वृद्धिरादैच् । (अष्टाध्यायी 1.1.1) सूत्र के पदक्रम का स्वारस्य (प्रो. कमलेशकुमार छ. चोकसी)

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kamlesh chokashi

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Feb 10, 2017, 3:38:11 AM2/10/17
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वृद्धिरादैच् । (अष्टाध्यायी 1.1.1) सूत्र के पदक्रम का स्वारस्य

.......................................................................

- प्रो. कमलेशकुमार छ. चोकसी

संस्कृतविभाग, भाषासाहित्यभवन,

गुजरात युनिवर्सिटी, नवरंगपुरा,

अहमदाबाद – 380009 (गुजरात)

मोबा. 9825478876 (Email – kamle...@yahoo.co.in)

पूर्वविधान

आचार्य पाणिनि ने अपने अष्टाध्यायी नामक व्याकरण का प्रारंभ वृद्धिरादैच् । सूत्र से किया है ।[1] इस से पूर्व चतुर्दश प्रत्याहार सूत्र हैं । पर, परम्परा में कई लोग इन्हें आचार्य माहेश्वर की रचना के रूप में देखते हैं । अथवा इस दृष्टि को स्वीकार न रखा जाय, और इन्हें पाणिनि की रचना माना जाय, तो भी ये सूत्र पाणिनीय व्याकरण के बहिर्स्थित मानने होगें । किं वा इन्हें अष्टाध्यायी व्याकरण की प्रस्तावना के रूप में पृथक् मानना ठीक है । क्योंकि इन सूत्रों से प्रत्यक्ष रूप में कोई व्याकरण तन्त्र से संबद्ध कार्य का विधि नहीं किया गया है ।[2] ये तो पाणिनि-प्रोक्त व्याकरण के सूत्रों में प्रयुक्त प्रत्याहार को बनाने या समझने-समझाने के लिये उपयोग में लिये जाने वाले सूत्र हैं । अतः यही मान्य मत है कि शब्दानुशासनरूप पाणिनीय व्याकरण का (अष्टाध्यायी) का प्रारंभ वृद्धिरादैच् । सूत्र से होता है ।

आगे का विमर्श प्रारंभ करें, उससे पूर्व निम्नानुसार तीन बातों को ध्यान में लेना आवश्यक है ।

1. पा.व्या. में सूत्र के छः प्रकार स्वीकृत हैं । इन छः प्रकार के सूत्रों में विधिसूत्र शब्दानुशासन की प्रक्रिया को पूर्ण करते हैं, इस कारण से मुख्य सूत्र माना गया है । शेष पांच सूत्र इस विधिसूत्र को स्पष्ट करने के लिये उपयुक्त होते हैं, अतः इन सूत्रों को विधिसूत्र के सहयोगी सूत्रों के रूप में जाना तथा माना जाता है । (अर्थात् व्याकरणशास्त्र किंवा शब्दानुशासन के रूप में तो विधिसूत्र ही प्रसिद्ध हैं, पर इन विधि सूत्रों के अर्थ को समझने के लिये तदतिरिक्त पञ्चविधि सूत्रों को उपयोग में लाया जाता है । दूसरे शब्दों में कहें तो विधि सूत्र का अर्थघटन करने के लिये संज्ञादि पांच प्रकार के सूत्रों का उपयोग किया जाता है, भाषिक या व्याकरणशास्त्रीय अनुशासन के लिये इन का प्रत्यक्षरूप से प्रयोग नहीं किया जाता है ।) इस स्थिति में कोई भी आचार्य हो, अपने व्याकरणशास्त्र के प्रारंभ में विधिसूत्र की अपेक्षा से तदतिरिक्त विधिसूत्र के सहायक सूत्र को ही रखना चाहेगा ।

इसी स्वाभाविक प्रक्रिया का अनुसरण करते हुए आचार्य पाणिनि ने अपने व्याकरण का प्रारम्भ संज्ञा सूत्र से किया है । वृद्धिरादैच् । यह सूत्र संज्ञासूत्र है । [3]

2. जो संज्ञासूत्र होते हैं, उनमें कम से कम दो पद होते ही हैं । इन दो पदों में एक पद संज्ञी तथा दूसरा पद संज्ञा होता है । बिना संज्ञा-संज्ञी पद के किसी भी संज्ञासूत्र की परिकल्पना नहीं की जा सकती है । कोई भी आचार्य हो तथा कोई भी शास्त्र हो, यदि उसे संज्ञासूत्र की परिकल्पना करनी है, तो उसे अनिवार्य रूप से संज्ञा-संज्ञी - इन दो पदों की परिकल्पना तो करनी ही पडेगी । यह एक स्वाभाविक बात है ।

