वर्तमान काल गले के अन्दर हाथ डालने का उत्तम समय है

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Jugalkishore Somani

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Aug 17, 2011, 11:02:15 PM8/17/11
to Bharat Trust, hindusth...@googlegroups.com, S K Khemka
अन्ना ने देश की जनता को एक दिशा दी है , इन्ही कदमों से भ्रष्टाचार - निर्मूल की राह मिलेगी . आज देश का सौभाग्य है कि अन्ना और रामदेव सरीखे व्यक्तित्व हमारा नेतृत्व करने को तत्पर है , ऐसी घटनाएं विरल ही होती है . और यो इतिहास गवाह है - रावण , कंस या फिर अंग्रेज अपनी अंतिम शक्ति तक लड़ते रहे ! भला यह 'वर्तमान' क्यों नहीं लड़ेगा ? अगर कोई 'गटक' जाय तो क्या सस्ते में उगल देगा ? हममे इतनी शक्ति तो होनी ही चाहिए कि " गले के अन्दर हाथ डाल कर गटकी 'वस्तु' निकाल सकें ". वर्तमान काल गले के अन्दर हाथ डालने का उत्तम समय है .
जुगल किशोर सोमाणी , जयपुर 


J K SOMANI.jpg

Bhawani Gururani

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Aug 18, 2011, 2:05:05 AM8/18/11
to bharatswab...@googlegroups.com, hindusth...@googlegroups.com, S K Khemka
ॐ,
श्री सोमानिजी का कहना सही है । रावण, कंस और अंग्रेजों जैसे राक्षस मरने तक अपने अहंकार से निजात नहीं पा सके  और कल के ग्रास बने । हमारे देश के काले अंग्रेज़ सोचते हैं उनको जनता ने सांसद क्या बना दिया उनके हाथ में अमर बेल की बूटी लग गई है और वे अमर हो गए हैं और अब वो जो चाहें कर सकते हैं; किसी को उनसे कुछ भी पूछने का अधिकार नहीं है और जो कोई पुछेगा उसको सबक सिखा दिया जाएगा । ये आज रावण, कंस और अंग्रेजों के अंत को भूल कर भष्मासुर बनने का ख्वाब देख रहे हैं ।            देश के "inactivemode, silentmode, और अंतमें swichoffmode" वाले पंतप्रधान जिन्होने अपनी दूसरी पारी शुरू करते हुए कहा था 'मुझे जनता का जनमत मिला है ' उनका जनता के प्रति रवैया सारे देश के सामने है । अब यह देश की जनता को सोचना है कि उन्होने जनमत इसी दिन के लिए दिया था ?
         आप का कहना "हममे इतनी शक्ति तो होनी ही चाहिए कि " गले के अन्दर हाथ डाल कर गटकी 'वस्तु' निकाल सकें" को सार्थक करने के लिए हम सभी को एकजुट होना होगा । आज अन्नाजी कि जो आँधी चल रही है उस आँधी को "बबंडर" बना देना
है । उसके लिए  सभी भारत वासी, सभी भारत स्वाभिमानी, सभी देश प्रेमियों, सभी देशभक्तों को अपने बैचारिक मतभेदों को ताले में बंद करके इस आँधी को बबंडर बनाने में जुट जाना चाहिए ।
     जय हिन्द
     बंदेमातरम

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Jugalkishore Somani

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Aug 28, 2011, 5:26:17 AM8/28/11
to Bharat Trust, hindusth...@googlegroups.com, DR. HARISHCHANDRA SHAH, Dr. Jaideep Arya, Dr. Ved Pratap Vaidik, Dr. Ashutosh vajpeyee, Babulalji Totla Jaipur, S K Khemka
                                                      हम हैं कौन से मुगालते में ?
     
महिमा मंडन करवाना और महिमा युक्त होना : ये दोनों बातें बिलकुल अलग अलग हैं . आज के दैनिक वातावरण में नादानी , अपरिपक्वता , छिछोरापन , बड़बोलापन, अशिष्ट वाणी , असभ्य - मिलन का तरीका और " मैं तो बस मैं ही हूँ " .... न जाने क्या क्या 'घुस' गया है ! क्यों ? क्योंकि हम एज्युकेटेड हैं , शिक्षित नहीं हैं. विद्याभ्यास की जगह किताबो को रटा है .
मूल बात पर आता हूँ :-
      सम्माननीय संसद है , सम्माननीय मंदिर या कोई भी पूजा स्थल होता है . ध्यान रहे , अगर मंदिर का पुजारी दुर्भाग्य से नीच स्वभाव हो , निश्चय ही दर्शनार्थी दुखी होंगे, अब क्या पुजारी के इस दुर्व्यवहार से मंदिर में विराजमान देव बदनाम हो जायेंगे ? कत्तई नहीं . यही तो दुर्भाग्य है कि संसद की जगह सांसद अपने आप को सम्माननीय समझने लग गए जबकि हैं ये पुजारी , जो अगर ढंग से देव - पूजा करेंगे तभी सम्मानित होंगे .
      मैं माननीय सांसदों को विनम्र भाव से ( क्योंकि ये लोकतंत्र के मंदिर 'संसद' के " जनता " द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि हैं - भले ही कुछ लोग आज भी जनता की आँख में धूल झोंक कर आ धमकते हैं ) प्रार्थना करना चाहता हूँ कि कृपया संभल कर बोलें , न्याय पूर्वक बोलें ,
         " ऐसी वाणी बोलिए , मन का आपा खोय : औरन को शीतल करे , आपहु शीतल होय :: "

      आप मत भूलिए कि भारतीय शिक्षित अवश्य हैं , भले ही एज्युकेटेड न हो , समझ का धनी है ,अंगूठे से धरती को खुरच कर खेती की भविष्यवाणी कर सकते है - आपके ही एक भाई ने गर्व से आपको ही सुनाई है . बहुत बेवकूफ बना लिया आपने , भारतीयता की दयालु प्रवृति ने अगर मुंह फेर लिया तो निश्चित रूप से समझ लें - पतली गली भी नसीब न होगी .   
    संसद कोई चुटकले सुनाने की , कटाक्ष करने की , ऊल जुलूल बकने की शेरगाह नहीं है वरन लोकतंत्र का मंदिर है , यह भी ध्यान रक्खें कि आपकी नादाँ हरकतों से यह मंदिर कत्तई बदनाम नहीं होगा , हाँ " भारतीयता " कान पकड़ कर आपको बाहर का रास्ता अवश्य दिखा देगी , जिसे आपने स्वयं का  " परमानेंट हाउस " समझ रखा है , मत भूलें कि " जनतंत्र " के संधिविच्छेद पर जो पहला शब्द है वही दूसरे शब्द को पालता है , आपको नहीं ! आप नहीं तो कोई और सही !!!
      एक ब्रह्मचारी की फटकार से कि १० - १२ पैदा करने वाला क्या जाने - ब्रह्मचर्य क्या होता है ! यह फटकार किसी व्यक्ति विशेष को नहीं बल्कि सभी "जन"प्रतिनिधियों के लिए सबक सामान है . दुपट्टा पहन कर आपके असल की नक़ल क्या उतारी - तिलमिला उठे ! भूल गए कि इस लोकतंत्र के परमानेंट मंदिर के आप टेम्परेरी पुजारी हैं ! याद रखें - संसद से आपकी गरीमा बढ़ती है : आप से तो गरीमा के चार चाँद या फिर कालिख लगती है . और कोई भी " भारतीय " कालिख तो लगाने नहीं देगा !!
      मैं देश के असली पहरुओं ( जनता ) से भी प्रार्थना करता हूँ  ( सीख देने का तो सवाल ही नहीं !) कि कृपया १०० % मतदान करके " मिनखों " ( विद्वानों के लिए यह शब्द राजस्थानी भाषा ने निर्मित किया है ) को इस पवित्र मंदिर का पुजारी बनाएं . यह हमारा आलसी पन ही है जिसने हमें आंदोलित होने को मज़बूर किया . अगर आज भी हम नहीं जागे तो फिर तैयार हो जाय - गुलामी की लम्बी निद्रा के लिए . और तो क्या कहूँ ,
मैं भी तो आपका ही एक हिस्सा हूँ ........
J K SOMANI.jpg

