कब तक झूठ की खाद पर अंग्रेजी फलती-फूलती रहेगी?

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अनुनाद

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May 20, 2008, 2:54:37 AM5/20/08
to Chithakar
ये सुखद समाचार पढ़िये:

UPSC aspirants break English myth, hail Hindi
http://www.telegraphindia.com/1080520/jsp/nation/story_9292151.jsp


अंग्रेजों और उसके भारतीय गुलामों द्वारा फैलाये गये मिथकों को जितना
जल्दी हो सके तोड़ना जरूरी है।

एन डी ए. में अंग्रेजी क्यों चाहिये?
मैनेजमेन्ट प्रवेश परीक्षाओं के लिये सुपर-अंग्रेजी की परीक्षा क्यों
जरूरी है?

Debashish

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May 20, 2008, 3:59:33 AM5/20/08
to Chithakar
एक मिथक और भी टूटना चाहिये कि हिन्दी का भला करने के लिये अंग्रेजी का
सर्वनाश ज़रूरी है। सही रवैया होना चाहिये पीसफुल कोएक्ज़िंटेंस का।

मुझे हर बार इन बहसों में यह रुख पाकर दुख होता है कि सारे फसाद की जड़
अंग्रेजी में पढ़ना और हिन्दी में न पढ़ना है। जी नहीं, फसाद की जड़ है
हिन्दी में पढ़ाई कर स्नातक बनने वालों के लिये नौकरी का अभाव। विषय, भाषा
वही जमेगी जो रोटी कमाने के लायक बनाये। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं
में यह दम क्यों नहीं भरा जा सका? जाहिर तौर पर इसके लिये सरकारी नीतियों
को कोसना चाहिये। अंग्रेजी या अन्य किसी भाषा को कोसकर क्या होगा?
ओपनिवेशिक मानसिकता से निकलने के लिये ५० साल काफी थे, हमारे नेताओं की
दूरदृष्टि क्यों नहीं थी ऐसी? चीनी अपने भाषा के कीबोर्ड पर लिखते हैं,
हम हिन्दी लिखते हैं अंग्रेजी कीबोर्ड पर। क्या हमारे प्रोग्रामर अपनी
भाषा में प्रोग्राम में कमेंट डाल सकते हैं? क्या उत्पादों की पैकिंग
पूर्णतः हमारी अपनी भाषा में है?

अंग्रेजी तो हमारी नसों में दौड़ रही है साहब। यही हमें बचपन से सिखाया
गया है, हमारे मानस इसी तरह प्रोग्राम्ड हैं। मैकाले ने कोई वसीयत तो
नहीं लिख छोड़ी थी कि हम उनकी शिक्षा पद्धति को छोड़ ही न सकें। अंग्रेज़
दोषी नहीं इसके, अंग्रेज़ीयत दोषी है। और अंग्रेजियत हमने अपने जेहन से
उखाड़ फेंकने का रत्ती भर प्रयास भी नहीं किया है।

On May 20, 11:54 am, अनुनाद <anu...@gmail.com> wrote:
> ये सुखद समाचार पढ़िये:
>
> UPSC aspirants break English myth, hail Hindihttp://www.telegraphindia.com/1080520/jsp/nation/story_9292151.jsp

Manoj Gupta

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May 22, 2008, 12:31:22 AM5/22/08
to Chithakar
वाह देबाशीष बाबू, आपने को मेरे विचारों तो शब्द दे दिये। अंग्रेजी की
क्या गलती है? वैसे मैंने देखा है, दक्षिण भारतीय भाषाओं का सम्मान अभी
भी बचा है परन्तु हिन्दी के लिये तो हिन्दी भाषी ही उत्तरदायीं है। अपने
घर में, समाज में जहाँ हिन्दी बोली जा सकती है, वहाँ भी लोग अंग्रेजी
बोलते हैं और अगर कोई हिन्दी बोलता है तो उसे हेय द्र्ष्टी से देखते है।
वाह री गुलाम मानसिकता।