आचार्य पाणिनि ने भी व्याकरणशास्त्र में भी इसी स्वाभाविक बात का अनुसरण किया है । इस प्रारंभिक संज्ञासूत्र (वृद्धिरादैच् ) में दो पदों की परिकल्पना की है । [4]  

3. संज्ञा सूत्र में आवश्यक संज्ञी तथा संज्ञा पदों के क्रम का भी एक स्वाभाविक नियम है । इस नियम के अनुसार प्रथम संज्ञी पद तथा तदनन्तर संज्ञा पद का प्रयोग होता है । सांसारिक व्यवहार में भी हम इस क्रम का अनुभव कर सकते हैं । तद्यथा - किसी भी संज्ञिभूत पदार्थ की सत्ता प्रथम होती है और बाद में उसके संज्ञाकरण का उपक्रम किया जाता है । प्रथम बालक (संज्ञी) का अस्तित्व होता है, और तदनन्तर उसके नाम (संज्ञा) का अस्तित्व बनता है । इस स्वाभाविक रीति को देखते हुए संज्ञासूत्र में भी प्रथम संज्ञिपद तथा तदनन्तर संज्ञापद का स्थान मान्य रहता है ।

परन्तु आचार्य पाणिनि ने स्वाभाविक रीति से निर्धारित क्रम का अनुसरण न करके वृद्धिरादैच् । सूत्र में इससे विपरीत क्रम रखा है । यहाँ प्रथम (वृद्धिः यह) संज्ञा पद तथा उसके पश्चात् (आदैच् यह) संज्ञी पद को रखा गया है ।

इस प्रकार आचार्य पाणिनि के अपने वृद्धिरादैच् । सूत्र की संरचना में उपर्युक्त तीन स्वाभाविक रीतियों में से प्रथम दो रीतियों का अनुसरण किया है । परन्तु तीसरी स्वाभाविक रीति का अनुसरण न करके उससे विपरीत आचरण किया है । आचार्य का यह आचरण महज एक त्रुटि है, या इस विपरीत आचरण रूप व्यवहार में कोई सविशेष कारण निहित है, यह विचारणीय है । पाणिनीय परम्परा में इस पर सबसे प्रथम विचार भाष्यकार आचार्य पतञ्जलि ने किया है, जो निम्नानुसार है –

क. एतदेकमाचार्यस्य मङ्गलार्थे मृष्यताम् । माङ्गलिक आचार्यो महतः शास्त्रौघस्य मङ्गलार्थं वृद्धिशब्दमादितः प्रयुङ्क्ते । मङ्गलादीनि हि शास्त्राणि प्रथन्ते वीरपुरुषाणि च भवन्ति, आयुष्मत्पुरुषाणि च । अध्येतारश्च वृद्धियुक्ता यथा स्युरिति । [5]

अर्थात् आचार्य पाणिनि का यह आचार मंगल के लिये है, ऐसा समझना चाहिये । मांगलिक आचार्य अपने बहुत बडे शास्त्र समूह के मंगल के लिये वृद्धि शब्द को आदि में प्रयुक्त कर रहे हैं । जो मंगलादि शास्त्र होते हैं, उन्हीं का विस्तार होता है, उस के पढने वाले वीरपुरुष बनते हैं तथा आयुष्मान् होते हैं । (प्रस्तुत प्रसंग में वृद्धि शब्द के द्वारा किये जा रहे मंगलाचरण में) इस शास्त्र के पढने वाले वृद्धि से युक्त हों, इस प्रकार की मंगल कामना की गई है । (अर्थात् मङ्गलार्थ वृद्धि शब्द को प्रथम क्रम पर रखा है ।)  

ख. इस भाष्य पंक्ति का विवेचन करते हुए प्रदीपकार कैयट का कथन है कि – इह तु मङ्गलार्थोन्यथा पाठक्रमः । आर्थस्तवन्यथा क्रमः ।[6] अर्थात् यहाँ पर मङ्गल की सिद्धि के लिये (संज्ञा-संज्ञी इस प्रकार का) अन्यथा क्रम रखा गया है । जब कि अर्थ की (=सूत्रार्थ की) सिद्धि के लिये तो हमें (संज्ञी-संज्ञा इस प्रकार का) अन्यथा क्रम स्वीकार करना होता है ।