ASHOK DHINGRA

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Aug 28, 2011, 6:53:13 PM8/28/11
to bharatswab...@googlegroups.com, hindusth...@googlegroups.com, DR. HARISHCHANDRA SHAH, Dr. Jaideep Arya, Dr. Ved Pratap Vaidik, Dr. Ashutosh vajpeyee, Babulalji Totla Jaipur, S K Khemka
very much rightly said but to teach them lesson add with 100% vote for bottom most in the list in stead of  top most in future
means that out these all present, not a single should win
by this all new one will become MP / MLAs mostly all without any party, then all will be fine
NEW ONE WITH NEW BHARAT WITH NEW IDEAS

JAI HIND JAI BHARAT 

2011/8/28 Jugalkishore Somani <jugalkish...@yahoo.co.in>
--

Jugalkishore Somani

unread,
Aug 28, 2011, 11:55:06 PM8/28/11
to Reply to Comment, Bharat Trust, hindusth...@googlegroups.com
संसद में पहुँच कर अपने आप को " सब कुछ " समझने वाले सांसदों को यह बताने का प्रयास किया है कि वे इस मुगालते में न रहें कि जो मन में आया - कह ( बक )
दिया , संयम की भाषा तो बोलनी ही पड़ेगी , अनुशासन तो रखना ही पड़ेगा . संसद - विधानसभा या फिर कोई भी कार्यपालिका हो , एक बार " अन्दर " घुस ( हाँ , ये ही शब्द प्रोपर है ! ऐसो के लिए )  गए - फिर तो बादशाह से कम नहीं समझते हैं अपने आप को .

जुगल किशोर सोमाणी , जयपुर


From: Neelansh Gaur <fbmessage+z...@facebookmail.com>
To: आज़ाद हिंद फौज <1383253...@groups.facebook.com>
Sent: Monday, 29 August 2011 12:50 AM
Subject: Re: [आज़ाद हिंद फौज] हम हैं कौन से मुगालते में ?

what exactly u r trying to say sir..please can u explain me..
Neelansh Gaur 12:50am Aug 29
what exactly u r trying to say sir..please can u explain me..
Original Post
Jugal Kishore Somani
हम हैं कौन से मुगालते में ?
महिमा मंडन करवाना और महिमा युक्त होना : ये दोनों बातें बिलकुल अलग अलग हैं . आज के दैनिक वातावरण में नादानी , अपरिपक्वता , छिछोरापन , बड़बोलापन, अशिष्ट वाणी , असभ्य - मिलन का तरीका और " मैं तो बस मैं ही हूँ " .... न जाने क्या क्या 'घुस' गया है ! क्यों ? क्योंकि हम एज्युकेटेड हैं , शिक्षित नहीं हैं. विद्याभ्यास की जगह किताबो को रटा है .
मूल बात पर आता हूँ :-
सम्माननीय संसद है , सम्माननीय मंदिर या कोई भी पूजा स्थल होता है . ध्यान रहे , अगर मंदिर का पुजारी दुर्भाग्य से नीच स्वभाव हो , निश्चय ही दर्शनार्थी दुखी होंगे, अब क्या पुजारी के इस दुर्व्यवहार से मंदिर में विराजमान देव बदनाम हो जायेंगे ? कत्तई नहीं . यही तो दुर्भाग्य है कि संसद की जगह सांसद अपने आप को सम्माननीय समझने लग गए जबकि हैं ये पुजारी , जो अगर ढंग से देव - पूजा करेंगे तभी सम्मानित होंगे .
मैं माननीय सांसदों को विनम्र भाव से ( क्योंकि ये लोकतंत्र के मंदिर 'संसद' के " जनता " द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि हैं - भले ही कुछ लोग आज भी जनता की आँख में धूल झोंक कर आ धमकते हैं ) प्रार्थना करना चाहता हूँ कि कृपया संभल कर बोलें , न्याय पूर्वक बोलें , " ऐसी वाणी बोलिए , मन का आपा खोय : औरन को शीतल करे , आपहु शीतल होय :: " आप मत भूलिए कि भारतीय शिक्षित अवश्य हैं , भले ही एज्युकेटेड न हो , समझ का धनी है ,अंगूठे से धरती को खुरच कर खेती की भविष्यवाणी कर सकते है - आपके ही एक भाई ने गर्व से आपको ही सुनाई है . बहुत बेवकूफ बना लिया आपने , भारतीयता की दयालु प्रवृति ने अगर मुंह फेर लिया तो निश्चित रूप से समझ लें - पतली गली भी नसीब न होगी . संसद कोई चुटकले सुनाने की , कटाक्ष करने की , ऊल जुलूल बकने की शेरगाह नहीं है वरन लोकतंत्र का मंदिर है , यह भी ध्यान रक्खें कि आपकी नादाँ हरकतों से यह मंदिर कत्तई बदनाम नहीं होगा , हाँ " भारतीयता " कान पकड़ कर आपको बाहर का रास्ता अवश्य दिखा देगी , जिसे आपने स्वयं का " परमानेंट हाउस " समझ रखा है , मत भूलें कि " जनतंत्र " के संधिविच्छेद पर जो पहला शब्द है वही दूसरे शब्द को पालता है , आपको नहीं ! आप नहीं तो कोई और सही !!!
एक ब्रह्मचारी की फटकार से कि १० - १२ पैदा करने वाला क्या जाने - ब्रह्मचर्य क्या होता है ! यह फटकार किसी व्यक्ति विशेष को नहीं बल्कि सभी "जन"प्रतिनिधियों के लिए सबक सामान है . दुपट्टा पहन कर आपके असल की नक़ल क्या उतारी - तिलमिला उठे ! भूल गए कि इस लोकतंत्र के परमानेंट मंदिर के आप टेम्परेरी पुजारी हैं ! याद रखें - संसद से आपकी गरीमा बढ़ती है : आप से तो गरीमा के चार चाँद या फिर कालिख लगती है . और कोई भी " भारतीय " कालिख तो लगाने नहीं देगा !!
मैं देश के असली पहरुओं ( जनता ) से भी प्रार्थना करता हूँ ( सीख देने का तो सवाल ही नहीं !) कि कृपया १०० % मतदान करके " मिनखों " ( विद्वानों के लिए यह शब्द राजस्थानी भाषा ने निर्मित किया है ) को इस पवित्र मंदिर का पुजारी बनाएं . यह हमारा आलसी पन ही है जिसने हमें आंदोलित होने को मज़बूर किया . अगर आज भी हम नहीं जागे तो फिर तैयार हो जाय - गुलामी की लम्बी निद्रा के लिए . और तो क्या कहूँ , मैं भी तो आपका ही एक हिस्सा हूँ ........
जुगल किशोर सोमाणी , जयपुर

