शर्मा जी,
केवल ड़ और ढ़ ही नहीं, क़, ख़ ग़ ज़ फ़ य़ ऱ भी इन्हीं दोहरे मानदण्डों की
समस्या से ग्रसित हैं।
आपने सही रीति व्यावहारिक (practical) समस्याओं को पहचाना है।
वर्षों से हम इन समस्याओं से जूझ रहे हैं। यही कारण है कि आज देवनागरी
(या अन्य indic) डैटाबेस संसाधन सफल नहीं हो पाए हैं। शेयर मार्केट में
शेयरों के नाम-कूट, रेलवे आरक्षण में रेलवे स्टेशनों के संक्षिप्त कूट,
एकाउण्टिंग में प्रोडक्ट-कोड, पार्टी-कोड के निर्धारण से लेकर रेल तथा
हवाई आरक्षण की मूल प्रोसेसिंग या input, देवनागरी या हिन्दी में क्यों
नहीं हो पा रहे हैं, विज्ञान तथा तकनीकी के पाठ्यक्रम एवं कार्यक्रम तो
शायद दूर की बात है।
सिर्फ "येन केन प्रकारेण" कविता कहानी ब्लॉग पर छाप लेना, ब्लॉग बना
लेना, एग्रीगेटर संचालित कर लेना ही वह सब कुछ नहीं है, जिसे
"कम्प्यूटिंग" कहा जाता है।
मूल कारण है भारतीय लिपियों के (ISCII/Unicode) वर्ण-कूट निर्धारण में
कुछ मौलिक त्रुटि का रह जाना, जिसका निवारण फिलहाल लगभग असम्भव सा लगता
है। देखें -
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http://unicode.org/standard/stability_policy.html>
फिर भी हमारा प्रयास जारी है। आशा है सम्मिलित प्रयास से सफलता मिलेगी।
हरिराम
On 11 फरवरी, 22:55, peekay <
pksharmakolk...@gmail.com> wrote:
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