भाष्यकार के उपर्युक्त वचन का अनुसरण करते हुए आगे की प्रायः सम्पूर्ण पा. व्या. परम्परा में इसी अभिप्राय को पुनरुक्त किया गया है । अर्थात् पा.परंपरा के प्रायः सभी आचार्यों ने वृद्धिरादैच् । इस संज्ञा सूत्र में पद क्रम के परिवर्तन का एक मात्र कारण मङ्गलार्थ बताया है ।

अब आचार्य पाणिनि के मन में किस प्रकार के मंगलार्थ की कामना है, उसको उजागर करते हुए भाष्यकार का कथन है कि - अध्येतारश्च वृद्धियुक्ता यथा स्युरिति । अर्थात् इस शास्त्र को पढने वाले वृद्धि से युक्त हों । पा. व्याकरण परंपरा ने भाष्यकार के इस वचन को भी सम्पूर्णरूप से मान्य रखा है । मानव के मन में उठने वाली अनेक कामनाओं में से एक कामना वृद्धि की भी है । अतः भाष्यकार के इस वचन पर कोई शंका या प्रश्न करना ठीक नहीं है । परन्तु इस वृद्धि की कामना का आचार्य पाणिनि परिकल्पित क्षेत्र कौन सा है ? यह प्रश्न पाठक को अवश्य होता है । दूसरे शब्दों में कहें तो पाठक के मन में शंका रहती है कि अध्येता की वृद्धि का क्षेत्र क्या हो ?  आचार्य पाणिनि के मन में क्या 1. शारीरिक, मानसिक या आत्मिक वृद्धि अपेक्षित है ? क्या 2. धन,  यश, पद, प्रतिष्ठा, सुख-वैभव इत्यादि की वृद्धि अपेक्षित है ? क्या 3. जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने रूप बुद्धि (ज्ञान)की प्राप्तिरूप वृद्धि अपेक्षित है ? इस प्रकार से ऐसी तो कई अन्य परिकल्पनाएँ हमारे मन में खडी हो जाती हैं । तात्पर्य यह है कि इन विविध प्रकार की संभवित वृद्धियों में से कौन सी वृद्धि सूत्रकार को अभिप्रेत रही है, यह प्रश्न है । इसका निश्चयात्मक उत्तर प्राप्त करना आवश्यक बन जाता है । अन्यथा मंगल के रूप में अध्येताओं की वृद्धि हो, यह महाभाष्यकार का कथन मात्र एक औपचारिक बन कर रह जायेगा

पा. परम्परा में इस का उत्तर कहीं पर भी दिखाई नहीं देता है । इतना ही नहीं पा. परम्परा में अद्ययावत् कहीं पर भी न तो इस प्रकार की जिज्ञासा को जागरित किया गया है और न ही इस जिज्ञासा को मन में रख कर उसके संभवित समाधान के रूप में कहीं कुछ कहा गया है । समग्र पा.व्या.परम्परा इस संदर्भ में सर्वथा मौन है । यदि हम सामान्य रूप से विचार करते हुए उपर्युक्त जिज्ञासा का समाधान विचारें, तो यह कहा जा सकता है कि इस शास्त्र के पठन-पाठन करने वालों की सार्वत्रिक वृद्धि हो, इस प्रकार की मङ्गलकामना इस वृद्धि पद को आदि में उच्चरित करके आचार्य पाणिनि के द्वारा व्यक्त की गई है ।

एक ओर स्वाभाविक समाधान मन में आता है । आचार्य पाणिनि अष्टाध्यायी के रचयिता है । रचयिता को अपनी रचना के प्रति राग होना स्वाभाविक है । एक शास्त्रकार के रूप में, शास्त्र के रचयिता के मन में, इस राग का स्वरूप क्या हो सकता है,  इसकी कल्पना करना अतीव सरल है । अपने शास्त्र को दृष्टि समक्ष रख कर शास्त्रकार का मन पढने पढाने वाले गुरु-शिष्यों की स्वशास्त्रीय विषय के परिज्ञान में सतत वृद्धि होती रहे,  ऐसी भावना के अतिरिक्त दूसरा क्या सोच सकता है ? अर्थात् इस शास्त्र को पढने वाले अपने सभी शिष्यों की शास्त्राध्ययनरूप कार्य में सतत वृद्धि होती रहे, यह कामना सूत्रकार के मन में भी निहित है, ऐसा माना जा सकता है । इसी मनोनिहित कामना के चलते सूत्रकार पाणिनि ने अपने शाब्दानुशासन के प्रथम सूत्र में वृद्धिः पद का प्रथम प्रयोग किया है ।