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budh pal singh Chandel

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Aug 29, 2011, 6:41:36 AM8/29/11
to hindusth...@googlegroups.com, bharatswab...@googlegroups.com, sambad <prabhari, ganesh...@acclimited.com, Anand Pathak ADVENTURE-puts life in focus, s.jain.c...@gmail.com, BST- Neelam Ahlawat, Tukaram Savdekar, BST- Shankar Dutt Fulara, Abhishek Singhal "Join the Saffron Brigade", BST- Vikki Hindustani, Prakriti (A call to return to the nature), pyptrakesh haridwar, delhi women -sunita gupta, mahabirparshad goel, Manzoor Khan Pathan, Vikas Kumar Gupta, Hindu Voice, BST- Yogesh Kumar Jain, BST- Vinita Singh, mrapsc, UNITE ALL FACEBOOK DESHBHAKT AGAINST CORRUPT SYSTEM OF BHARAT, Jugalkishore Somani, vaishn...@rediffmail.com
ॐ ,
भाई सोमानी जी,
बहुत अच्छा  लिखा,फिरभी क्या संसद में बर्तमान में  अधिकतेर  सांसदों द्वारा , उल-जलूल बोलना बंद ना करके अगर आम आदमी कुछ सच्चाई भरा कुछ ब्यंग  कर इनको कुछ बोल दे,तो ये जनता के तथाकथित नुमैन्दे ,आसमान शिर  पर उठा कर, हाजिरी संसद में लगवा कर उसे जलील कर मरियादाहीन बता कर जेल में भेजने का जुगाड़ करते है ,यानि अपने के लिए सब माफ़,और कोई आम आदमी सच्चाई बयान करे तो,बोह बुरी तरह जलील कर मर्यादाहीन साबित किया जाय ,अब तो दरसल इस पवित्र मंदिर को पवित्र  रहने के लिए ,भबिश्य में परिबर्तन होना जरुरी है ,नहीं तो आम जनता कि हालत बद्तेर से बद्तेर होती जाएगी,और हमारे मान नीयो को ,अपने सिवा दुसरे सब ऐसे ही लगेगे,
जनता सब समझ रही है,और समय आने पर बदलाव आएगा,और संसद पवित्र ही रहेगा |
हम सब ऐसी ही आशा करते है,,आगे एश्वेर मालिक|
वन्देमातरम,
जय हिंद|

2011/8/29 ASHOK DHINGRA <dhing...@gmail.com>

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rajiv singh

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Aug 30, 2011, 1:10:07 AM8/30/11
to bharatswab...@googlegroups.com
सोमानी जी आपने बहुत सही कहा 
अपनी मर्यादा का ख्याल इनको नहीं है
दुसरे को सिखाने की कोशिश कर रहे हैं
किरण बेदी ओम पूरी ने वही कहा जो आम जनता कहती है

राजीव रेनुसागर


2011/8/29 budh pal singh Chandel <bps1c...@gmail.com>



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JAI BHARAT

*Rajiv Kumar Singh*
*YOG TEACHER*
*RKS-5789*
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*SONEBHADRA*
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*05446-277548
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Jugalkishore Somani

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Aug 30, 2011, 4:06:16 AM8/30/11
to Bharat Trust, hindusth...@googlegroups.com
                  हमारी बिल्ली हमीं से म्याऊँ ! वाह भाई वाह !!
      घर में बच्चे जवानो से लड़ रहे थे , बोली इतनी हलकी कि क्या कहा जाय ! बड़े - बुजुर्ग ऐसी किच - किच सुनते - सुनते परेशान हो गए , बोलना भी नहीं चाहते थे , सोचा अपने आप बुद्धि का विकास हो जाएगा और हो जायेंगे अनुशासित !
     लेकिन घर में तो दिन ब दिन कलह बढ़ती ही जा रही थी . घर की डोर संभालने वाले भी तानाशाह तो बाकी सदस्य भी मुंह फट . आखिर बुजुर्गों के भी नाक का दम फूल गया , समझाने की बहुत चेष्टा की , मगर सुनने को तैयार ही नहीं ! उलटे चिल्लाने लगे कि आप होते कौन है हमारे  बीच बोलने वाले ? आप से ये नहीं देखा जाता तो चलें जाय वृद्धाश्रम में ! और अगर नहीं गए तो पुलिश में मामला दर्ज करा कर घर से निकलवा देंगें, भले ही पुलिश वालों को कुछ देना पड़ें मगर घर से बाहर तो निकलवा कर ही दम लेंगे .
      हाँ , तो मतलब यह है कि पुरखों की बनाई इज्जत को बिगाड़ते तो है ये बच्चे - जवान , और नाम लेते हैं बुजुर्गों का ! वही पुरानी बात - दूसरे बच्चे को पीट कर घर पहुँच कर पहले  रोता है फिर पिटे हुए बच्चे की शिकायत भी करता है !
      बुड्ढा क्या बोल गया - बिचारे का गला ही पकड़ लिया !! ये मत भूलो , इन बुड्ढो  के बिना तुम्हारा वजूद ही क्या था ? हमारी बिल्ली हमीं से म्याऊँ ! वाह भाई वाह !!
      अरे मेरे स्याणे - समझदारों ( मैं हमारे  प्रबुद्ध सांसदों की बात कर रहा हूँ जो अपने आप को "संसद" समझ बैठे हैं !) , जनता ( परिवार के बुजुर्ग , जिन्होंने आप को पाल पोश कर 'चुन कर' बड़ा किया है ) , क्या उनको बोलने का अधिकार भी नहीं ?  इस वहम में न रहें घर ( संसद ) से बाहर निकालने का अधिकार भी इसी जनता को ही है.
बड़े आये विशेषाधिकार लाने वाले !! खुद तो संसद / विधान सभा में जूते - चप्पल उछालते हो और दूसरे को बोलने का अधिकार भी नहीं ?
J K SOMANI.jpg

ASHOK DHINGRA

unread,
Aug 30, 2011, 4:40:42 PM8/30/11
to bharatswab...@googlegroups.com
dear all my countrymen specially poor n down droden
if our leaders like kiran bedi n om puri are convicted by parliamentarians who think of having supermacy being in parliament after being elected by us  then we all should join and show them our unity and pull them out of parliament by not voting along with all those who are parliamentarians today by voting only our own brothers n sisters  who never had been parliamentarians so far since 1947 or 1857 even so that they understand our right to elect them by voting, who only helped themselves and their near n dear ones but not bothered to see the plight of the peoples who elected them and given them this position being parliamentarians thinking them selves super power
one after another after our NETA JEE SUBASH CHANDER BOSE WAS DISAPPEARED BY LIKE THESE POLITICIANS SHOULD BE TAUGHT LESSON BY MAKING THEM DISAPPEAR ON THIS EARTH, WHICH CAN BE DONE BY NOT VOTING THEM ANY MORE
VOTE ONLY YOUR OWN STATUS PEOPLES SO THAT YOU MAY GET SOME STATUS AND RELIEFE
I AM SURE BY DOING SO WE ALL WILL BE MORE HAPPY AND WE WILL HAVE NO DIFFERENCE IN STATUS
NO ONE WILL BE POOR
ALL WILL BE EQUAL
HENCE NO DIFFERENCE IN STATUS
WHY WE SHOULD WE FEEL OURSELVES DOWN TRODEN

