संस्कृत का यह श्लोक कौन सा है - दुष्ट व्यक्ति को॰॰॰?

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Shrish Sharma

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Dec 21, 2008, 2:03:40 AM12/21/08
to Chithakar
मित्रों क्या आप में से कोई संस्कृत का एक श्लोक बता सकता है जिसका
भावार्थ कुछ इस तरह से है, "आकाश को मापा जा सकता है, हवा को बांधा जा
सकता है॰॰॰ परन्तु दुष्ट (या शायद मूर्ख) व्यक्ति को किसी भी प्रकार से
संतुष्ट/प्रसन्न नहीं किया जा सकता।"

यदि हो सके तो श्लोक का सन्दर्भ (कहाँ से है) आदि भी बताएँ।

--
Shrish Sharma (श्रीश शर्मा)
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bhuvnesh sharma

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Dec 21, 2008, 4:47:22 AM12/21/08
to Chit...@googlegroups.com
सर्वप्रथम तो आपको लंबे समय बाद यहां पाकर अच्‍छा लगा
मूर्खजनों के संबंध में भर्तृहरि के नीतिशतक में कुछ श्‍लोक कहे गये हैं जिनका मैं यहां उल्‍लेख कर रहा हूं

अज्ञ: सुखमाराध्य: सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञ:।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्माऽपि तं नरं न रञ्जयति।।३।।
जो अज्ञानी है उसे सरलता से प्रसन्न किया जा सकता है। जो विशेष बुद्धिमान् है उसे और भी आसानी से अनुकूल बनाया जा सकता है।किन्तु जो मनुष्य अल्प ज्ञान से गर्वित है उसे स्वयं ब्रह्मा भी प्रसन्न नहीं कर सकते (मनुष्य की तो बात ही क्या है?)।।३।।

प्रसह्यमणिमुद्धरेन्मकरवक्त्रदंष्ट्रान्तरा-त्समुद्रमपिसन्तरेत्प्रचलदूर्मिमालाकुलम्।
भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारये-न्न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्।।४।।
घड़ियाल (मगर) के मुंह में हाथ डालकर उसके दांतों के बीच से मणि निकाली जा सकती है, चञ्चल तरंगों वाले समुद्र को भी हाथों के सहारे पार करना सहज है, क्रोधित साँप को भी फूल-माला की भाँति सिर पर रख लेना आसान है,परन्तु दुराग्रह ग्रस्त मूर्खों के मन को अनुकूल कर लेना बड़ा कठिन है।।४।।

लभेत सिकतासुतैलमपि यत्नत: पीडयन् पिबेच्चमृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दित:।
कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमासादये-न्न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्।।५।।
यत्नपूर्वक निचोड़ने पर बालू से तेल प्राप्त हो सकता है, प्यासा व्यक्ति मृगमरीचिकाओं में भी जल पी सकता है। भ्रमण करते हुए कभी खरगोश के सिर पर सींग पाया जा सकता है, परन्तु दुराग्रही मूर्ख के चित्त को कभी भी प्रसन्न नहीं किया जा सकता।।५।।

शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक्छत्रेण सूर्यातपो नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ।
व्याधिर्भेषजसङ्ग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्।।११।।
जल से आग बुझाई जा सकती है, सूर्य के ताप को छाते से रोका जा सकता है, मतवाले हाथी को तीखे अंकुश से वश में किया जा सकता है, पशुओं को दण्ड से वश में किया जा सकता है, औषधियों से रोग भी शान्त हो सकता है, विष को भी अनेक मन्त्रों के प्रयोगों से शान्त कर सकते हैं - इस तरह सब उपद्रवों की औषधि शास्त्र में है, परन्तु मूर्ख की कोई औषधि नहीं है।।११।।


भर्तृहरि का संपूर्ण नीतिशतक आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं  -
http://tempweb34.nic.in/xneeti/html/neetishatkam1.php#1


आशा है आपको चाही गयी जानकारी मिल गयी होगी


--
भुवनेश शर्मा
bhuvnesh sharma
http://www.hindipanna.blogspot.com/

Sagar Nahar

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Dec 21, 2008, 9:34:09 AM12/21/08
to Chit...@googlegroups.com
कमाल कर दिया भुवनेश बाबू आपने, बहुत ही बढ़िया श्लोक पढवा दिये आपने।
धन्यवाद
श्रीश को भी  जो इतना बढ़िया प्रश्न ले कर आये।

सागर चन्द नाहर
www.nahar.wordpress.com ॥दस्तक॥
www.techchittha.blogspot.com तकनीक
www.mahaphil.blogspot.com  गीतों की महफिल



विष्‍णु बैरागी

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Dec 21, 2008, 10:08:09 PM12/21/08
to Chithakar
श्रीशजी और भुवनेशजी को कोटिश: धन्‍यवाद । न श्रीशजी जिज्ञासा प्रस्‍तुत
करते, न भुवनेशजी यह सम्‍पत्ति बांटते ।
मैं भी एक श्‍लोक की खेज में हू जो 'ख्‍याति' कर श्रेणियां बताता है ।
इसके अनुसार - स्‍वअर्जित ख्‍याति उत्‍तम, पिता के नाम से प्राप्‍त
ख्‍याति मध्‍यम, माता और मामा के नाम से प्राप्‍त ख्‍याति निम्‍न और ससुर
के नाम से प्राप्‍त ख्‍याति 'अधम में भी अधम' होती है ।
इस श्‍लोक के प्रथम पद के दो तीन याद आ रहे हैं - 'उत्‍तमे मात्‍मना
ख्‍याता', इससे आगे याद नहीं आ रहा ।
विष्‍णु बैरागी

> भर्तृहरि का संपूर्ण नीतिशतक आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं  -http://tempweb34.nic.in/xneeti/html/neetishatkam1.php#1

SATYAJEETPRAKASH

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Dec 21, 2008, 2:30:54 PM12/21/08
to Chithakar
उपदेशो हि मुर्खाणां प्रकोपाय न शांतये
पय:पानं भुजंगानाम केवलं विषवर्धनम
जिस प्रकार सांप को दूध पिलाना उसके विष को बढ़ाना है उसी प्रकार को
उपदेश देना उसके गुस्से को बढ़ाना है.

Shrish Sharma

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Dec 23, 2008, 3:11:02 AM12/23/08
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धन्यवाद भुवनेश भाई, मैं सैकेण्ड लास्ट श्लोक की ही खोज में था (बालू से तेल वाला)।

rajeev jain

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Dec 23, 2008, 3:39:54 AM12/23/08
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धन्यवाद भुवनेश जी
 
 
राजीव

Anunad Singh

unread,
Dec 23, 2008, 3:40:29 AM12/23/08
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यहाँ बहुत सी संस्कृत सूक्तियाँ, अर्थसहित, दी हुई हईं।

http://sa.wiktionary.org/wiki/मुखपृष्ठं
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