यद्यपि यह समाधान संतोषजनक है, परन्तु फिर भी आचार्य पाणिनि जिस सुतीक्ष्ण मेधा के स्वामी है, वह मेधा मात्र ऐसी औपचारिक बात करके रह जाय, ऐसा नहीं हो सकता है । इस प्रकार का मङ्गलाचरण तो कोई भी कर सकता है । पाणिनि के मन में अवश्य ही कुछ विशेष होना चाहिये । पाणिनीय व्याकरण के अद्येता के रूप में हमारे मन में यह प्रश्न कई वर्षों से सतत होता रहा है । बहुत सूक्ष्म चिन्तन तथा पा.व्या. के दशाब्दियों के अध्यापनजन्य तथा अनुभवजन्य ज्ञान से आचार्य पाणिनि के इस (वृद्धि शब्द को आदि में रखने रूप) अपने व्यवहार के पीछे जिन महत्त्वपूर्ण सूचनों का हमें संकेत प्राप्त हुआ है, उसे इस शोधालेख में विदुषां विचाराय सन्तोषाय च प्रस्तुत है । [7]

हमारा मानना है कि वृद्धिरादैच् । सूत्र में प्रयुक्त वृद्धि शब्द के निम्नानुसार पांच अर्थ हैं –

1. (माङ्गलिकपदत्वेन) वृद्धिः अर्थात् सार्वत्रिक संवर्धन ।

2. (संज्ञाशब्दत्वेन) वृद्धिः अर्थात् पा.व्या. की एक संज्ञा (किंवा पा.व्या. का एक पारिभाषिक) शब्द ।

3. (प्रतीकशब्दत्वेन) वृद्धिः अर्थात् पा.व्या.की समस्त संज्ञाओं का प्रतीक शब्द । (इस प्रतीकार्थ के कारण इस पद के उच्चारण के साथ ही पा.व्या. गत सभी संज्ञाओं की प्रतीति होती है ।)

प्रथम इन तीन अर्थों के स्वारस्य का विचार करते हैं । जो माङ्गलिकपदत्वेन वृद्धि शब्द है, वह सार्वत्रिक संवर्धन रूप मंगल का सूचक है । यह बात भाष्यकार पतंजलि को भी मान्य है । दूसरा जो संज्ञाशब्दत्वेन वृद्धि पद है, वह पा.व्या. की एक संज्ञा (किंवा पा.व्या. का एक पारिभाषिक) शब्द के रूप में है । इस संज्ञाशब्द को ध्यान में रख कर वृद्धिरादैच् । सूत्र का अर्थ संपन्न किया जाता है । यह बात पा.व्या. के सभी वृत्तिकार आचार्यों को मान्य है । तीसरा प्रतीकशब्दत्वेन जो वृद्धि शब्द है वह पा.व्या.की समस्त संज्ञाओं के प्रतीक के रूप में है । इस प्रतीकार्थ के कारण इस पद के उच्चारण के साथ ही पा.व्या. गत सभी संज्ञाओं की प्रतीति होती है । यह प्रतीति इस बात का संकेत करती है कि यद्यपि पा.व्या. षड्विध सूत्र हैं, पर उनमें प्रथम स्थान संज्ञासूत्रों का है । अर्थात् विधि आदि सूत्रों के अर्थघटन के उपक्रम में सर्वप्रथम संज्ञा सूत्रों का उपयोग करना होता है । संज्ञासूत्र के उपयोग किये बिना अन्य पांच प्रकार के सूत्रों के अर्थ का परिज्ञान है । इस प्रकार यह तीसरा वृद्धि शब्द अष्टाध्यायी की सभी संज्ञाओं का सूचक है ।

