ISAI MISSANARY

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Shanta Kumar

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Jul 27, 2011, 6:24:10 AM7/27/11
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जब मुझे पता सभा में ही चला की पास के पुराने रोमन कैथोलिक मिशन वालों ने जिन्हें ईसाई बनाया हैं वे सभा में नहीं आये हैं. वे रोके जाते हैं आदि आदि, तो मुझे बड़ा गुस्सा हुआ. मैंने साफ़ सुना दिया की धर्म मजहब से मुझे कोई मतलब नहीं हैं. मैं तो आदमियों से मिलना और बातें करना चाहता हूँ. मुझे तो उन्हें समझाना हैं. फिर चाहे वो किसी धर्म के हों. इसीलिए मुझे ईसाई धर्म से कोई लड़ाई नहीं. मगर जब उनकी यह हरकतें सुनता हूँ तो गुस्सा आता हैं. क्या वे प्रभु इसुमसीह की भेड़ें तैयार करना चाहते हैं? यह तो गलत हैं. 
मैं समझता  था की ईसाई लोग आदिवासियों को भले ही ईसाई बनाते होंगे. मगर उसी के साथ उन्हें हकों के लिए लड़ना सिखाते होंगे. ऐसा देखा भी गया था की चमार वगैरह ईसाई होते ही हिन्दू जमींदारों से कहीं कहीं भिड़ गए थे. मैं यह भी सोचता था की जबतक ये आदिवासी हिन्दू थे तब तक बेशक इनमे तीन गुण पाए जाते थे  और वो थे सच बोलना, व्हाभिचार से बचना और निर्भीकता. मगर उनका जीवन पशुवत था. कम से कम हिन्दुओं ने उन्हें ऐसा ही बना दिया था. इसीलिए ईसाई होते ही यद्यपि वे तीनों महान गुण जाते रहे और यह पक्की बात हैं की सभ्यता पिशाची जरूर ही उन तीनों को खा जाती हैं. उन्ही की कब्र वह फलती फूलती हैं. तथापि वे पशु से आदमी जरूर बनते होंगे और मर्द की तरह हक़ के लिए लड़ते होंगे. मेरा यह भी ख्याल था जिन यूरोपीय देशों से ये पादरी यहाँ आये हैं वहां के किसानों ने तो क्रांतियाँ की हैं और शहन्शाओं के तख़्त उलट दिए हैं. जंगल के हकों के लिए तो जैसा की पहले कहा हैं उनने क्या क्या नहीं कर डाला था. इसलिए उन्हें ये शिक्षा भी दी जाती होगी. 
   मगर जब मैंने देखा और पास के गावों  में जाके पूछताछ करके पता भी लगाया की ईसाईयों को वे लोग मसीह के मेमने के रूप में ही रखते हैं और बाकी किसानों से उनकी निराली ही दुनियां बना छोड़ते हैं तो मुझे बहुत दर्द  हुआ. इस बात की आशा न थी. पास पड़ोस के अपने भाइयों से ही धर्म बदलते ही वे लोग बिलकुल ही नाता तोडके गूलर के कीड़ों जैसी अपनी अलग दुनिया बना लेते हैं. यह बात असह्य थी. तब तो मन्ना होगा की ये मिशन भरी अनर्थ कर रहे हैं. केवल धर्म के नाम पर ही हिन्दुओं से लड़ा देना कोई अछि बात नहीं. यह तो संसार की पुराणी बीमारी हैं और हमारे अभागे देश में बुरी तरह फैली हैं. हम तो इससे बचना चाहते हैं और हमें आशा थी की पश्चिमी देशों वाले ये मिशन इस बात की रौशनी वह से जरूर ही लेके ही पहुंचे होंगे. फलतः रोटी, जमीन और हक़ के लिए ही ईसाई किसान भी लड़ना सीख गए होंगे. मगर यह न पके हमें बड़ी निराशा हुई.
 
रस्ते में शाम को तीन चार बच्चियां बच्चे मिशन की तरफ जाते मिले. हमने कौतूहल से जानना चाह की इस समय ये कहाँ जा रहे हैं. जब हमारे "किसान" जाती वाले एक साथी ने उनकी ही भाषा में उनसे पूछा तो उत्तर मिला की "पाप स्वीकार करने" के लिए फादर के पास जा रहे हैं. एक बछि ने यह उत्तर दिया. और हमने सुना भी. हम समझ ही  न सके ये माजरा क्या हैं. मरने के समय तो ईसाई पादरी पाप स्वीकार करवटें हैं ऐसा जाना सुना था. यह क्या बात हैं? पीछे जाँच से पता चला की प्रतिदिन दो चार दिनों बाद फादर के पास जाके पाप स्वीकार करने का इनमे नियम हैं और जब घर वाले प्रायः कम के कारन छुट्टी नहीं पते, तो बच्चे बचियों को ही सब की और से कंफेसन करने को भेज देते हैं. यह खूब रहा. प्रतिदिन सरे कुकर्मों के धोने का या अच्छा साबुन मिला. जैसे हिन्दू संध्यागयात्री के जरिये और मुस्लिम नमाज के जरिये रोज पाप धोते हैं वैसे ही ईसाई कनाफेसन के जरिये. इतिहास की ठीक ही पुनरावृति हो रही हैं.     
दूसरी बात यह मालूम हुई की हिन्दू गुरुओ और मुस्लिम पीरों की तरह पादरी साल में एक बार गावों में चेलों के पास जरूर जाते और खा पी के तथा "पूजा" के रूप में रूपया कपडा वगैरह लेके लौट आते हैं. यह भी वही गुरुओं की "रमत" हो गयी. सिवाय धर्म के नाम पर पाखंड फ़ैलाने के और कुछ भी सामयिक उपदेश गृहस्थों को वे भी नहीं देते. कड़ा खैर करें.
(खेत मजदूर और झारखण्ड के किसान, १६६) स्वामी सहजानंद सरस्वती के कर कमलो से (१९४०-४१ में जेल में लिखी गयी)
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Shanta Kumar
Engineer, NTPC Rihand Nagar.
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“Education is the best friend. An educated person is respected everywhere. Education beats the beauty and the youth. ”
— Chanakya


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