बन्दगी से ही आती है समझ जिन्दगी की डगर
वरना इन्सान को कब आता
है सब्र।
कोई जुल्म ओ सितम न करे खुदा की कसम
याद हो जाए गर अपना हश्र।
प्यार क्या है और प्यार का क्या मतलब है
कोई नफरत न करे ,गर हो पयार का असर।
बन्दगी के नाम पर न हो कर्मकांड और दिखावा
आ जाए बन्दे को ,बनदगी की समझ अगर
“मस्त” महमान हैं सभी इस फ़ानी जहान में
असल तो और ही है कहीं इनसान का घर।