धन निरंकार जी 🙏
भटकी हुई आत्मा को घर मिल जाता है
ज़मीन से आसमान, आसमान से ज़मीन फिर बादल बनकर
बूँद को इक रोज़ सागर मिल जाता है
राहों में रूलकर आँधियों में उड़कर जैसे
ज़र्रे को फिर से परबत मिल जाता है
जिसने जितना जितना माना जितना जितना जाना उसने उतना उतना है लाभ उठाना निराकार तो हर जगह घट घट क़तरे क़तरे में भी आख़िर मिल जाता है
मिल जाए मंज़िल मुकाम ठिकाना
ख़त्म हो जाए आना जाना
मान ले जो जन गुरू का भाना उसको सच में गुरु का यह दर मिल जाता है
शक शुबहा सब ख़त्म हो जाए बचन गुरू का जब दिलमें घर कर जाए
सब्र आ जाए शुक्र आ जाए
“मस्त” जब यह परम पिता हाजर नाजिर, मिल जाता है।