JAI HIND JAI BHARAT
2011/8/30 rajiv singh <raji...@gmail.com>
सोमानी जी आपने बहुत सही कहा 
अपनी मर्यादा का ख्याल इनको नहीं है
दुसरे को सिखाने की कोशिश कर रहे हैं
किरण बेदी ओम पूरी ने वही कहा जो आम जनता कहती है

राजीव रेनुसागर
2011/8/29 budh pal singh Chandel <bps1c...@gmail.com>
ॐ ,
allभाई सोमानी जी,

budh pal singh Chandel

unread,
Aug 31, 2011, 1:19:44 AM8/31/11
to hindusth...@googlegroups.com, bharatswab...@googlegroups.com, sambad <prabhari, ganesh...@acclimited.com, Anand Pathak ADVENTURE-puts life in focus, s.jain.c...@gmail.com, BST- Neelam Ahlawat, Tukaram Savdekar, Abhishek Singhal "Join the Saffron Brigade", BST- Shankar Dutt Fulara, delhi women -sunita gupta, pyptrakesh haridwar, Prakriti (A call to return to the nature), BST- Vikki Hindustani, Hindu Voice, mahabirparshad goel, BST- Vinita Singh, BST- Yogesh Kumar Jain, Jugalkishore Somani, Vikas Kumar Gupta, Manzoor Khan Pathan, vaishn...@rediffmail.com, mrapsc, UNITE ALL FACEBOOK DESHBHAKT AGAINST CORRUPT SYSTEM OF BHARAT, pys bhopal
ॐ ,
बह सोमानी जी ,
बहुत अच्छा लिखा ,मन  प्रफुल्लित हुआ,इस प्रकार लिखने से शायद कुछ लोगो के बिक्रत भेजे में आप कि सलाह पर्बेर्तन करने में सहायक हो ,जिस से भबिश्य में इस प्रकार कि गलती करने से बाज आये  ,और याद रख्खे कि सिर्फ पवित्र संसद में उने ही सिर्फ ब्यंग करना नहीं आता,हम janta भी भारत कि खुली हबा में बयान करना जानते है  ,उन के द्वारा  भबिश्य में संसदीय गरिमाएबम संबिधान कि दुहाई देकर जनता को  परेशान ना किया जाय,मेरी इन महान भारत के जन- प्रतिनिधियों से आज सुंदर/भव्य ईद पर्ब पर गुजारिश है , कि पहले अपने को सभाले ,फिर हम/जनता  तो उनके नौकर/सेवक,जैसा बोह आजकल treat कर रहे है,मानेगे ही जायेगे कहा ,रहना तो भारत में ही \धन्यबाद|
वन्देमातरम,
जय हिंद |
2011/8/30 Jugalkishore Somani <jugalkish...@yahoo.co.in>

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Sangeeta G

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Aug 31, 2011, 7:51:09 AM8/31/11
to bharatswab...@googlegroups.com
कृपया हिंदी मे लिखे संस्कृत तो खो दो अब हिन्दी को भी खोने की बारी है ? फिर क्या उर्दू मे पढ़ेंगे ? 

हम पाकिस्तानी नहीं जो उर्दू मे पढे लिखे  मुझे समझने मे समस्या होती है " (मुगालते )"

2011/8/28 Jugalkishore Somani <jugalkish...@yahoo.co.in>
--

debakanta sandha

unread,
Sep 2, 2011, 2:51:55 AM9/2/11
to bharatswab...@googlegroups.com
जुगल किशोर जी,
आप की लेख पढ़ा, अच्छा लगा.
कृपया उर्धू के बजाय हिंदी सव्दों की व्यबहार करें.

हम सभी वही पीड़ा में पीड़ित हें जिस पीड़ा से आप गुजर रहे हें.
आप की उदहारण आच्छी  हें.
क्या आप यह बताएँगे की जिस सांसदों को आप पुजारी बोल रहे हें क्या वें पुजारी बोलनी की लायक भी हें.
मेरा उत्तर हें नहीं.
वल्कि में संदर्भ को थोडा दुसरे तरीके से बोलना चाहूँगा.
सोचिये की हमारा एक बड़ा सा खान हें.
जिस खान से पैसा उपजाव वाली कई चीजे निकलते हें.
कभी कोयला,कभी पेट्रोलियम, कभी लोहा, कभी अलुमिनियम, कभी सोना, कभी चाँदी और कभी ताम्बे और ना जाने कितना कुछ उस में से निकलते हें.
हम ने कुछ जग्वारें उस खान की सुरक्ष्या के लिए तैनात किया.
क्या आप को यह लगता हें की वें जग्वारें क्या इतना मुर्ख हें जो चंद रुपये की तन्खाओं के लिए उस करोड़ों की रुपये देने वाली खान की देख रेख करेंगे?
भाई इतने मुर्ख तो कोई भी नहीं हें.और वो भी इस ज़माने में.
गलती हमारी सिस्टम में हें.
हम को चाहिए एक स्वस्थ,स्वच्छ,मज्भूत व्यबस्था.
व्यबस्था परिवर्तन ही बना सकता हें हमारी  सपनों का भावी समाज.

हमारी समाज में अछे और बुरे दोनों ही तरीके की लोग बसते हें.
और दुःख की बात यह हें की आछे लोग या तो कमजोर रहते हें या फिर बिकने के लिए टायर रहते हें.
कुछ स्वामी रामदेव जैसा लड़ाकू और समाज कल्याण कारी लोग भी रहते हें तो कुछ अरविन्द केजरीवाल जैसे बेवोखूब लोग भी रहते ते हें.
यह अरविन्द केजरीवाल को तो में वेवोखूब ही कहूँगा क्यों की वो कब इस्तेमाल हो गया उस को पता ही नहीं चला.
उस वन्दे का सारा देसत्मभाव की ब्यवहार इतना शातिर तरीके से किया गया की वो बेचारा ना रो प् रहा हें ना बिलख पा रहा हें.
अन्ना हजारे जैसा बेचारा तो सायद ही कोई होगा जो चालक लोगों की मुखौटा बन गया.
इन सब बेचारों की लढाई में काले धन की लढाई को तो जैसे धुल चढ़ गया.

अब करें तो क्या करें?
बुरे लोग आछे लोगों को इस्तेमाल किसी भी स्टार में कर रहें हें.
कई जगह आछे लोग बुरे लोगों के हाथ बीके हुए रहते हें या फिर दबे हुए रहते हें.
इस हालत में मतदान कहाँ तक हितकारी साबित होगा.
यह व्यवस्था ही गलत हें.जोर जिस का मूलक उसीका ही होता आया हें.
हमें एक ऐसी व्यबस्था की सोचनी चाहिए जो तोड़े ना टूटे.
जिस में चोर,उचके जल्द ही पकडे जाएँ.

