श्लोकर्थे त्रुटी निवार्णार्थ

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Arun Kumar

unread,
Aug 13, 2012, 3:27:59 PM8/13/12
to भारतीयविद्वत्परिषत्
आदरणीय विद्वज्जनों प्रणाम
विद्वज्जनों अधोलिखित श्लोक में मन के विषयों का समावेश किया गया है इस श्लोक के अर्थ में मुझे संदेह है कृपया मेरे द्वारा किये गये अर्थ पर दृष्टिपात कर मेरी त्रुटियों का परिहार करें
 
चिन्त्यं विचर्यमूह्यम् च ध्येयं संकल्प्यमेव च I
यत्किन्चिन्मनसो ज्ञेयं तत् सर्वं ह्यर्थसंज्ञकं II
चिंतन के द्वारा, विचार के द्वारा, जिज्ञासा के द्वारा, ध्यान के द्वारा, संकल्प के द्वारा, और जैसे भी जो कुछ भी मन के द्वारा जानने योग्य है वह सब निश्चय ही अर्थ संज्ञक है
यहाँ मुझे मुख्यतः शंका यह है कि श्लोक में प्रयुक्त चिन्त्यं, विचार्यं, ऊह्यम, ध्येयं, संकल्प्यम शब्दों के अर्थ क्या होंगे? यथा
चिन्त्यं - चिंतन के द्वारा या चिंतन करके अथवा इसका एक अन्य ही अर्थ वह वस्तु होगी जिसके विषय में चिंतन किया जाये I इसी प्रकार विचार्यं ध्येयं इत्यादि शब्दों के अर्थ में भी यही शंका है I

नीचे प्रस्तुत श्लोक की टीका का उल्लेख किया गया है इस टीका में "उपपत्त्यनुपपत्तिभ्यां" शब्द का उल्लेख प्राप्त होता है यहाँ उपपत्ति शब्द का क्या अर्थ है?
मनोविषयमाह - चिन्त्यं कर्तव्यतया अकर्तव्यतया वा यन्मनसा चिन्त्यते I
विचार्यं उपपत्त्यनुपपत्तिभ्यां यद्विमृश्यते I  ऊह्यम् च यत् संभावनया ऊह्यते 'एवामेतद्भविष्यति' इति I ध्येयं भावनाज्ञानविषयं I
संकल्प्यं गुणवत्तया दोषवत्तया वाsवधारनाविषयं I यत् किंचिदित्यनेन सुखाद्यनुरक्तविषयावरोधः I एते च मनोsर्थाः शब्दादिरूपा एव तेन षष्ठार्थकल्पनया न चतुर्विंशतिसंख्यातिरेकः I सुखादयस्तु शब्दादिव्यतिरिक्ता मनोsर्था बुद्धिभेदग्रहनेनैव ग्राह्याः I

कृपया सहायता करें
धन्यवाद


--
Arun Kumar
Researchar
9899315156

श्रीमल्ललितालालितः

unread,
Aug 13, 2012, 4:34:22 PM8/13/12
to a.kum...@gmail.com, भारतीयविद्वत्परिषत्




2012/8/14 Arun Kumar <a.kum...@gmail.com>

 
चिन्त्यं विचर्यमूह्यम् च ध्येयं संकल्प्यमेव च I
यत्किन्चिन्मनसो ज्ञेयं तत् सर्वं ह्यर्थसंज्ञकं II
चिंतन के द्वारा, विचार के द्वारा, जिज्ञासा के द्वारा, ध्यान के द्वारा, संकल्प के द्वारा, और जैसे भी जो कुछ भी मन के द्वारा जानने योग्य है वह सब निश्चय ही अर्थ संज्ञक है

अन्वय इत्थम् -
यत्किञ्चिच्चिन्त्यं विचार्यमूह्यं ध्येयं सङ्कल्प्यञ्च तत् सर्वं मनसोऽर्थसञ्ज्ञकं ज्ञेयम् ।
मनसो ज्ञेयं यत् तदर्थसञ्ज्ञकम् इति नान्वयः । टीकाविरोधात् ।
 
यहाँ मुझे मुख्यतः शंका यह है कि श्लोक में प्रयुक्त चिन्त्यं, विचार्यं, ऊह्यम, ध्येयं, संकल्प्यम शब्दों के अर्थ क्या होंगे? यथा
चिन्त्यं - चिंतन के द्वारा या चिंतन करके अथवा इसका एक अन्य ही अर्थ वह वस्तु होगी जिसके विषय में चिंतन किया जाये I इसी प्रकार विचार्यं ध्येयं इत्यादि शब्दों के अर्थ में भी यही शंका है I

चिन्त्यं - चिन्तार्हः , चिन्ताया विषय इति यावत् । न तु चिन्तयित्वा चिन्तनेन वा ।
शङ्का च न स्पष्टा ।

नीचे प्रस्तुत श्लोक की टीका का उल्लेख किया गया है इस टीका में "उपपत्त्यनुपपत्तिभ्यां" शब्द का उल्लेख प्राप्त होता है यहाँ उपपत्ति शब्द का क्या अर्थ है?

उपपत्तिश्च युक्तिः सङ्गतिः तर्को वा ।

मनोविषयमाह

अत एव मनसोऽर्थसञ्ज्ञकं ज्ञेयम् इत्यन्वय उक्तो मया ।
 
- चिन्त्यं कर्तव्यतया अकर्तव्यतया वा यन्मनसा चिन्त्यते I

चिन्ताविशेषस्य विषय एवात्र विवक्षितः ।
तथा च चिन्त्यं - कार्यमकार्यञ्च मनसोऽर्थः ।

विचार्यं उपपत्त्यनुपपत्तिभ्यां यद्विमृश्यते I

युक्तोऽयुक्तो वाऽयमिति यो विचारस्तस्यापि विषयोऽर्थो मनसः ।
युक्तत्वञ्च युक्तिसंवलितत्वम् । अनुपपत्तिस्तद्विरहः ।

Arun Kumar

unread,
Aug 15, 2012, 12:52:19 PM8/15/12
to श्रीमल्ललितालालितः, भारतीयविद्वत्परिषत्
महोदय प्रणाम
आपने मेरी शंका का समाधान किया इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद I
किन्तु उपपत्ति का अर्थ समझ पाने में मैं असमर्थ हूँ I यदि आप कोई उदाहरण दे दें तो मेरे लिए अच्छा होगा I

2012/8/14 श्रीमल्ललितालालितः <lalitaa...@gmail.com>
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