एक पत्रिका का प्रकाशन किया "प्रतिवेदन" जिसमें समाज से संबंधित जानकारी को प्राथमिकता दी गई। इसी पत्रिका के अंक दो में मकरंद लाल भारतीय का एक लेख "हमारे पूर्वज महर्षि सुदर्शन जी" प्रकाशित हुआ था। जिसमें पहली बार यह दावा किया गया की डोम, डुमार, बसोर, मांग, महार, बल्हार, धानुक, हेला, चूड़ा, लालबेगी, रावत, धरकार, मेहतर, सुदर्शन, मेस्तर, नगाड़ची, बाल्मीकि, तुरहिया, भंगी, बातदार, हाड़ी, दुसाध, वंशफोड़ आदि लोग सुदर्शन ऋषि को मानते हैं। इस पत्रिका के अंक दो में गोपाल दास बाघमार और दुर्गा प्रसाद धानुक लखनऊ का भी एक लेख प्रकाशित है। जिसमें वह सफाई कामगारों के उत्थान के और उनकी समस्याओं पर बात करते हैं। इसी समय जबलपुर से "दलित डोम दर्पण" नाम से एक साप्ताहिक का प्रकाशन 2000 में किया गया। जिसका प्रथम अंक इन पंक्तियों के लेखक के पास है। इसके संपादक घनश्याम दास चमन लाल चमकेल हैं। इस अंक में दीनदयाल बड़गैया को रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से डोम डूमार समाज के ऊपर पीएचडी की उपाधि मिलने का भी समाचार प्रकाशित हुआ है। इसी प्रकार भोपाल से एक पत्रिका प्रकाशित होती थी "सुदर्शन संदेश" इसके प्रधान संपादक थे बालचंद हवेलियां। वे सुदर्शन ऋषि और सुदर्शन समाज के पैरोकार थे और काफी सक्रिय थे।
सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक देव कुमार कानपुर बताते हैं कि शुरू में जब सुदर्शन समाज की बैठके हुई तो उसके फाउंडर लक्ष्मण भगत थे उन्होंने ही कानपुर में इसका प्रचार किया। जो की मकरन्द लाल भारतीय के ससुर भी थे। बातचीत के दौरान देव कुमार कहते हैं कि कानपुर में डुमारो की संख्या करीब डेढ़ लाख है और ज्यादातर लोग बस्तियों में रहते हैं। इनका प्रमाण पत्र वाल्मीकि जाति के नाम से या फिर बसोर के नाम से बनता है। आज भी कानपुर में डेढ़ लाख की संख्या होने के बावजूद डुमार या डोमार नाम से कोई संस्था नहीं है। न ही जाति पंचायत है। जाति पंचायत है भी तो स्वच्छकार नाम से है।
महाराष्ट्र पुलिस विभाग में पुलिस अधीक्षक रह चुके के एम बेरिया जी बताते हैं कि नागपुर में लोग सुदर्शन समाज से जुड़े हुए हैं। जिसमें हेला, मखियार, डुमार भी है। इन जातियों का अपना कोई संगठन जाति नाम से नहीं है। सुदर्शन सामाज नाम से ही पहचाने जाते हैं। लेकिन इन सभी जातियों का जाति प्रमाण पत्र भंगी या मेहतर के नाम से बनता है।
गौरतलब है कि अखिल भारतीय सुदर्शन समाज पुरानी संस्था तो पहले से थी बाद में इसके दो टुकड़े हो गए। कुछ लोगों ने नागपुर में भारतीय सुदर्शन समाज का गठन किया था। इन दोनों संगठनों को फिर मिलाकर एक नया संगठन बनाया गया "भारतीय सुदर्शन समाज महासंघ" जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नागपुर के दिलीप हाथीबेड है। वे पहले सुदर्शन वाल्मीकि मखियार नाम से संगठन चलाते थे।
