बाबा आज की वाणी में बच्चों को स्थाई (एकरस) अचल अवस्था बनाने का साधन बताते हुए ये कह रहे हैं की अवस्था स्थाई तब बनेगी जब निरन्तर योग में रहेंगे।
बहुत बार इस ब्राह्मण जीवन में ये देखा जाता है की निरंतर योग में हम आत्माएं रह नहीं पातीं। मन तो ये कहता है की मैं बाबा का ही हूँ। पर जब बुद्धि को एकाग्र कर एकांतवासी होने का प्रयास करते है, तब बहुत सारे बाहरी विचार मन-बुद्धि को एकाग्र होने नहीं देते। बाबा कहता है योग टूटता तब है जब किसी में ममत्व है इसलिए नष्टामोहा बनो। बुद्धि को पवित्र बनाओ। अब जब दिनभर हम गृहस्थ में जीवन व्यव्हार के कार्यो में उलझे रहते हैं, तब मेरेपन के भान के कारण हम सारे कार्य का बोझ बाबा को न दे अपने सर पे ले लेते हैं। इस वजह से मेरा हर कार्य से ममत्व जुड़ जाता है। ममत्व कई प्रकार के होते हैं ? वस्तु, वैभव, स्थान के अलावा, संबंधों से ममत्व, अपनी जीवन-श्रृंखला से ममत्व, अपनी मत से ममत्व, अपनी सफलताओं से ममत्व और कभी कभी अपने पुराने स्वाभाव संस्कारो से भी ममत्व रहता है जैसे की कुछ आदतें ऐसी होतीं हैं जो हम चाह कर भी उनसे छूटने के प्रयत्न से भी डरते हैं। निद्रा और आलस्य से ममत्व...और ये ममत्व भरी बुद्धि ज्ञान को धारण नहीं कर पाती। इसीलिए बाबा कहता ज्ञान की धारणा भी पवित्र बुद्धि में ही होती है इसलिए बुद्धि रूपी बर्तन स्वच्छ हो, बाप से योग जुटा रहे। मुझ आत्मा की बुद्धि पवित्र बने इस के लिए मुझे दिन भर इस बुद्धि को कर्मयोगी बनाना आवश्यक है। कर्मयोगी का तात्पर्य ये नहीं की कर्म ऐसा हो जो कुछ आर्थिक सुख ही दे। नहीं...कर्म ऐसा हो जो मुझे निद्रा, आलस्य और अलबेलापन से दूर रखे। जैसे की अगर आज मेरा ऑफिस नहीं है और में घर में हूँ, तो में कुछ ऐसा कर्म ढूंढूं जो मुझे निद्रा और आलस्य से दूर रखे। जैसे की भोजन बनाना, गार्डनिंग करना, घर की साफ़ सफाई करना, कुछ नहीं तो ज्ञान के अनेक खजानों में से कुछ पढ़ना, उस पर चिंतन मथन करना। जब हम अपने आपको कर्मयोगी स्तिथि में स्तिथ रखेंगे, हमारा उद्देश्य श्रीमत पर चलना होगा, हमारा ध्यान इस और होगा की मैं अपना समय सफल करू,बुद्धि को देह अभिमान से मुक्त करने लिए हर कार्य को बाबा का कार्य समझ कर चलूँ, तो हमारा ममत्व किसी देह या देह के धर्मों से नहीं जुड़ेगा और ये बुद्धि देखते देखते ही कुछ दिनों में पवित्र होती जाएगी। पवित्रता की एक परिभाषा यह भी है की जो में सोचूँ, वही में बोलूं और वही में करूँ। जब मेरी सारी ऊर्जा एक ही दिशा में प्रवाहित होने लगेगी, तब मुझे एकाग्र और एकांतवासी हो अपने शान्ति के सागर पिता से जुड़ शान्ति के प्रकम्पन को सारा संसार में फ़ैलाने में कोई विघ्न नहीं पड़ेंगे।
ईश्वरीय सेवा में
ब्र. कु. संतोष