भर्तृहरि का शब्दद्वैतवाद

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Arun Kumar

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Jul 9, 2011, 3:10:52 AM7/9/11
to bvpar...@googlegroups.com
विद्वादेभ्यो: नमो नम:
आदरणीय विद्वज्जनों मैं "भर्तृहरि का शब्दद्वैतवाद" विषय पर एक शोध पत्र
लिख रहा हूँ मुझे इससे सम्बंधित सामग्री नहीं मिल रही है कृपया कर मेरी
मदद करें.
इसमें मुझे शब्द के दो रूपों का वर्णन करना है जिसमे ध्वन्यात्मक शब्द और
स्फोतात्मक शब्द हैं इनमे से स्फोतात्मक शब्द के दो भेदों वक्त्री स्फोट
और श्रोत्रि स्फोट के विषय में मुझे कुछ नहीं मिला है इसके विषय में आपके
पास जो जानकारी हो कृप्या मुझे प्रदान करने की कृपा करें.
धन्यवाद

--
Arun Kumar
Researchar
9899315156

narayanan er

unread,
Jul 9, 2011, 6:35:29 AM7/9/11
to bvpar...@googlegroups.com
अरुणकुमारजी,
नमस्कार। जहाँ अलग अलग वर्ण मिलकर जब तक वाचक नहीं बनता, तब तक जिस के बल से अर्थ की प्रतीति होती है, वह स्फोट है। वह वर्ण से अलग है, मगर वर्ण से अभिव्यक्त होगा। स्फोट हमेशा रहनेवाला (नित्य) शब्द है। अर्थ को प्रतीत करने की क्षमता स्फोट में रहती है। शब्द का व्यापार विशेष के अर्थ में स्फोट शब्द बनता है। खिलने के अर्थ में "स्फुट" नामक धातु है। वह आत्मनेपद है, और लट् लकार में "स्फुटते" रूप बनता है। वर्णों से अर्थ खिलते है-ऐसे अर्थ में "घञ्" नामक एक प्रत्यय "स्फुट" से जुडेगा। ऐसे स्फुट से स्फोट बनेगा।
हरिवंश महापुराण के भविष्य पर्व में कहते है- "अक्षराणामकारस्त्वं स्फोटस्त्वं वर्णसंश्रयः-१६-५२" (हे भगवान, अक्षरों में "अ" वर्ण तुम हो, वर्ण पर निर्भर स्फोट भी तुम हो।)
सुनाई पड़ने वाले वर्ण को ध्वनि कहते है। तो "ध्वन्यात्मक शब्द " हुआ वर्ण। और "स्फोटात्मक शब्द" हुआ अर्थ का प्रत्यायक।
भर्तृहरिजी अपने वाक्यपदीय के ब्रह्मकाण्ड में कहते हैं-

कार्यकारणभावेन ध्वनतीत्याश्रितक्रमः।
ध्वनिः क्रमनिवृत्तौ तु ध्वनिरित्येव कथ्यते।। वा० प० ३-८-२।।

क्रम के आधार पर "ध्वनति" (आवाज़ हो रही है) प्रयोग कार्य एवं कारण के आधार पर कहते हैं। अगर क्रम हट गया, तो फिर "ध्वनि" ही है। कारण पहले ज़रूर बनेगा, कार्य बाद में, कार्य बन गया तो कारण नहीं। कार्य तक ही कारण की ज़िन्दगी है।

अ, इ, उ, क्, ख्, व्, ऐसे वर्ण है। उनको बोलने वाला "वक्ता" है। संस्कृत में "वक्तृ" शब्द है, ऋकारान्त है। "श्रोतृ" मतलब सुनने वाला। कोई बोलेगा, और कोई सुनेगा। फ़ायदों की दृष्टि से लोग बोलते हैं, मगर फ़ालतू नहीं। सुनने का भी फ़ायदा होता है। यह है वक्तृ-श्रोतृ सम्बन्ध। वक्ता (बोलने वाला) वर्ण बोलेगा। श्रोता (सुनने वाला) वर्ण सुनेगा। श्रोता को मेरे इस वर्ण के प्रयोग से ऐसा अर्थ स्फुट होना है-ऐसे सोचकर वक्ता (बोलने वाला) वर्ण बोलेगा। और, मैं जो वर्ण वक्ता से सुनता हूँ उस वर्ण से फ़लाने फ़लाने अर्थ की प्रतीति हो रही है- इस तरह की बोलने सुनने की प्रक्रिया में वर्ण से अर्थ केलिए जो व्यापार हो उस को स्फोट कहलाते है। अर्थ के लिए व्यापार की दृष्टि से वर्ण बोलने वाले पर वक्तृस्फोट और वर्ण सुनने वाले पर श्रोतृस्फोट निर्भर है। क्योंकि वर्ण बोलने का और वर्ण सुनने का लक्ष्य वर्ण के अर्थ के लेने देने की बात है।





From: Arun Kumar <a.kum...@gmail.com>
To: bvpar...@googlegroups.com
Sent: Sat, 9 July, 2011 12:40:52 PM
Subject: {भारतीयविद्वत्परिषत्} भर्तृहरि का शब्दद्वैतवाद
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अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि।।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः।। (भ.गी.)

Arun Kumar

unread,
Jul 9, 2011, 12:22:13 PM7/9/11
to bvpar...@googlegroups.com
धन्यवाद महोदय

2011/7/9 narayanan er <drerna...@yahoo.com>
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