अब आगे के दो ओर विशिष्ट अर्थों पर विचार करें ।

चोथे प्रकार का वृद्धि शब्द व्युत्पन्नशब्दत्वेन है । और वह वर्धते या सा वृद्धिः (कर्तरि क्तिन् प्रत्ययः।) अर्थात् बढना क्रिया के कर्ता का या किसी बढी हुई वस्तु का सूचक है । [8]  

आचार्य पाणिनि ने वृद्धिरादैच् । सूत्र में संज्ञा-संज्ञी पदों का व्युत्क्रम करके जिस वृद्धिः पद को प्रथम स्थान पर रखा है, वह इस अष्टाध्यायी नामक ग्रन्थ की बढी हुई पाठ्यसामग्री की सूचना देता है । हम जानते हैं कि पा. व्या. परम्परा में [9] प्रचलित अष्टाध्यायी की पठन-पाठन पद्धति में सर्वप्रथम सूत्रार्थ का विचार किया जाता है । इस सूत्रार्थ विचार में 1. पदच्छेद तथा पदपरिचय, 2. सूत्र में प्रयुक्त पद में विहित समास का परिचय, 3. अनुवृत्ति का परिज्ञान करते हुए, अन्त में 4. सूत्रार्थ तक पहुँचना होता है । इस प्रकार से एक बार सूत्रार्थ का परिज्ञान हो जाने पर, द्वितीय सोपान के रूप में तत्तत् सूत्र के द्वारा किस पद में (उदाहरण या लक्ष्य में) किस प्रकार से यह सूत्र कार्य करता है, इस बात की जानकारी भी करनी होती है । इस के लिये 5. उदाहरण का भी विचार किया जाता है ।

व्या. शास्त्र में इन उदाहरणों के भी दो रूप हैं । उदाहरण के एक रूप में तो हमें मात्र अमुक सूत्र के द्वारा किस परिस्थिति में क्या कार्य सम्पन्न किया जाता है, बस इतना ही विचारना - जानना होता है । जब कि उदाहरण के दूसरे रूप में (उस उदाहरणभूत शब्द की) समग्र रूपसिद्धि प्रक्रिया को विचारना-जानना होता है । सारतः कहें, तो अष्टाध्यायी की पठन-पाठन की पद्धति में पांच सोपान है । इन पांच सोपानों के द्वारा सूत्र को समझा जाता है । पर, मात्र सूत्रार्थ की जानकारी से ही काम चल जायेगा, ऐसा यहाँ नहीं है । इसके अतिरिक्त एक ओर बात भी है जिसे जानना आवश्यक होता है, और वह है रूपसिद्धि की प्रक्रिया । बिना रूपसिद्धि की प्रक्रिया को जाने पा.व्या. के अध्ययन का कार्य अधूरा ही रह जाता है ।

तद्यथा – वृद्धिरादैच् । इस प्रारंभिक सूत्र को ही लेवें, तो इस सूत्र को समझने के लिये प्रथम तो 1. पदच्छेद तथा पदपरिचय (अर्थात् वृद्धिः 1.1 आदैच् 1.1), 2. सूत्र में प्रयुक्त पद में विहित समास का परिचय अर्थात् आत् च ऐच् च – आदैच् , समाहारद्वन्द्वः), 3. अनुवृत्ति का परिज्ञान (यहाँ किसी पद की अनुवृत्ति नहीं आती है ।) करते हुए, अन्त में 4. सूत्रार्थ (आत् ऐच् च वृद्धिसंज्ञके भवतः।) तक पहुँचना होता है । इस प्रकार सूत्रार्थ के परिज्ञान के बाद इस सूत्र के द्वारा किस पद में किस प्रकार से कार्य सम्पन्न हो रहा है, इस बात की जानकारी करने के लिये 5. उदाहरण को (जैसे कि भागः) भी विचारना होता है । (इस भागः पद में भज् + घञ् > अ इस स्थिति में अत उपधायाः । पा.सू. 7.2.116 से भज् के उपधाभूत अ को वृद्धि प्राप्त होती है । इस स्थिति में वृद्धि की संज्ञा का बोध कराने के लिये वृद्धिरादैच् । यह संज्ञा सूत्र प्रवृत्त होता है और सूचित करता है कि आ, ऐ तथा औ की वृद्धिसंज्ञा होती है । अर्थात् यहाँ पर वृद्धि करने का आशय भ के अ के स्थान में आ करना है । फलतः यहाँ भाज् > भाग् + अ = भाग > भागः इस प्रकार से पदसिद्धि होती है । इसी तरह सभी पदों की सिद्धि की जाती है ।