भाई,
नीति शास्त्र अगर यह बताती हें की अतिथि देवो भव तोह यह भी तो सिखाती हें की अज्ञात कुल शिलाश्य वसो ना देयः.
हम को सोच समझा के काम करना चाहिए.
हमे ऐसा नेता चाहिए जो स्वर्गीय राजीव दिक्सित जी, स्वामी रामदेव, सुब्रमण्यम स्वामी जैसा हो.
और वैसे नताएँ और भी होंगे हम सब में. हम उन लोगों की चयन करनी  चाहिए और योजनाओं के साथ बढ़ते रहना चाहिए.

जय हिंद
देवकांत.

Jugalkishore Somani

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Sep 6, 2011, 2:44:28 AM9/6/11
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                                          थोड़ा परिपक्व हुआ हमारा लोकतंत्र
     हम लोकतंत्र में जी जरूर रहे हैं परन्तु है यह तानाशाहों का लोकतंत्र . आज भी वोटों की राजनीति धन , घौंस , धमकी के साथ ही मतदाता का उदास भाव , 'हमें क्या पड़ी है' जैसी भावना  और सबसे ज्यादा 'भेड़ - चाल' से ग्रसित है .
     समय बदल रहा है . लोकनायक जयप्रकाश नारायण के बाद पुनः ( जागरण के दौर की ) एक लम्बी चुप्पी रही . नतीजन तानाशाही प्रजातंत्र जनता पर नशे की तरह छाता गया , दुर्भाग्य से लोकनायक के ही कुछ तथाकथित अनुयायी उस देव पुरुष के नाम का सहारा लेकर उसी को कलुषित करते गए . चूंकि जे पी का आन्दोलन और लोकप्रियता ( क्षमा सहित ) बेहद अल्प काल की थी , अतएव लम्बे संघर्ष के पुरोधा महात्मा गांधी के नाम से हमारे तानाशाह प्रजातांत्रिक नेताओं ने पुनः दुकाने खोल कर अपना व्यापार जमा लिया , और फिर तो देश में 'गान्धिओं' पूरी की पूरी जमात ने ही मानो जन्म ले लिया .
     इन लोगों का व्यापार ऐसा चला कि प्रायः विश्व की सभी छोटी - बड़ी बैंकें धनाड्य होती गयी , जाहिर है कि जब एक के पास 'आता' है तो निश्चय ही दूसरे से 'जाता' है . दानी तो हम हैं ही पर दान इतना चला गया कि हमें हमारा 'भान' ही नहीं रहा . विकल मन से त्राहि त्राहि करने की स्थिति हो गयी हमारी .
      ऐसी विकट परिस्थितियों में परमात्मा ने एक " जोध - जवान " संत को उतारा - माँ भारती के दर्द की मलहम बना कर . हाँ मैं स्वामी रामदेव की ही बात कर रहा हूँ . कोई अतिशयोक्ति नहीं है , हाँ , कुछ लोगों को ऐसा भान हो भी सकता है . एक बात लिखता हूँ ( मैं इस बात का लेखक नहीं हूँ बल्कि महापुरुषों की कही को ही यहाँ परोष रहा हूँ :
     कोई व्यक्ति अगर किसी सार्वजनिक कार्य का प्रारम्भ करता है तो पहले उसकी हंसी उड़ाई जाती है , फिर भी उस व्यक्ति के लगे रहने पर उसका विरोध शुरू होता है परन्तु फिर भी अगर लगा रहे तो लोग समर्पित हो जाते हैं
     अब आप स्वयं आत्म निरिक्षण करें कि उपरोक्त बात में कितनी सत्यता है .
     स्वामी रामदेव ने महाराष्ट्रीय भीषण भ्रष्टाचारों के विरोधी महान लोह पुरुष माननीय अन्ना हजारे को आदर सहित गत फरवरी में दिल्ली के मंच से अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के मार्ग का रहनुमा बनाकर एक मज़बूत राह का मार्ग प्रशस्त किया . हाँ , परिपक्व अन्ना ने समय समय पर प्यार भरी डांट से स्वामी रामदेव सहित सभी को पदच्युत भी होने से रोका . रामदेव ने सहर्ष गुरुभाव से आदर को प्रदर्शित करके अपने 'स्वामित्व' के गुणों का अनेकों बार परिचय भी दिया .
     इन दोनों मनीषीयों ने प्रजातंत्र को परिपक्वता का विशाल लबादा प्रदान करने में पुरजोर यत्न - प्रयत्न किया है . आज भारत का प्रायः प्रत्येक जागरुक नागरिक इन तानाशाही प्रजातांत्रिक ढोंगियों को समझने लगा है , समय के इंतज़ार के उपरांत इस बात का उत्तर भी विश्व के मानस - पटल पर उभरेगा , इसमें  कत्तई  संदेह  नहीं  करना  चाहिए .मजे की बात है कि " अपने में ही मस्त " रहने वाली  युवा पीढ़ी भी जागृत अवस्था में आ गयी है . शुभ संकेत है " स्वस्थ और परिपक्व लोकतांत्रिक गणतंत्र का "
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Jugalkishore Somani

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Oct 20, 2011, 4:35:01 AM10/20/11
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                                                खरबूजा - चाक़ू : चाक़ू - खरबूजा
आज देश करवट ले रहा है , नई सोच का वक्त चल रहा है , चिंतन - मनन , विचार - विमर्श न जाने और भी क्या क्या हो रहा है ! " क्या - क्या " से मतलब जानने से पहले यह समझना अत्यावश्यक है :
इतिहास गवाह है - जब भी बड़े अत्याचार का खात्मा हुआ है , 'बड़े' ने अपने स्वयं के अंत से पहले 'मातहतों' का अंत कराया है . रावण , कंस , कौरव .... किसी भी वंश के इतिहास को पढ़ लें - लगभग एक सी कहानी नज़र आयेगी .
पुनः लेख की पहली पंक्ति पर आता हूँ ....... वर्तमान भी ऊहापोह मचा रहा है . वर्तमान " वंश " के कई 'मातहत' भी हवाहवाई हो रहे हैं , हाँ मातहतों की फेहरिस्त बड़ी लम्बी है .( रावण के कुल जमा २ भाई और थे उन में से भी एक शरणागत हो गया , परन्तु दुर्योधन के ९९ भाई और थे ,इनमेंसे भी एक ही शरणागत हुआ था )   
वर्तमान वंश या यूं कहें " कुनबा " बहुत बहुत बहुत ...... लम्बा है ..... समय तो लगेगा ही ! चिल - पौं भी कुछ ज्यादा भी होगी , होनी भी चाहिए - कुनबा जो बड़ा है !
हाँ , इनकी ताक झाँक से क्षणिक परेशानियां भी आयेगी , हंसी भी आयेगी , गुस्सा भी आयेगा , रोना ...... सब कुछ होगा . लेकिन याद रक्खें : रात अंधेरी बाद चांदनी आती है ; धूप निकलते देख नींद उड़ जाती है . ध्यान रक्खें : वर्तमान कुनबे में से कोई " शरणागत " न आ जाय !!!
अभी कई " हिसार " पार करने हैं , कई हरियाणा - बिहार - आंध्र - महाराष्ट्र  फतह करने हैं . देखिये फतह तो करने ही पड़ेंगे क्योंकि साफ़ नज़र आ रहा है कि वर्तमान कहीं भी सुधरता नहीं दिख रहा . जब बिगाड़ आता है तो सागर के हिलोरे की तरह सब तरफ एकमेक ही हो जाता है , अब इसमे मीडिया हो या आम जन - हिलोरे तो एक जैसे ही लगते हैं ! भ्रमित करना ही तो एकमात्र लक्ष्य है !! भ्रम जाल से निकालना भी " वर्तामान "  का ही तो काम है !!!!!!
हाँ , शीर्षक की बात : चाकू के अवतार में तो हमेशा हमेशा " जनता " ही अवतरित होगी और खरबूजा रूपी रावण का ही अंत होगा .
वैसे कुनबे का सपरिवार जाना न केवल श्रेयकर है बल्कि भविष्य के लिए हितकर भी है . और ठीक उसी तरह जा भी रहा है .......  
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Jugalkishore Somani