मुझे सरकारी हिन्दी अनुवादकों से भी शिकायत है। उन्होंने सरकारी हिन्दी
को बोल-चाल की हिन्दी से अलग, एक अजीब सी कलिष्ट भाषा बना दिया है जिसे
पढ़ने पर कुछ समझ नहीं आता और लोग मजबूरी में अंग्रेजी का सहारा लेते हैं।
उदाहरण के लिये किसी मन्त्रालय कि वार्षिक रिपोर्ट हिन्दी में पढ़ पर
देखिये। ये लोग पता नहीं हिन्दी का कौन सा भला कर रहें हैं।

सादर
मनोज

ई-स्वामी

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May 22, 2008, 1:22:05 AM5/22/08
to Chit...@googlegroups.com
देबू भाई,
 
टु टैल यू द ट्रूथ्थ.. हिंदी की सिचुएशन पे इनिशियली मैंने भी बहुत ब्लड बर्न किया लेकिन इवेंचूली मेरे थॉट्स चेंज होगए!
 
ऑनेस्टली बोलूं .. डे-टू-डे स्पीकिंग में मुझे नहीं लगता इंडिया में हिंदी का कोई फ़्यूचर है और ना ही अंग्रेजी का ही कोई फ़्यूचर होगा. आई थिंक इंडिया का लेंग्वेज एक घोर कंफ़्यूजन होगा! वैल, मैं प्योरवाला शुद्धतावादी नहीं हूं बट मेरे पॉईंट आफ़ व्यू में हिंदी आलरेडी हिंग्लिश हो चुकी है - आप इस स्टाईल की हिंदी डेली टीवी पर वॉ़च करते ही होंगे. एवरीबडी स्पीक्स रॉंग टाईप आफ़ इंग्लिश और बेसिकली हिंदी के ज्यादा वर्ड यूज़ करने वाला घनचक्कर (खाकीचड्डी-प्रसाद) , घोंचू (वर्नाकूलर) या घोंघा(कवि) ओनली अलग से दिख जाता है- नाऊ सी ..नोबडी वांट्स दैट जी! 
 
एक्जेक्टली सिमिलरली हम हिंदुस्तानियों की अंग्रेजी भी रियली में ना बडी डिफ़्फ़रंट है - इंग्लिश का भी हमे देसिंग्लिश कर रखा है - मैं देश के अंग्रेजी चैनल्स पर जितनी रॉंगली स्पोकन इंग्लिश हीयर करता हूं कहीं और नहीं करता. टोटल सीन है ना गॉड ही गॉट्टन ना विसाल-ए-गर्लफ़्रेंड वाला. रही सही कसर मुंबालीवुड (यथा नेम तथा प्रापर्टी) "जब वी मैट" जैसी फ़िल्में दे कर कंप्लीट कर रहा है. सॉंग्स भी वैसे ही म्यूज़िक भी वैसा ही, वेस्टर्न एंड फ़ोक बीट्स, देसी बाजा विदेसी इंस्टूमेंट्स प्लस पंजाबी हिंदी इंग्लिश ट्रीमिक्स एक्सेक्ट्रा.  हाई-पेयिंग जाब्स लेने के लिये इंग्लिश का नॉलिज मस्ट है लेकिन बाकी वर्ल्ड के इंग्लिश स्पीकिंग पीपल्स देसियों को अपने ग्रुप और टॉप लेवल जॉब्स से एक्स्क्लूडेड ही रखते आए हैं और रखते रहेंगे. उस लेवल पे लॉंड्रीमैन का डॉग्गी ना बीच का ना होम का.. जस्ट लाईक अवर लैंग्वेज एंड एवरी थिंग एल्स!  
 