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि पा.व्या. के सूत्रों के पठन-पाठन में मात्र सूत्रार्थ के जानने का ही लक्ष्य नहीं होता है, अपितु उस उस सूत्र के द्वारा किये जाने वाले कार्य को अर्थात् रूपसिद्धि प्रक्रिया को (प्राथमिक स्तर पर) आंशिक रूप से तथा (उच्च स्तर पर) समग्रतया जानना भी अपेक्षित होता है ।

 सामान्यतः संस्कृत साहित्य के रधुवंशादि को पढने वाला शिष्य समुदाय (रघुवंशगत) पद्यार्थ को ग्रहण करके अपने पठन की समाप्ति कर लेता है । [10] इसी तरह से पा.व्या. शास्त्र को पढने वाला शिष्य समुदाय (पा.सूत्रगत) सूत्रार्थ को ग्रहण करके अपने पठन की समाप्ति नहीं करता है । अपितु उसे तो प्रथम सूत्रार्थ का ग्रहण करना होता है और तदनन्तर (एक ओर अतिरिक्त पाठ्यवस्तु के रूप में) रूपसिद्धि प्रक्रिया को भी पढना होता है । इतना ही नहीं इस रूपसिद्धि की प्रक्रिया को पढने के समय में समग्र पा.व्या. को सहैव स्मृतिपथ पर रखना होता है । ऐसा न करने पर रूपसिद्धि की प्रक्रिया को सम्पन्न करना विद्यार्थी के लिये संभव नहीं होता है । 

इस प्रकार से विचारने पर स्पष्ट होता है कि अन्यान्य पाठ्यग्रन्थों को पढने की अपेक्षा से इस पा.व्या. का पाठ्यवस्तु वृद्ध है, बढा हुआ है, व्यापक है । आचार्य पाणिनि ने इसी वृद्धिगत पाठ्य-वस्तु की सूचना वृद्धि पद को प्रारंभ में रख कर दे रहे हैं । एवं वृद्धि पद को प्रथम क्रम में रखने का एक स्वारस्य पा.व्या. का पाठ्यवस्तु वृद्ध है, इस की सूचना देना है । और अन्त में -

5. (व्युत्पन्नशब्दत्वेन) वृद्धिः अर्थात् (वर्धते अनया सा वृद्धिः। करणे क्तिन् प्रत्ययः ।) बढने का साधन, प्रगति साधने का साधन । [11]

वृद्धि शब्द का प्रयोग आदि में कर के आचार्य पाणिनि सूचित करना चाहते हैं कि – (अन्य पाठ्यग्रन्थों की अपेक्षा से इस अष्टाध्यायीरूपी पाठ्यवस्तु के वृद्ध विषयवस्तु अर्थात् ) रूपसिद्धि की प्रक्रिया में आगे बढने के लिये वृद्धि अर्थात् संज्ञा (संज्ञाकरण) मार्गदर्शक बनेगा और पाठक का कल्याण करेगा ।

व्याकरण शास्त्र के पाठक को रूपसिद्धि की प्रक्रिया में अमुक सूत्र के बाद कौन सा सूत्र प्रवृत्त होगा, इस की जानकारी करने में काफी परेशानी होती है । इस परेशानी से बचने का उपाय स्वयं आचार्य पाणिनि ने इस वृद्धि शब्द को प्रारंभ में रख करके सुझाया है । रूपसिद्धि की प्रक्रिया का प्रारंभ संज्ञासूत्र से होगा । तदनन्तर आगे की प्रक्रिया करने में भी संज्ञा सूत्र ही मार्गदर्शक बने रहते हैं । इस बात को परंपरा में या या संज्ञा सा सा फलवती – इस न्याय से प्रचलित किया गया है । पर, इस का मूलभूत संकेत पाणिनि के किस वचन में है, इस का कोई समाधान नहीं है । हमारे विचार से इस वृद्धि शब्द में यह विचार पडा है । रूपसिद्धि प्रक्रिया में आगे बढने के मार्गदर्शक साधन के रूप में संज्ञाकरण है, इस बात की ओर ध्यानाकृष्ट करने के लिये आचार्य पाणिनि ने वृद्धि शब्द का पूर्वप्रयोग किया है ।

