{भारतीयविद्वत्परिषत्} Continuing my verses on Vairagya

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Kushagra Aniket

unread,
Oct 10, 2021, 11:23:42 PMOct 10
to BHARATIYA VIDVAT
सर्वेभ्यो नमः। 

नैष्काम्यशतके अद्यतनम्-

एतानि रूपनवयौवनदर्पितानि
रुच्यान्नपानशयनासनलालितानि।
केयूरहारमणिकुण्डलभूषितानि
ह्यङ्गानि गृध्रपशुवायसभोजनानि॥1

शरत्प्रसङ्गे प्रियसङ्गमाय
व्यग्रोऽसि सज्जा तव पेटिका च।
जानासि किं न स्थलयानकेषु
दुर्गोत्सवे नो चिटिका सुलभ्या॥2

एकोऽपि दोषो गुणिना न सेव्यः
किं नाम कामात्यय एव यस्मिन्।
रागातिरेकेण मुनिर् मृगेऽपि
जन्मान्तरे हा हरिणो बभूव॥3

*पेटिका: suitcase
*चिटिका: bus or train ticket

Best,
Kushagra

Kushagra Aniket
Economist and Management Consultant
Columbia University'21
Cornell University'15
New York, NY, U.S.A.

Kushagra Aniket

unread,
Oct 11, 2021, 8:28:35 PMOct 11
to BHARATIYA VIDVAT
सर्वेभ्यो नमः।

नैष्काम्यशतके अद्यतनम्-

योगस्थितोऽस्तु सुखभोगस्थितोऽस्तु भवरोगस्थितोऽपि चतुरस्
त्यागस्थितोऽस्तु रतिरागस्थितोऽस्तु हतभागस्सभासु सुहृदाम्।
कान्तारतस्तदपि कान्तारतश्चलतु चिन्तां विहाय मनसा
धाटीस्थितोऽस्तु सुरवाटीस्थितोऽस्तु परिपाटीं सुधीस्त्यजतु न॥


“चाहे योग में स्थित हो अथवा सुख भोग में स्थित हो, अथवा संसार रूपी रोग से ही ग्रस्त क्यों न हो; चाहे त्याग में लगा हो अथवा रति राग में लगा हो, अथवा सुहृदों की सभा में अपने यथोचित भाग से वंचित हो; चाहे कान्ता में निरत हो अथवा कठिन मार्ग से चल रहा हो, चाहे धाटी (शत्रुओं के सम्मुख) में हो अथवा देवताओं की वाटिका में स्थित हो, सभी चिन्ताओं को मन से निकाल कर किसी सुधी मनुष्य को अपनी परिपाटी (नियम/प्रकृति) नहीं त्यागनी चाहिए।”

This shloka is in the rare अश्वधाटी meter popularized by the अम्बष्टाकम्: https://sanskritdocuments.org/doc_devii/ambAShTakam.html

In every foot, the second letter is repeated at the 9th and 17th places. In the ideal form, the second letter remains the same throughout the shloka.

Siddharth Wakankar

unread,
Oct 11, 2021, 10:11:22 PMOct 11
to bvpar...@googlegroups.com
सुप्रभात. अप्रतिम. उत्स्फूर्त शब्दचित्रण. शुभेच्छा व धन्यवाद.

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