बहुत सही विचार है। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में अच्छे पैनग्रम बनने चाहिये।
कठिन नहीं है। जब कई सारे पैनग्राम बनेगे तो उसमे कुछ बहुत अच्छे भी साबित होंगे।
मात्राओं की समस्या का क्या? क्या एक मात्रा एक ही बार लागू होगी?
कपड़ा
लगभग एक वर्ष पहले अहमदाबाद के किसी युवक ने मुझसे ऑरकुट पर संपर्क किया था और उसने मुझे स्क्रैप किया था कि वो हिन्दी का फॉन्ट बनाना चाह रहा है और मेरी तरफ से यह मदद चाहता है कि मैं उसे हिन्दी का कोई ऐसा वाक्य बनाकर दूँ, जिसमें हिन्दी (देवनागरी) के सभी अक्षर आ जायें (संयुक्ताक्षर भी)। उसने उदाहरण के रूप में यह भी भेजा था कि उसने इस तरह का एक वाक्य बानाया है, यदि वो ठीक हो तो मैं जाँच दूँ कि सारे अक्षर हैं कि नहीं। मुझे याद है कि उसके वाक्य में सारे अक्षर नहीं थे लेकिन 99% थे (वाक्य व्याकरण की दृष्टि से अजीब था)। मेरे पास ढेरों स्क्रैप हैं, मैं ढूँढ़ नहीं पा रहा हूँ कि वो वाक्य कहाँ है, लेकिन यह बताना चाहता हूँ कि कुछ लोगों ने इस दिशा में काम किया हुआ है। मैंने अपने कुछ ऐसे मित्रों को जोकि हिन्दी भाषा पर अच्छी पकड़ रखते हैं, भी यह काम सौंपा था लेकिन लोग गंभीरता से नहीं लिये।
यदि डॉ॰ नारायण प्रसाद, हरिराम जी इस पर चुप्पी तोड़े तो रिजल्ट निकल आयेगा।
पंकज जी 'ड़' और 'ङ' दोनों में बहुत अंतर है। यद्यपि दोनों ही व्यंजन है।
लेकिन 'ङ' 'ञ' 'ण' 'न' 'म' को अनुनासिक व्यंजन कहा जाता है। अनुनासिक इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनका उच्चारण नासिका (नाक) से होता है। हिन्दी व्याकरण का यह नियम है-
यदि किसी शब्द का दूसरा वर्ण अपने वर्ग का प्रथम वर्ण है और शब्द के पहले वर्ण पर अनुस्वार (बिंदी 'ं') है तो अनुस्वार दूसरे वर्ण के अनुसार उसके वर्ण का पाँचवा व्यंजन होता है। जैसे-
पंकज- पङ्कज (दूसरा वर्ण- क, अनुस्वार- ङ्)
कंचन- कञ्चन (दूसरा वर्ण- च, अनुस्वार- ञ्)
चंचल- चञ्चल (दूसरा वर्ण- च, अनुस्वार- ञ्)
कंटक- कण्टक (दूसरा वर्ण- ट, अनुस्वार- ण्)
दंत- दन्त (दूसरा वर्ण- द, अनुस्वार- न्)
कंपन- कम्पन (दूसरा वर्ण-प, अनुस्वार-म्)
यह भी संभव है यह नियम दूसरा वर्ण के अपने वर्ग के ४ में से कोई भी व्यंजन होने पर लागू हो, लेकिन मैं उसके लिए कंफ़र्म नहीं हूँ। जानकार दोस्तों से पूछकर बताऊँगा।
यदि किसी शब्द का दूसरा वर्ण अपने वर्ग का प्रथम वर्ण है और शब्द के पहले वर्ण पर अनुस्वार (बिंदी 'ं') है तो अनुस्वार दूसरे वर्ण के अनुसार उसके वर्ण का पाँचवा व्यंजन होता है। जैसे-
"ऋषियों को सताने वाले दुष्ट राक्षसों के राजा रावण का सर्वनाश करने वाले
विष्णुवतार भगवान श्रीराम, अयोध्या के महाराज दशरथ के बड़े सपुत्र थे।