पारसनाथ पहाड़ और उसके पास की जमीनों तथा जंगल झाड़ियों की कहानी यदि आज सुने जाये तो सहृदय लोगों के खून के आसूं बह निकलें. जैसे वैद्यनाथ धाम हिन्दुओं का तीर्थस्थान हैं वैसे ही वह जैनियों का. मगर जीव हिंसा से भागने वाले तथा जीव दया के बड़े हामी कहे जाने वाले जैनी मालदारों ने वहां के संथालों तथा दूसरे निवासियों ने जितना सताया हैं, आज भी वे उन्हें जितना सता रहे हैं वह वर्णनातीत हैं. उनने पहाड़ और पास के जंगल, झरने खरीद लिए हैं और सरे सर्वे में सब पर अपना कब्ज़ा लिखवा लिया हैं. भोले भाले गरीब लोग सर्वे क्या जानने गए? मगर उसी के बल पर कानून की छत्रछाया में संथाल लोग पानी, घास, पात, लकड़ी, जलावन, फल, फूल आदि के सभी पदार्थों से बुरी तरह वंचित कर दिए गए है. उनकी दुर्दशा ऐसी हैं की उनकी खबर लेने वाला कोई दीखता नहीं. यहाँ तक कांग्रेसी मंत्रिमंडल के ज़माने में भी उनकी सुनवाई नहीं हो सकी. ऐसे बहुतेरे दृष्टान्त हैं. इसलिए अब संथाल परगने को छोटानागपुर के और जिलों से इस मामले में जदय बताया जा सकता हैं नहीं. ऐसा कहना सरासर गलत हैं टाटा की लूट तो आगे बताएँगे.
from (खेत मजदूर और झारखण्ड के किसान, page 109) स्वामी सहजानंद सरस्वती के कर कमलो से (१९४०-४१ में जेल में लिखी गयी)