सिरियसली योर्ज़,
ई-स्वामी   
2008/5/21 Manoj Gupta <manojg...@gmail.com>:

Anunad Singh

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May 22, 2008, 2:35:40 AM5/22/08
to Chit...@googlegroups.com
अब बात मुद्दे से बहुत दूर चली गयी है। जितने लोग लिख रहे हैं सब अलग-अलग  मुद्दों पर लिख रहे हैं।

स्वामीदा मजाक के मूड में है। स्वामीजी आप शुद्धतावादी नहीं हैं किन्तु कभी अंग्रेजी में देसी भाषाओं को मिलाने का साहस दिखाया है?  गांवों में एक कहावत चलती है- कमजोर की बहू, सबकी भौजी लगती है।

मनोज जी अनुवाद की क्लिष्टता पर लिख रहे हैं।  मनोज जी कार्यालयीन भाषा, कानून की भाषा आदि , चाहे अंग्रेजी हो या अन्य, क्लिष्ट होती है। इसके उपर से अनुवाद करने वाले उसका शब्दानुवाद करने के चक्कर में और कठिन कर देते हैं।  अंग्रेजी देशों में  क्लिष्ट अंग्रेजी के विरुद्ध  'सिम्पल इंग्लिश' , प्लेन इंग्लिश' , 'बेसिक इंग्लिश'  आदि आन्दोलन चल रहे हैं जो जनता में सरल भाषा के प्रयोग के  महत्व के प्रति जागृति पैदा कर रहे हैं।

देबाशीश दा ने मूल मुद्दे के काफी पास लिखा किन्तु  निष्कर्ष गलत निकाल लिया।  अंग्रेजी आज एक हथियार है। कोई भी शोषण किसी हथियार का सहारा लेकर ही किया जाता है। यदि खेल का नियम (रूल आफ द गेम) इस तरह से बनाया जाय  कि एक खिलाड़ी को उस नियम के वजह से फायदा हो और दूसरा उसके कारण जबर्जस्त घाटे में रहे - तो खेल के नियमों को बदलने की जरूरत है।

अंग्रेजी भाषा अच्छी हो सकती है; (और भी भाषायें अच्छी हैं) लेकिन प्रश्न यह है कि भारत में उसे जो महत्व दिया जा रहा है क्या वह उसकी अधिकारिणी है और क्या यह भारत के दीर्घावधि भविष्य के लिये ठीक है?

sanjay | जोग लिखी

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May 22, 2008, 7:11:10 AM5/22/08
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देबूदा से सहमत, और स्वामीजी वाली हिन्दी पता नहीं कहाँ की है, हमारी तो
नहीं. वहीं अलग अलग कामो के लिए भाषा के स्वरूप अलग अलग होते ही है. क्या
"इकॉनोमिक्स", "साइंस" और "लॉ " की अंग्रेजी भिन्न नहीं है?

Sarathi Hindi Blog

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May 22, 2008, 9:28:20 AM5/22/08
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अनुनाद जी ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा है:
 
"अंग्रेजी भाषा अच्छी हो सकती है; (और भी भाषायें अच्छी हैं) लेकिन प्रश्न यह है कि भारत में उसे जो महत्व दिया जा रहा है क्या वह उसकी अधिकारिणी है और क्या यह भारत के दीर्घावधि भविष्य के लिये ठीक है? "
 
अंग्रेजी वाकई में बहुत अच्छी एवं अतिसमृद्ध भाषा है. लेकिन आज हिन्दुस्तान में इसे जो अत्योन्नत स्थान एवं महत्व दिया जा रहा है वह किसी भी भारतीय भाषा के दीर्घावधि भविष्य के लिये किसी भी तरह से अच्छा नहीं है.  अंग्रेजी को जो स्थान दिया जा रहा है उसके कारण जाने अनजाने हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार होता है. इससे हिन्दीभाषी हीन भावना से ग्रस्त हो जाता है. उसके समक्ष विकास के रास्ते अवरुद्ध हो जाते है. वह अंग्रेजी की गुलामी के लिये मजबूर हो जाता है.
 
यह एक विषचक्र है जिसे तोडना होगा!
 