जैसा की विदित है मेहतर, भंगी, स्वीपर नाम से कोई भी जाति एक्जिस्ट नहीं करती है। इनका अपना जाति नाम कुछ और है। जो जातियां सफाई काम से जुड़ी रही, उन्हें इन गंदे नाम से पुकारा जाने लगा और इन्हीं नाम से उनका कास्ट सर्टिफिकेट भी बनने लगा। उनकी वास्तविक जाति की पहचान, उनकी गरिमा, उनका सम्मान सब ध्वस्त हो गया। सुदर्शन समाज का गठन जिस मकसद के लिए किया गया था वह कहीं और खो गया। आजादी के इतने सालों बाद भी सुदर्शन के नाम से जाति प्रमाण पत्र बनने की कोई प्रक्रिया या समाधान नहीं है। मूल जाति नाम से लोग इतने दूर हो गए हैं कि केवल शादी ब्याह में इसकी पूछ परख होती है। बहुत कम ही ऐसे लोग हैं जिनका डोम या डुमार या डोमार या हेला नाम से जाति प्रमाण पत्र बनता है।
वैसे हेला जाति केन्द्रीय अनुसूची, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में मुस्लिम पिछड़ा वर्ग में शामिल है। महाराष्ट्र की किसी सूची में हेला नाम दर्ज नहीं है। उत्तर प्रदेश में हेला अनुसूचित जाति वर्ग से ही आते हैं। लेकिन महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जिनका जाति प्रमाण पत्र मेहतर, भंगी नाम से बन रहा है वह अनुसूचित जाति का लाभ ले रहे हैं। इसी प्रकार मखियार जाति का नाम जाति की सूची में है ही नहीं न केंद्र में है न राज्य की सूची में है। लेकिन यह जाति, जाति के रूप में मौजूद है। इनका भी जाति प्रमाण पत्र मेहतर या भंगी या वाल्मीकि के नाम से बनता है। डोमार, डुमार जाति का नाम उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जाति लिस्ट मे मौजूद है।
बहरहाल हमें यह मूल्यांकन करना पड़ेगा की क्या हमने इस बीच खोया है और क्या पाया है? सुदर्शन समाज से 27 जाति जोड़ने का दावा जमीनी स्तर पर खरा नहीं उतरता है। क्योंकि उत्तर प्रदेश में हेला जाति के संगठन तो बहुत मिलते हैं। बहुत सारी जातियां भी ऐसी है जो की सुदर्शन से जुड़ना नहीं चाहती और विरोध करती है। इन्हें सिर्फ डुमारो का संगठन कहती है। छत्तीसगढ़ में तो सुदर्शन के साथ नहीं जुड़ने के मकसद से बात थाने तक पहुंच गई थी। यानी डोमार जाति ही सुदर्शन से जुड़ी हुई है (और अन्य जाति के वे लोग जिन्होंने वैवाहिक संबंध किए है)। इस प्रकार वे अपने वास्तविक जाति नाम गौरवशाली इतिहास को भूला चुकी है। न ही इस जाति नाम से जाति प्रमाण पत्र बनाने का मांग किया जाता है। जबकि यह जाति गजट की अनुसूची में भी उपलब्ध है। यानी सुदर्शन के नाम से सबसे ज्यादा नुकसान डोमारो को हुआ है। जिन जातियों को इस नाम से नुकसान होने का अंदेशा लगा वह पहले ही दूर हो गई है । जिसकी भरपाई मुश्किल लगती है। जो इस नाम पर संगठन बने हुए हैं और पदाधिकारी हैं वह पीछे लौटना नहीं चाहते। सच्चाई जानकर भी। क्योंकि इससे उनका व्यक्तिगत नुकसान भी है। पहचान का भी प्रश्न है। इस समाज के जो लोग नेतागिरी कर रहे हैं उनका अंतिम लक्ष्य सफाई कामगार आयोग में एंट्री करना है। इससे ऊपर वह उठना नहीं चाहते हैं। इन सब कारणों से यह समाज अंबेडकरवादी आंदोलन से भी काफी दूर है। इसलिए शिक्षा और नौकरियों में भागीदारी कम है। इस समाज में राम रतन जानोरकर जैसा मार्गदर्शक होने के बावजूद ये क्यों पिछड़ता जा रहा है यह अलग प्रश्न है। इस प्रश्न पर विचार किया जाना चाहिए।
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