सर्वप्रथम तो आपको लंबे समय बाद यहां पाकर अच्छा लगा
मूर्खजनों के संबंध में भर्तृहरि के नीतिशतक में कुछ श्लोक कहे गये हैं जिनका मैं यहां उल्लेख कर रहा हूं
अज्ञ: सुखमाराध्य: सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञ:।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्माऽपि तं नरं न रञ्जयति।।३।।
जो
अज्ञानी है उसे सरलता से प्रसन्न किया जा सकता है। जो विशेष बुद्धिमान् है
उसे और भी आसानी से अनुकूल बनाया जा सकता है।किन्तु जो मनुष्य अल्प ज्ञान
से गर्वित है उसे स्वयं ब्रह्मा भी प्रसन्न नहीं कर सकते (मनुष्य की तो
बात ही क्या है?)।।३।।
प्रसह्यमणिमुद्धरेन्मकरवक्त्रदंष्ट्रान्तरा-त्समुद्रमपिसन्तरेत्प्रचलदूर्मिमालाकुलम्।
भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारये-न्न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्।।४।।
घड़ियाल
(मगर) के मुंह में हाथ डालकर उसके दांतों के बीच से मणि निकाली जा सकती
है, चञ्चल तरंगों वाले समुद्र को भी हाथों के सहारे पार करना सहज है,
क्रोधित साँप को भी फूल-माला की भाँति सिर पर रख लेना आसान है,परन्तु
दुराग्रह ग्रस्त मूर्खों के मन को अनुकूल कर लेना बड़ा कठिन है।।४।।
लभेत सिकतासुतैलमपि यत्नत: पीडयन् पिबेच्चमृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दित:।
कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमासादये-न्न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्।।५।।
यत्नपूर्वक
निचोड़ने पर बालू से तेल प्राप्त हो सकता है, प्यासा व्यक्ति मृगमरीचिकाओं
में भी जल पी सकता है। भ्रमण करते हुए कभी खरगोश के सिर पर सींग पाया जा
सकता है, परन्तु दुराग्रही मूर्ख के चित्त को कभी भी प्रसन्न नहीं किया जा
सकता।।५।।
शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक्छत्रेण सूर्यातपो नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ।
व्याधिर्भेषजसङ्ग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्।।११।।
जल
से आग बुझाई जा सकती है, सूर्य के ताप को छाते से रोका जा सकता है, मतवाले
हाथी को तीखे अंकुश से वश में किया जा सकता है, पशुओं को दण्ड से वश में
किया जा सकता है, औषधियों से रोग भी शान्त हो सकता है, विष को भी अनेक
मन्त्रों के प्रयोगों से शान्त कर सकते हैं - इस तरह सब उपद्रवों की औषधि
शास्त्र में है, परन्तु मूर्ख की कोई औषधि नहीं है।।११।।
भर्तृहरि का संपूर्ण नीतिशतक आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं
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http://tempweb34.nic.in/xneeti/html/neetishatkam1.php#1
आशा है आपको चाही गयी जानकारी मिल गयी होगी
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भुवनेश शर्मा
bhuvnesh sharma
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