 -- शास्त्री जे सी फिलिप
 
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
 

दिनेशराय द्विवेदी

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May 22, 2008, 9:54:46 AM5/22/08
to Chit...@googlegroups.com
भाई लोगों ! सब के विचार पढ़ लिए हैं। अपना तो एक सूत्र है। हिन्दी को ऐसा बनाओ कि उस का अधिक से अधिक प्रयोग बढ़े। हिन्दी में हर प्रकार की सामग्री बढाओ जिस से उसे तलाश करने के लिए दूसरी भाषा में न जाना पड़े। हिन्दी का प्रयोग करने वाले दूसरी भाषाओं के जितने भी शब्दो का प्रयोग करते हैं उन्हें हिन्दी शब्दकोष में शामिल करो। हिन्दी को लोक की भाषा से लेकर अदालत, कानून, विज्ञान, साहित्य, व्यवसाय और भी जहाँ जहाँ उस का प्रयोग हो सकता है वहाँ प्रयोग के लायक बनाओ। इस के लिए उसे कभी कभी हिंगलिश भी लगना पड़े तो लगने दो। हिन्दी तो आगे ऐसे ही बढ़ेगी और जरूर बढ़ेगी, रोकने वाले कब तक रोकेंगे इसे? हम कहते हैं जिसे रोकना हो रोक ले, यह फिर भी आगे बढ़ेगी। कहीं रोक लोगे तो वह बाधा के बांध तोड़ कर बढ़ेगी।
विचार से अधिक जरुरत है काम की। जितना हो सके हिन्दी में काम करो।

2008/5/22 Sarathi Hindi Blog <shastri....@gmail.com>:



--
दिनेशराय द्विवेदी, कोटा, राजस्थान, भारत
Dineshrai Dwivedi, Kota, Rajasthan, http://anvarat.blogspot.com/
http://teesarakhamba.blogspot.com/
http://judisndia.blogspot.com/

Sarathi Hindi Blog

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May 22, 2008, 12:14:51 PM5/22/08
to Chit...@googlegroups.com
दिनेश जी ने लिखा:
 
"विचार से अधिक जरुरत है काम की। जितना हो सके हिन्दी में काम करो।"
 
मैं उनका अनुमोदन करता हुँ. हम सब से चूक यहीं हो रही है.
यदि 1 प्रतिशत के 1 प्रतिशत हिन्दी भाषी समर्पण के साथ दिनेश जी
की बातों को अपने जीवन में उतार लें तो कल फिर से हिन्दी राज
करेगी एवं हिन्दीभाषियों को हीन भावना से ग्रस्त न होना पडेगा.

ई-स्वामी

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May 22, 2008, 12:41:51 PM5/22/08
to Chit...@googlegroups.com
अनुनाद भाई,
 
अपनी अतिशयोक्तिपूर्ण पोस्ट में, मैं यही कहने का प्रयास कर रहा हूं की "मैं शुद्धतावादी नहीं हूं" कह कर भारतीय लोग हिंदी में अंग्रेजी घुसा सकते हैं और गलत अंग्रेजी बोल सकते हैं लेकिन अच्छी और सही भाषाओं तरीके से दोनो ही भाषाओं पर अधिकार नहीं है हमारे लोगों का! पहले ये बात मुझे भी बहुत सालती थी लेकिन अब ये बात स्पष्ट है की यदि आप वैश्विक स्तर पर अपनी पहूंच बनाने के लिये अंग्रेजी का सहारा ले रहे हैं और भारत को सेवा क्षेत्र का एक प्रमुख केन्द्र बनाना चाह रहे हैं तब भी आपको वैचारिक और भाषिक गुणवत्ता बनानी ही पडेगी. दोनो में से किसी भी भाषा में यदी भारतीय कुछ लिखे तो वो पठनीय हो, कुछ कहे तो वो अनुकरणीय हो कुछ करे तो वो आर्थिक रूप से सुदृढ हो - अंग्रेज़ी की गुलामी हमें भारतीय स्तर पर अच्छे दिखने वाले जॉब दिलवा सकती है किंतु वैश्विक स्तर पर वे हैं दोयम दर्जे के ही!
 