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Oct 21, 2011, 12:41:13 AM10/21/11
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                                           चल उड़ जा रे पंछी ......
   चला  गया कर्नल गद्दाफी ! जाना तो था ही , परन्तु दुर्गति की मौत मरा , मृत्यु को  " महोत्सव " नहीं बना सका . बनाता भी कैसे ? कर्म ही ऐसे किये !
   ध्यान देने की बात तो ( दुर्भाग्य पूर्वक ) यह है कि हमारे देश में भी कई , बल्कि अनेकों  " गद्दाफी " हैं  - क्या होगा इन गद्दाफियों का ? सीधी सी बात है - अरबों खरबों खाकर बैठे हैं - गति तो इनकी भी इसके आस पास के ही होगी ! हाँ , ये हमारे " गद्दाफी " लीबिया के उस मरहूम गद्दाफी से 2G / 3G  आदि साधनों से संपर्क साध कर पूछ तो लें कि कितना - क्या ले गया अपने साथ ? ताकि ये गद्दाफी भी हवाला के मार्फ़त ........
   कितनी दु:खद स्थिति है कि हमारे आध्यात्मिक कहे जाने वाले देश में देशी लोग भी कूप मंडूक हो गए हैं , विदेशियों की बात ही क्यों करें ! मैं समझता ( वैसे यह शब्द प्रत्येक राजनीतिज्ञ अपने कथनों में करता है - मुझे नहीं करना चाहिए - फिर भी करना पड़ रहा है  ) हूँ कि अन्दर की अन्दर सब समझते हैं कि अंत में साथ कुछ भी नहीं जाने वाला है , बंध मुट्ठी से जन्म लेने वाला खुली मुट्ठी से ही जाएगा , लेकिन फिर भी न जाने क्यों भ्रष्टाचार और काले धन को पनपाने की  यह आंधी चल कैसे पड़ी है !
   सही बात तो यह है कि हमारे तथाकथित धार्मिक / आध्यात्मिक गुरुओं ने तो अपनी अपनी दुकाने खोल रखी है , किसी को नहीं पड़ी है कि अगर इस देश में आध्यात्म ही नहीं रहेगा तो हम कहाँ रहेंगे ?
  
आज कुछ देश भक्त आगे आ रहे हैं तो सब के सब ( राज नेता , मीडिया , प्रशासन और हम स्वयं ) इनकी बखिया उधेड़ने की हौड़ में लग गए हैं .
मेरे देश वासियों , अब जागने का वक्त आ गया है - मैं चेतावनी देना चाहता हूँ कि यदि अब भी सोये रहे को हमारे ये गद्दाफी ऐसी लूट मचा देंगे कि .........
आगाह करना मेरा कर्तव्य ........ मैं तो भारत माता की ही जय बोलूँगा , कोई तो साथ देगा ही !!!
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Jugalkishore Somani

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Oct 24, 2011, 6:50:31 AM10/24/11
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                           " मीडिया " विश्वविद्यालय : सर्वोच्च संस्थान
जानबूझ कर अनजान बनने की यदि शिक्षा लेनी हो तो वर्तमान  में " मीडिया " विश्वविद्यालय कमसे कम भारत में तो सर्वोच्च संस्थान है . इस संस्थान ने जिस तीव्र गति से बुद्धिमान को बेवक़ूफ़ बनाने का जो जोश खरोश दिखाया है - सचमुच काबिले - तारीफ है .हाँ , " मीडिया " का प्रत्येक विभाग ( प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक ) एक साथ तरक्की कर रहा है - ऐसा कम ही देखने को मिलता है .
अब देखिये - भारत की कर्णधार श्रीमती सोनिया गांधी सेवा भाव में इतनी तल्लीन हो गयी कि उनको अपने स्वास्थ्य का ज़रा भी ध्यान नहीं रहा , बीमारी इतनी बढ़ गयी कि तुरत - फुरत अमेरिका जाकर भर्ती होना पड़ा , लम्बे समय तक इलाज कराना पड़ा . और इधर हमारा मीडिया विभाग ! पड़ी ही नहीं है कि ऐसी कर्णधार को सांत्वना के दो शब्द भी पेश करें !! अब कैसी है ,क्या बीमारी हुई , क्या इलाज करवाया ......... कुछ भी पूछने की आवश्यकता हमारे इस विभाग को महसूस ही नहीं हुई !!!
और तो और हमारे इस देश के अन्य राजनैतिक भाइयों का दिल भी ऐसा कठोर कि " अब आप कैसी हैं " तक पूछने नहीं गए !!!! अरे भाई जाते तो कमसे कम " क्या इलाज करवाया " यह तो पूछ लेते ताकि भविष्य में आप भी इस बीमारी के होने से ( पूछे गए इस सवाल से कि क्या इलाज करवाया ) आप भी लाभान्वित हो सकते ??? 
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Jugalkishore Somani

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Dec 19, 2011, 5:46:53 AM12/19/11
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                                                           " राजिया रा दूहा "