इस प्रकार से विचारने पर पता चलता है कि पा.व्या. के द्वारा संपन्न होने वाली किसी भी रूपसिद्धि की प्रक्रिया में सर्वप्रथम संज्ञाकरण का कार्य ही किया जाता है । सुबन्तपदों की रूपसिद्धि प्रक्रिया का प्रारंभ प्रातिपदिक संज्ञा से तथा तिङन्तपदों की रूपसिद्धि प्रक्रिया का प्रारंभ धातु संज्ञा से होता है । क्वचित् सर्वविधिभ्यो लोपविधिर्बलियान् – इस परिभाषावचन के चलते कुछ पदों की रूपसिद्धि प्रक्रिया का प्रारंभ इत्संज्ञा से होता है । पर, यह तो निश्चित ही है कि किसी भी रूपसिद्धि की प्रक्रिया का प्रारंभ संज्ञाकरण से ही होगा । इस महत्त्वपूर्ण जानकारी का संकेत भी हमें वृद्धि शब्द के पूर्वप्रयोग से आचार्य पाणिनि ने दे दिया है ।

इसे हम इस प्रकार से भी समझ सकते हैं कि यदि हमें "भवति" पद की रूपसिद्धि प्रक्रिया करनी है, तो सब से पहले इस रूपसिद्धि की प्रक्रिया का प्रारंभ कैसे किया जा सकता है ? यह प्रश्न होगा । इसका उत्तर धातुसंज्ञा है । धातुसंज्ञा हमें भवति की रूपसिद्धि प्रक्रिया को प्रारंभ करवाती है । प्रारंभ हो जाने के बाद अब आगे आगे की प्रक्रिया करने के लिये जब भी कोई दिशा न मिले, तब किसी न किसी संज्ञा को याद करना होगा । इस प्रकार से प्रारंभ की गई प्रत्येक रूपसिद्धि की प्रक्रिया को आगे कैसे बढाया जाता है ? कैसे इस बात का पता लगे कि अब आगे क्या प्रक्रिया करनी है ? इत्यादि सभी प्रश्नों के उत्तर का संकेत आचार्य पाणिनि ने इस वृद्धि शब्द के द्वारा दे दिया है । संक्षेपतः कही जा सकता है कि रूपसिद्धि प्रक्रिया में आगे की ओर बढने रूप वृद्धि के लिये उपयोगी साधन पा.व्या. की समग्र संज्ञायें है । 

इस प्रकार से वृद्धिरादैच् । सूत्र में वृद्धि पद के क्रम का स्वारस्य मात्र मंगलाचरण ही नहीं है अपितु तदतिरिक्त (क.) षड्विध सूत्रों में संज्ञा सूत्र के आद्यस्थानीय होने, (ख.) सूत्रार्थ के परिज्ञान में संज्ञा की आवश्यकता (ग.) पा.व्या. के पाठ्यवस्तु का बढा हुआ होना तथा (घ.) इस बढे हुए पाठ्यवस्तुरूप रूपसिद्धि की प्रक्रिया में आगे बढने के लिये (अर्थात् वृद्धि प्राप्त करने के लिये) संज्ञा की उपयोगिता – इत्यादि का संकेत करने के लिये आचार्य पाणिनि ने वृद्धिरादैच् । सूत्र में वृद्धि पद को पूर्व में रखा है । इति दिक् ।।



[1] . पाणिनीयाष्टाध्यायी 1.1.1

[2] . अर्थात् लक्ष्य की सिद्धि के लिये ये प्रत्याहार सूत्र साक्षादुपकारक नहीं होते हैं । अथ च इन प्रत्याहार सूत्रों में वर्णोपदेश है । वर्णोपदेश का कार्य वस्तुतः शिक्षा नामक वेदांग का विषय है, इस कारण भी इसे व्याकरण का अंग न मान कर उपांग या सहयोगी भाग मानना ही ठीक है ।

[3] . पाणिनीय व्याकरण सूत्रों को छः प्रकार का माना गया है । तद्यथा – संज्ञा च परिभाषा च विधिर्नियम एव च । अतिदेशोधिकारश्च षड्विधिं सूत्रलक्षणम् ।। अर्थात् 1. संज्ञा 2. परिभाषा 3. विधि 4. नियम 5. अतिदेश तथा 6. अधिकार – ये छः प्रकार के सूत्र हैं ।

 