रही बात हिंदी की तो हमने अपनी भाषा का मज़ाक स्वयं बनाया है इसके लिये किसी विदेशी को क्या कोसना!

jai hanuman

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May 22, 2008, 6:25:22 PM5/22/08
to Chit...@googlegroups.com

>> सही रवैया होना चाहिये पीसफुल कोएक्ज़िंटेंस का।

सही फरमाया। पीओ और पीने दो।

Sagar Nahar

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May 23, 2008, 8:58:07 AM5/23/08
to Chit...@googlegroups.com
दिनेशजी ने कहा-

2008/5/22 दिनेशराय द्विवेदी <drdwi...@gmail.com>:

 इस के लिए उसे कभी कभी हिंगलिश भी लगना पड़े तो लगने दो। हिन्दी तो आगे ऐसे ही बढ़ेगी और जरूर बढ़ेगी, रोकने वाले कब तक रोकेंगे इसे?
यहाँ में आप सब से अनुरोध कराना चाहूंगा कि  अभिव्यक्ति में  प्रकाशित श्री प्रभु जोशी का लेख हिन्दी की हत्या के विरुद्ध जरूर पढ़ें, तब शायद इस बहस को सही दिशा मिल सकेगी।



--
सागर चन्द नाहर
www.nahar.wordpress.com ॥दस्तक॥
www.techchittha.blogspot.com तकनीक
www.mahaphil.blogspot.com गीतों की महफिल

Sagar Nahar

unread,
May 23, 2008, 9:03:02 AM5/23/08
to Chit...@googlegroups.com
क्षमा कीजिये उपर अनुरोध करना पढ़ें

Pratik Pandey

unread,
May 23, 2008, 1:11:39 PM5/23/08
to Chit...@googlegroups.com
मैं ई-स्वामी जी की बात से पूरी तरह सहमत हूँ। हिंग्लिश सुनकर ख़ून जलता है, लेकिन बदनसीबी से यही आज की भाषा है!
 
- प्रतीक पाण्डे

narayan prasad

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May 23, 2008, 8:27:58 PM5/23/08
to Chit...@googlegroups.com
नाहर जी,
     श्री प्रभु जोशी जी के लेख की कड़ी के लिए धन्यवाद । मैंने इसे आद्योपान्त पढ़ा । वस्तुतः यह एक उत्कृष्ट लेख है । हिन्दी लिखने के लिए देवनागरी के रोमनीकरण या हिन्दी के अंग्रेज़ीकरण के विरुद्ध आवाज उठानी ही चाहिए । भारतवर्ष में कम से कम रोमनीकरण की समस्या नहीं होनी चाहिए । परन्तु प्रचलित हिन्दी शब्दों के स्थान पर अंग्रेज़ी शब्दों को समाचारपत्रों में या टीवी वाहिनियों से प्रसारित समाचार में जबर्दस्ती थोपना चिन्ता का विषय है ।
---नारायण प्रसाद

2008/5/23, Sagar Nahar <sagar...@gmail.com>:

दिनेशराय द्विवेदी

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May 23, 2008, 8:42:03 PM5/23/08
to Chit...@googlegroups.com
सागर जी, मैं ने यही कहा था कि "इस के लिए उसे कभी कभी हिंगलिश भी लगना पड़े तो लगने दो। हिन्दी तो आगे ऐसे ही बढ़ेगी और जरूर बढ़ेगी, रोकने वाले कब तक रोकेंगे इसे?"
प्रभु जोशी के आलेख से मै भी सहमत हूँ। मेरा कभी कभी से अर्थ प्रोफेशनल कामों से था। विदेशी भाषाओं के जिन शब्दों के वास्तविक भावों को अभिव्यक्त करने के लिए उपयुक्त शब्द न मिले तब वहाँ मूल भाषा का मूल  शब्द प्रयोग में लिया जा सकता है। अंग्रेजी में अभी भी लेटिन शब्दों और मुहावरों का भरपूर प्रयोग होता है। इसी तरह हम संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों और मुहावरों का प्रयोग करते हैं। जैसेमैं ने प्रतिलिप्याधिकार के स्थान पर कॉपीराइट का प्रयोग करना उचित समझा।
एक बात और भाषा में कठिन उच्चारण और लिखने में मुश्किल शब्द आसान शब्दों से प्रतिस्थापित होते हैं। कोई भी इस प्रक्रिया को रोक नहीं सकता। इस प्रक्रिया में भी विभाषीय शब्द स्थान पाते हैं। इस तरह अंग्रेजी और अन्य भाषा के शब्द हिन्दी में स्थान पाते हैं तो उसमें मैं कोई बुराई नहीं मानता। यह प्रक्रिया चलेगी इस का लाभ यह भी है कि अंग्रेजी के कठिन उच्चारण और लिखने में मुश्किल शब्द हिन्दी में प्रवेश पा ही नहीं सकते। भाषा के स्वाभाविक विकास और विस्तार को कोई नहीं रोक सकता। लेकिन उसे भ्रष्ट करने के हर प्रयास का पुरजोर विरोध करना चाहिए।