सीकर ( राजस्थान ) में एक बहुत ही गहरी सोच के राजस्थानी कवि हुए हैं , जिन्होंने अपने प्रिय सेवक " राजिया " को इंगित कर कवित्व का एक इतिहास बना दिया , इन कवि श्रेष्ठ का नाम था : स्व. किरपा राम जी खिडिया . इनके रचित राजस्थानी दोहे गूढ़ अर्थ वाले हैं , पुस्तक का नाम है " राजिया रा दूहा " ....प्रस्तुत हैं कुछ वानगी ..
१) अरबां - खरबां आथ सुदतारां विलसै सदा ; सूमां चालै न साथ राई जितरी , राजिया...
अर्थ : दानी तो अरबों - खरबों की संपत्ति का दान करके अपने कुल का नाम अमर करा देता है , परन्तु कंजूस ( आज के सन्दर्भ में काले धन के लोभी ) एक राई के दाने के बराबर भी साथ लेकर नहीं जाएगा ( मरेगा )
२) अ - दतारां घर आय जे करोडां संपत जुड़े ; मोज देण मन माँय रत्ती न आवै , राजिया ....
अर्थ : जो कंजूस होते हैं उनके पास करोड़ों की संपत्ति होने पर भी किसी काम की नहीं (आज के सन्दर्भ में विदेशों में जमा हमारा काला धन )
३) अहला जाय उपाय आछोदी करनी अवर ; दुष्ट किणी ही दे राजी हुवे न , राजिया ....
अर्थ : दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति किसी भी प्रकार राजी नहीं होता है , भले ही उनका कितना ही उपकार करो ( आज के सन्दर्भ में .... आप समझ गए न ! )
४) आछोड़ा ढिग आय आछोड़ा भेला हुवे ; ज्यूं सागर में जाय रले नदी जल , राजिया....
अर्थ : भले व्यक्ति से भला व्यक्ति मिल ही जाता है जैसे समुद्र से नदी का मिलन ( आज के सन्दर्भ में ... देशभक्तों का जमावड़ा हो रहा है ! सावधान !! )
५) आछो मान अभाव मतहीणा कोई मिनख ; पुटिया के ज्यूं पाव राखे ऊपर , राजिया....
अर्थ : कम अक्ल का व्यक्ति थोड़े से ( झूठे ) सम्मान से फूल जाता है , जैसे पुटिया नाम का पक्षी जब खुश होता है तो अपने पंजे ऊपर कर खुशी मनाता है ( आज के सन्दर्भ में क्या कहा जाय , चारों तरफ ये ही पक्षी नज़र आ रहे हैं )
क्रमशः
प्रस्तोता
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Jugalkishore Somani

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Dec 20, 2011, 3:02:28 AM12/20/11
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  राजिया रा दुहा ........प्रसिद्ध राजस्थानी कवि स्व. किरपा रामजी खिडिया की रचना ....
गतांक से आगे .....
१) इण ही सूं अवदात कहणी सोच विचार कर ; बे - मोसर री बात रूड़ी लगे न , राजिया ........
अर्थ : हमेशा " बात " उसी समय कहनी चाहिए जब उसका वजन पड़े , असमय कही बेतुकी बात का कोई महत्व नहीं होता ...( आज के सन्दर्भ में : राजनीतिज्ञों में उल - जुलूल बातें करने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है ... सीख लें )
२) उण ही ठाम अरोग भांजण री मन में भणे ; आ तो बात अजोग राम न भावै , राजिया ....
अर्थ : जिस बर्तन में खाए उसी को तोड़ने की बात मन में आये - ऐसी अयोग्य बात तो भगवान ( राम ) को भी स्वीकार नहीं .... ( आज के सन्दर्भ में : वर्तमान में यही तो हो रहा है !)
३) उपजावै अनुराग कोयल मन हरखित करै ; कड़वो लागै काग रसना रा गुण , राजिया .......
अर्थ : कोयल का कुहुकना सब का मन मोह लेता है और कौवे की काँव - काँव किसी को नहीं सुहाती जबकि देखने में दोनों एक जैसे ही होते हैं .... ( आज के सन्दर्भ में : बकवास का दौर सभ्रांत जनता को कैसे सुहाएगा ? विचार करें )
४) ऊंचै गिरवर आग जलती सौ देखे जगत ; पण जलती निजपाग रत्ती न सूझै , राजिया ....
अर्थ : ऊंचे पहाड़ पर लगी आग सबको दिखती है परन्तु अपनी स्वयं के पगड़ी में लगी आग दिखाई नहीं देती .....( आज के सन्दर्भ में : एक - दूसरे पर कीचड़ उछालने में लगे हैं - आज के राजनीतिज्ञ जबकि स्वयं पर लगा कीचड़ दीखता ही नहीं है !) 
५) ओगणगारा और दुखदायी सारी दुनिया ; चोदु चाकर चोर रांधे छाती , राजिया ....
अर्थ : बिना गुण वाले भीरु सेवक , चोर आदि पूरी दुनिया में अहित ही करने वाले होते हैं .... ( आज के सन्दर्भ में : बिना गुण के कोई भी नीति सफल नहीं हो सकती , राजनीति भी नहीं .)
क्रमशः ....
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Jugalkishore Somani

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Dec 21, 2011, 5:02:44 AM12/21/11
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राजिया रा दुहा ........प्रसिद्ध राजस्थानी कवि स्व. किरपा रामजी खिडिया की रचना ....
गतांक से आगे .....
१) औरूं अकल उपाय कर आछो ,भूंडो न कर ; जग सौ चाल्यो  जाय , रेला ज्यूं राजिया .....
अर्थ : हमेशा भला करने की ही नीयत होनी चाहिए , बुरा करने की बात मन में आनी ही नहीं चाहिए . ध्यान  रहे - यह संसार नदी की भान्ति बहता जा रहा है , फिर बुराई क्यों ? क्या फ़ायदा मिलेगा ? ( आज के सन्दर्भ में : पूरे जगत में बेतहाशा बुराई दोड़ रही है बल्कि हम बुराई को ही जीवन का अंग समझ बैठे हैं , विशेष कर हमारा राजनीतिज्ञों का वर्ग - सुधारों भाई अपने आप को ! )
२) कठण पड़ जद काम हाम पकड़ गाढो रहै ; तो अलवत ही ताम राम भली हुवे, राजिया .......
अर्थ : कठिन से कठिन समय में भी जो व्यक्ति धैर्य नहीं खोता है , भगवान भी उसकी सहायता करता है . ( आज के सन्दर्भ में : वर्तमान में जो जो देशभक्त माँ भारती की सेवा में अलपक लगे हैं , भयंकर बाधाओं के बावजूद भी , अवश्य ही भगवान भी ऐसे महापुरुषों की सहायता कर रहा है - धैर्य खोने की कोई आवश्यकता नहीं है )
३) कठण मुगता धन कोष भरियो , पण प्रापत बिना ; दीजै कान्सू दोष रयणावर नै , राजिया .......
अर्थ : समुद्र में अथाह मोती - माणक ( अर्थात : धन ) भरा पड़ा है , पर जब कोई निकालने को तैयार ही नहीं तो भला समंदर का क्या दोष ? ( आज के सन्दर्भ में : माँ भारती की इस पवित्र धरा पर अनेक पुरोधा देशभक्त भरे पड़े हैं परन्तु जब कोई इनका सदुपयोग ही नहीं करना चाहता तो भला इसमें भारत माता का क्या दोष ? हमें ही तो सुधरना पड़ेगा न ! )
४) कनवज - दिलीस काज वै सांवत पख  रैत वै ; रुलग्या देख्या राज रवताण्या वस , राजिया .....
अर्थ : कन्नौज और दिल्ली - दोनों के ही शासक ( जयचंद और पृथ्वीराज ) बड़े बलवान थे , उनकी सेना भी बलशाली थी , प्रजा भी देशभक्त थी परन्तु आपसी बैर - विरोध ने दोनों को तबाह कर दिया . ( आज के सन्दर्भ में : क्या आज हमारा देश भी बैर - विरोध की मूर्ख नीतियों के चलते पुनः गुलामी की ओर तो नहीं बढ़ रहा है ? अत्यंत सावधानी और बुद्धिमानी से हमें भविष्य का चिंतन करना चाहिए )
५) करै न शंका कोय गाँव धणी संभड गिनै ; रेत बराबर होय रोलदट में , राजिया ......
अर्थ : नाराजगी होने से गाँव के सरपंच ( या ) देश के प्रधान तक को कोई नहीं गिनता है और न ही कोई उनसे डरता है - ऐसा सरदार भी साधारण जनता की तरह हो जाता है . ( आज के सन्दर्भ में : कहीं हम भी तो इसी दिशा में नहीं बढ़ रहे हैं ? कृपया " पहले देश फिर परदेश " इस पर गंभीरता से सोचे - हमारा धन हमारे पास आना ही चाहिए , ऐसा प्रयास सच्चे मन से करें या वर्तमान देशभक्तों की राह का अनुशरण करें - तभी भला हो सकेगा )
कृपया अगले अंक की प्रतीक्षा करें ........

