रोज ए महशर

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Narinder Kumar

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Mar 19, 2026, 6:10:30 PMMar 19
to dhan nirankar
धन निरंकार जी 🙏

रोज़ ए महशर छँट जाएँगे 

सब मोमन ओ काफ़िर 

तुम क्यों शनाखतों में वकत जाया कर रहे हो 


सूख जाएगा  यह पौदा धूप लगने दो इसे 

क्यों इसे तुम हदसे जयादा साया कर रहे हो 


कफ़न भी जल जाएगा चिता की आग में 

नहीं साथ जाएगी कयों 

माया-माया कर रहे हो  


रूह का लिबास है जो उतर जाएगा एक रोज 

तुम क्यों देख आइने में 

काया-काया कर रहे हो। 


“मस्त” मौसमों के साथ बदल जाओगे आहिस्ता आहिस्ता 

तुम क्यों नाकामियों को सरमाया कर रहे  हो। 

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