nicky modi
unread,Oct 13, 2007, 3:04:17 PM10/13/07Sign in to reply to author
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""प्राचीन काल मे दुर्गम नामक भयन्कर दैत्य हुआ,उसने सोचा वेद देवो के प्राण है! अगर वेद ही नही रहेन्गे तो दैवी-प्रक्रुति अपने आप नष्ट होगी! वेदो मे कहे गए यग्न ही नही होन्गे तो वर्षा नही होगी और सम्रिद्धी के सारे रास्ते बन्ध होन्गे! हर जगह दुर्भिक्ष और पापाचार का डेरा होगा!उसने घोर तपस्या करके ब्रह्माजी को मनाया!उसने वरदान मे चारो वेद मान्ग लिए! ब्रह्माजी ने उसे वेद दे दिए !अब वह स्वछन्दी हो गया! वेदो को बन्दी बनाने पर कोइ भी स्वस्ति वेद-ध्वनी ना कर सका !यग्न-क्रीया बन्ध हो गई! नदी-तालाब सुख गए,धरा से बीज का अन्कुरीत होना बन्ध हुआ! भुख से लोग मरने लगे! देवो कि स्थिती दीन हो गई! वे आर्त हो कर मा भगवती की स्तुती करने लगे! पुकार सुनकर ही मा अपने बच्चो के दुख दुर करने को तत्पर हुई! उनका पुरा शरीर सौ आखो वाला था,जिनमेसे ममता मई अश्रुधारा बहने पर नदीया फ़िर से बलखाने लगी! विविध कन्द-मुल-फ़लो से वे स्रुष्टि को त्रुप्त करने लगी! दुर्गम का सन्हार किया! नौ दीनो तक सतत जल और अन्न की वर्षा हुई! देव और वेद फ़िरसे सजीवन हुए! सौ आन्खो के कारण शताक्षी और दुर्गम-वध के कारण देवो ने उन्हे दुर्गा कहा! वेद-गौ-पुराण-मन्दिर इस सनतन सन्सक्रुति के प्राण है! हमारा आज विध्यमान होना ही इसका मूल कारण है! राष्ट्र-निर्माण और धर्म-रक्षा के लिए इनका परीप्लावीत और जीवन्त हो ना आवश्यक है! अनादी काल से चले आ रहे इस सनातन धर्म को वेदो ने ही जीवन्त रखा है!""
--श्रीमद्द्देवी भागवत