Anunad Singh

unread,
May 24, 2008, 1:03:08 AM5/24/08
to Chit...@googlegroups.com
यहाँ हिन्दी के विषय में  बहुत सारे लेख संकलित किये हुए हैं :

हिन्दी हितार्थ

hi.wikibooks.org/wiki/हिन्दी_हितार्थ  )

peekay

unread,
May 24, 2008, 1:13:06 PM5/24/08
to Chit...@googlegroups.com
the subject of this thread is a rather serious matter ..
this group is read by many many people .. 
i hope that this discussion remains emperical .. 
based on ground realities, facts, data, trends, sms शैली, nexgen's rapidly evolving psyche, globalisation and the turbulent times ahead
 
since my hindi typing is still a bit slow, the many things that i would have siad will remain unsaid for now
 
i do have a compulsive urge to clear up the hindi typing situation
 
"भारतवर्ष में कम से कम रोमनीकरण की समस्या नहीं होनी चाहिए ।"
 
it appears to be in need of a bit more clearing up (typing in hindi is the first step to other things)
 
1. looks like the sentence means that hindi typing by roman letters is a problem that should not happen at least in india
 
2. typing hindi by using roman letters (alphabets of english) is phonetic and also thru transliteration 
 
3. if both of these are to be phased out then the alternatives would be ..
 
4. using an inscript layout based keyboard .. umm .. i haven't seen this happening in big numbers since inscript layout was made the 'standard'
 
5. the other altenratives are the remington, etc which have their origins in the typewriter layouts
 
6. the third would be susha type of typing (which category would this be in  ?
 
7. a new keyboard is needed (qwerty gets a bye bye).. or a new layout is needed (on tope of the qwerty .. perpetual place for the qwerty becomes a natural fallout)
 
8. opinions would be good .. but if members add the method that they use, we will have 'facts' .. and also their opinions, view, etc
 
..peekay
 
 
5. what then
 
----- Original Message -----
Sent: Saturday, May 24, 2008 5:57 AM
Subject: [Chitthakar] Re: कब तक झूठ की खाद पर अंग्रेजी फलती-फूलती रहेगी?

narayan prasad

unread,
May 24, 2008, 2:20:18 PM5/24/08
to Chit...@googlegroups.com
<<it appears to be in need of a bit more clearing up >>
 
मेरी टिप्पणी श्री प्रभु जोशी जी के लेख से सम्बन्धित थी । मेरे कहने का तात्पर्य यह था कि भारतवर्ष में हिन्दी को रोमन लिपि में लिखवाने का षड्यन्त्र सफल नहीं हो सकता । अब तो विदेशी लोग भी देवनागरी में ही हिन्दी लिखना-पढ़ना पसन्द करते हैं । यूनिकोड की सुविधा आ जाने पर संगणक (कम्प्यूटर)  में भी देवनागरी या अन्य लिपि में टंकण की समस्या नहीं ।
---नारायण प्रसाद