[4] . वृद्धिः – यह संज्ञापद है । तथा आदैच् – यह संज्ञी पद है ।

[5] . द्रष्टव्यम् – महाभाष्यम् , पृ. 164-165

[6] . द्रष्टव्यम् – प्रदीपः , पृ. 165

[7]. आचार्य के इन सूचनों का अनुभव पा.व्या. के प्रत्येक अध्येता को होता रहता है, परन्तु वृद्धिरादैच् । सूत्र में पदक्रम के परिवर्तन के द्वारा आचार्य स्वयं इस आशय को कह रहे हैं, इस बात की ओर आज तक किसी विद्वान् का ध्यान नहीं गया है । महती सूक्ष्मेक्षिका वर्तते सूत्रकारस्य । - इस वचन के द्वारा आचार्य पाणिनि की जिस प्रखर मेधा को इङ्गित किया गया है, उसके प्रमाण के रूप में भी इस क्रम परिवर्तन के व्यवहार को सम्मिलित किया जा सकता है । इस शोधालेख की आगे की पंक्तियों में जिस प्रकार से विचार किया गया है, उस प्रकार से विचारने पर इस तथ्य को जाना जा सकेगा ।

[8].  मतिबुद्धिपूजार्थेभ्यः । पा.व्या. 3.2. 

[9] . यह पद्धति मात्र पा.व्या. परम्परा में ही है, ऐसी बात नहीं है । जितने भी सूत्र शैली से रचित व्याकरण शास्त्र हैं, उन सभी में इसी प्रकार से सूत्रार्थ विमर्श तथा रूपसिद्धि की प्रक्रिया – इन दोनों को समान रूप से अध्ययन का विषय बनाया जाता है ।

[10] . यद्यपि कोई यह कह सकता है कि रघुवंशादि के पठन में भी काव्यशास्त्रीय विमर्श आदि सुसूक्ष्म अध्ययन भी अपेक्षित होता है, और इस प्रकार अन्यान्य साहित्य के पठन की तरह ही पा.व्या. का पठन है, उसे किसी रूप में विशेष बताना ठीक नहीं । ऐसे विचार वाले विद्वानों की सेवा में हम कहना चाहेगें कि पा.व्या. की तरह समग्र पाठ्यग्रन्थ को सहैव पठने की आवश्यकता रूप विशेषता अन्यत्र कहीं पर नहीं होती है ।

इस बात को ज्यादा स्पष्टता के साथ समझाने के लिये माता के गर्भगत बालक के विकास को प्रतीकरूप में याद किया जा सकता है । पा.व्या. की जिस प्रकार से संरचना विचारी गई है, वह इसी प्राकृतिक घटना का प्रतिनिधित्व करती है । जब कि अन्यान्य साहित्य के पठन के संदर्भ में मानव के द्वारा निर्मित किये जाने वाले किसी पदार्थ की संरचना को प्रतीकरूप से याद किया जा सकता है । उदाहरण के रूप में मानव के द्वारा निर्मित की जाने वाली कुर्सी के विविध अंग अलग अलग रूप से सोपानशः तैयार किये जाते हैं, तथा अन्ततो गत्वा वे संयोजित हो कर पदार्थ के निर्माण की प्रक्रिया को सम्पन्न करते हैं । मानव के द्वारा आचरित इस निर्माण पद्धति में यह आवश्यक नहीं होता है कि खुर्सी के जब पैर बनते हैं, तभी उस की पीठ बनानी होती है । परन्तु माता के गर्भ में विकसित होने वाले शिशु के प्रत्येक अंग का निर्माण सहैव चलता है । पा.व्या. के निर्माण की यह प्रक्रिया जैसे सहैव सम्पन्न होती है, वैसे ही उसके पठन-पाठन में भी समग्र पा.व्या. को सहैव ही पठन कार्य का अंग बनाना होता है । जब कि रघुवंशादि में ऐसा अपेक्षित नहीं है ।   

[11].  क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम् । पा.व्या. 3.3.174  क्तिच् मान कर यहाँ पर वर्धताम् यह अर्थ लिया जा सकता है ।।  

Jagannatha s

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Feb 10, 2017, 12:59:42 PM2/10/17
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kamlesh chokashi

unread,
Feb 13, 2017, 2:31:43 AM2/13/17
to भारतीयविद्वत्परिषत्
एतेषामपि खलु उपक्रमाणाम् स्वारस्यम् अन्वेषणीयम् ।

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