राज्य के अधिकतर मंत्री अपने विभाग को पर्याप्त निधि का आवंटन बजट में न
किए जाने का रोना रोते रहते हैं. निधि के अभाव में विकास कार्य न हो पाने
का बहाना बनाते हैं, लेकिन असलियत कुछ और ही बयां करती है. वास्तविक
तस्वीर यह है कि राज्य के मुख्यमंत्री सहित सभी मंत्रियों में विकास
कार्यों को समय पर पूरा करके प्रगति के पथ पर महाराष्ट्र को ले जाने के
लिए न तो नियोजन है और न ही इच्छाशक्ति. उनमें राज्य में रचनात्मक विकास
करने की दृष्टि का अभाव है. यही कारण है कि विविध विभागों के लिए वर्ष
2011-12 के लिए आवंटित निधि का मंत्रियों द्वारा विकास कार्यों के लिए
उपयोग नहीं किया गया है. इसके बाद भी हमारे मंत्री-संतरी कई बार सीना तान
कर दावा करते है कि महाराष्ट्र विकास में सबसे आगे हैं. उनके कपोल-कल्पित
दावों की हवा सरकारी आंकड़े ही निकाल देते हैं. अब सवाल यह उठता है कि
बजट में आवंटित रक़म जब समय पर ख़र्च नहीं की जाती है और मंत्री हमेशा
निधि के अभाव का रोना रोते रहते हैं तो बची हुई करोड़ों की निधि जाती
कहां है?
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