 
2008/5/24, peekay <pksharm...@gmail.com>:
the subject of this thread is a rather serious matter ..
this group is read by many many people .. 
i hope that this discussion remains emperical .. 
based on ground realities, facts, data, trends, sms शैली, nexgen's rapidly evolving psyche, globalisation and the turbulent times ahead
 
since my hindi typing is still a bit slow, the many things that i would have siad will remain unsaid for now
 
i do have a compulsive urge to clear up the hindi typing situation
 
"भारतवर्ष में कम से कम रोमनीकरण की समस्या नहीं होनी चाहिए ।"
 
it appears to be in need of a bit more clearing up (typing in hindi is the first step to other things)
 
1. looks like the sentence means that hindi typing by roman letters is a problem that should not happen at least in india
 
2. typing hindi by using roman letters (alphabets of english) is phonetic and also thru transliteration 
 
 
..........message curtailed ........... 

 

peekay

unread,
May 25, 2008, 1:52:58 AM5/25/08
to Chit...@googlegroups.com
quickly responding to the response ..
 
request to all members ..
 
pls avoid responding to the comments on  my posts
 
let me handle the responses to MY comments .. thank you
(otherwise, the subject 'drifts' faaar faaar away from the subject line)
 
 
 
 
हिन्दी को रोमन लिपि में लिखवाने का षड्यन्त्र सफल नहीं हो सकता ।
 
putting things right .. the 'defensive' tone of the above line needs to be ignored .. there was no intention from my side to support/oppose things .. i am in the fact finding mode .. today's sanmarg in calcutta carries a very 'disturbibng' factual article on the state of affairs of the nextgen's horrifying 'mutation' of hindi into a much more 'dangerous' destroyer of hindi than the plan for doing damage to hindi by the earlier perperators of this silly 'destroy the hindi and hindi things' kind of notion
 
i think shambhu ji can put up the article from Kolkata Sunday Sanmarg's page VIII top middle .. or maybe dr. mandhata singh can help in this
 
if no one does this, well, i'll HAVE TO do it :-((
 
..peekay
 
(meantime, can we have feedbacks from members about what they use for typing 'unicode' hindi please ?
 which keyboard(s) ? which method ? and whether hindi is typed by hitting 'english' lettered keys ?)
 
 
 
 
 
 
----- Original Message -----
Sent: Saturday, May 24, 2008 11:50 PM
Subject: [Chitthakar] Re: कब तक झूठ की खाद पर अंग्रेजी फलती-फूलती रहेगी?

peekay

unread,
May 25, 2008, 2:05:08 AM5/25/08
to Chit...@googlegroups.com
(with apology to group owner, debashis .. i HAD resolved to write a max of
ONE email to this group in a day as requested by him)
 
 
CLEARING UP was not intended to be an attacking, alleging negative thingy ..
it needs removing the chaff from the kernel, coming to facts, core issues,
understanding the problem in its entireity, analysing it, tackling confusing objectives ..
and THEN trying to offer a few alternatives as suggested solutions..
THEN, discussing those solutions as 'a' solution instead of MY, YOUR, HIS, THEIR
things .. it is an OUR thingy .. including overseas friends who are wanting to learn hindi,
devanaagarii, unicode  based 'pure' hindi and not a concoction
 
it is A problem ! not MY problem or an INDIAN nation problem, nor a STATE (प्रान्त)
'subject'
 
if hindi IS destroyed (by even our own kids), all will suffer .. indians, outsiders, etc.
 
macaulay is ancient history .. what is happening in the cellphone based sms-world is
a holocaust ! and we won't be able to stop it either (refer to bhavanaaji's query on how
to type hindi on cellphone .. and ravi ji's suggested replies .. a glimpse of THE 'problem' )
the same thing is happening here .. i myself am writing about hindi non-destruction by typing
in english .. and feeling sooo sad about it .. and this is when i am striving for faster speed
and having myself authored the axar and aAa online/offline/installable solutions :-((
 
..peekay
 
 
 
----- Original Message -----
Sent: Saturday, May 24, 2008 11:50 PM
Subject: [Chitthakar] Re: कब तक झूठ की खाद पर अंग्रेजी फलती-फूलती रहेगी?

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