--
Arun Kumar
Researchar
9899315156
कार्यकारणभावेन ध्वनतीत्याश्रितक्रमः।
ध्वनिः
क्रमनिवृत्तौ तु ध्वनिरित्येव कथ्यते।। वा० प०
३-८-२।।
क्रम के आधार पर "ध्वनति" (आवाज़ हो रही है) प्रयोग कार्य एवं कारण के आधार पर कहते हैं। अगर क्रम हट गया, तो फिर "ध्वनि" ही है। कारण पहले ज़रूर बनेगा, कार्य बाद में, कार्य बन गया तो कारण नहीं। कार्य तक ही कारण की ज़िन्दगी है।
अ, इ, उ, क्, ख्, व्, ऐसे वर्ण है। उनको बोलने वाला "वक्ता" है। संस्कृत में "वक्तृ" शब्द है, ऋकारान्त है।
"श्रोतृ" मतलब सुनने वाला। कोई बोलेगा, और कोई सुनेगा। फ़ायदों की दृष्टि से लोग बोलते हैं, मगर फ़ालतू नहीं। सुनने का भी फ़ायदा होता है। यह है वक्तृ-श्रोतृ सम्बन्ध। वक्ता (बोलने वाला) वर्ण बोलेगा। श्रोता (सुनने वाला) वर्ण सुनेगा। श्रोता को मेरे इस वर्ण के प्रयोग से ऐसा अर्थ स्फुट होना है-ऐसे सोचकर वक्ता (बोलने वाला) वर्ण बोलेगा। और, मैं जो वर्ण वक्ता से सुनता हूँ उस वर्ण से फ़लाने फ़लाने अर्थ की प्रतीति हो रही है- इस तरह की बोलने सुनने की प्रक्रिया में वर्ण से अर्थ केलिए जो व्यापार हो उस को स्फोट कहलाते है। अर्थ के लिए व्यापार की दृष्टि से वर्ण बोलने वाले पर वक्तृस्फोट और वर्ण सुनने वाले पर श्रोतृस्फोट निर्भर है। क्योंकि वर्ण बोलने का और वर्ण सुनने का लक्ष्य वर्ण के अर्थ के लेने देने की बात है।