पहले 2-जी घोटाले ने देश के लोगों के होश उड़ाए, फिर कॉमनवेल्थ गेम्स से पूरी दुनिया को पता चला कि बिना भ्रष्टाचार के इस देश में कोई काम नहीं हो सकता है. एक के बाद एक कई घोटाले उजागर होते गए. एक ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, जिससे लोगों ने सरकारी घोटालों को नियति मान लिया. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भ्रष्टाचार को रोकने की झूठी तसल्ली देते रहे, लेकिन उन्होंने कोई ठोस क़दम नहीं उठाया. राजनीतिक क्षेत्र में नैतिकता का पतन इस स्तर पर पहुंच गया कि मंत्री और नेता घोटाले में फंसने के बावजूद तर्क देते हैं और जब तर्क काम नहीं करता है तो धमकियां देने लगते हैं.