प्रस्तोता :

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Jugalkishore Somani

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Dec 22, 2011, 3:49:37 AM12/22/11
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राजिया रा दुहा ........प्रसिद्ध राजस्थानी कवि स्व. किरपा रामजी खिडिया की रचना ....
गतांक से आगे .....
१) कहणी जाय निकाम आछोड़ी आणी उकत ; दामां लोभी दाम रंजे न बातां , राजिया ......
अर्थ : जो दमड़ी का लोभी होता है , उसे अन्य किसी बात में रस नहीं आता है , कितना ही समझाओ - सब व्यर्थ जाता है , बस सिर्फ दाम ही दाम .... ( आज के सन्दर्भ में : जिन लोगों के मुंह काली कमाई का चस्का लग गया है उन्हें तो बस पैसे बनाने में ही 'आनंद' आता है - चाहे जितना समझा दो ... कड़े क़ानून का चाबुक ही ऐसे लोगों का इलाज है . )
२) काज सरै न कोय बल प्राक्रम हिम्मत बिना ; हळ कार्यां के होय रंग्या स्याळ , राजिया .......
अर्थ :  रंगे हुए सियार से किसी तरह की उम्मीद करना व्यर्थ है . बल , पराक्रम और हिम्मत के बिना किसी भी कार्य में सफलता नहीं मिल सकती . ( आज के सन्दर्भ में : वर्तमान राजनीति परिपेक्ष्य तो अत्यंत निश्तेज , धुमिल , गवारा हो चुका है . देशभक्तों के जोश से ही पुनः इस क्षेत्र में रक्त संचार हो सकता है - इतिहास उठा कर पढ़ लें )
३) कारण कटक न कीध सखरा चाहिजै सुपह ; लंक विकट गढ़ लीध रींछ वानरा , राजिया .....
अर्थ : सेनापति बुद्धिमान हो तो थोड़ी सी सेना से भी युद्ध जीता जा सकता है . प्रभु राम ने अपनी अक्ल से ही तो वानरों की सेना से रावण जैसे पराक्रमी को परास्त किया था . ( आज के सन्दर्भ में : नेतृत्व सक्षम हो तो सफलता चरण क्यों नहीं पखारेगी ? आज सबल नेतृत्व की ही तो जरुरत है ! )  
४) काली भोत करूप कसतूरी काँटा तुले ; सक्कर घणी सरूप रोड़ा तुले , राजिया ......
अर्थ : कस्तुरी देखने में बेकार सी वस्तु लगती है , परन्तु कम उपलब्धी और अपने गुणों के कारण मिली ग्रामों में वजन होती है जबकि शक्कर ( चीनी ) देखने में बड़ी सुन्दर होते हुए भी क्विंटलों में तुलती है क्योंकि उसका गुण सिर्फ ऊपरी ही होता है . ( आज के सन्दर्भ में : आलोचना तो प्रत्येक अच्छे कार्य की ही होती है क्योंकि अनुशासन को मानने के लिए संयम की अति आवश्यकता होती है - जिसकी आज अत्यंत जरुरत है . )
५) कीन्धोड़ो उपगार नर क्रतघण माने नहीं ; लानत दे ज्यां लार रणजी ऊडावो , राजिया .....
अर्थ : कृतघ्न मनुष्य किसी का उपकार मानता ही नहीं है , ऐसे मनुष्य की अवहेलना करनी चाहिए , लानत  भेजनी चाहिए - यही नीति है . ( आज के सन्दर्भ में : वर्तमान में मानो कृतघ्नता का तूफ़ान चल रहा है ,ऐसी स्थिति में नेकदिल , देशभक्त , परोपकारी महानुभाओं को माँ भारती की सेवा में अपने आप को झोंक देना चाहिए .)

शेष अगले अंक में.....

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Dec 24, 2011, 10:04:14 AM12/24/11
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भाग ६ ....राजिया रा दुहा ........प्रसिद्ध राजस्थानी कवि स्व. किरपा रामजी खिडिया की रचना ....
गतांक से आगे .....
१) कुटळ निपट नाकार नीच कपट छोड़े नहीं ; उत्तम करै उपगार रूठा तूठा , राजिया .....
अर्थ : जो व्यक्ति बिलकुल ही नाकारा यानि सोच का हल्का होता है उससे कभी भी कपट के अलावा कोई और उम्मीद नहीं रखनी चाहिए जबकि भद्र व्यक्ति भले ही किसी कारण बस रूठ  जाय , परन्तु फिर भी उनके के द्वारा होगा उपकार ही ( आज के सन्दर्भ में : वर्तमान भारतीय पटल पर दीखने में तो कपटी ही ज्यादा दिखते हैं परन्तु वास्तविकता में उपकारी महानुभावों की कोई कमी नहीं है - हाँ ऐसे लोगों को ये दुष्ट प्रवृति वाले सताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं , लेकिन फिर भी घबराने की कोई बात नहीं - ये लोग , जब भी मौका आयेगा , करेंगे भला ही )
२) कूड़ाकूड़ प्रकास अणदीठी मेलै इसी ; उड़ती रहे अकास रंजी न लागै , राजिया .....
अर्थ : कुछ लोग इतनी हवाई बातें करते हैं कि वास्तव में उनकी बातें हवा में ही रह जाती है , जमीन की माटी को भी नहीं छु सकती है ( आज के सन्दर्भ में : क्या ऐसा नहीं लग रहा है कि आज अधिकाँश राजनीतिज्ञ वर्तमान में हवाई पुल ज्यादा ही बनाते हैं ? सनद रहे : कोई फ़ायदा नहीं मिलने वाला है ऐसे बड़बोलों को ! )
३) केइक नर बेकार वड करता कहता वले ; राखै नहीं लगार राम तणो डर , राजिया .....
अर्थ : कई लोग ऐसे निकम्मे होते हैं , जो सिर्फ अपनी झूठी बड़ाई के कसीदे पढ़ते रहते हैं . इन्हें परमात्मा का भी डर नहीं लगता . ( आज के सन्दर्भ में : वर्तमान में सिर्फ और सिर्फ ' अपने मियाँ मिट्ठू ' का दौर चल रहा है , अगर कोई सच बोलने का साहस भी करता है तो मक्कार लोग न जाने क्या क्या आरोप जड़ डालते हैं , कितनी बेतुकी बातों का पहाड़ खडा कर देते हैं , कैसी कैसी " जांचों " के चक्कर में फंसा डालते हैं - ये मियाँ मिट्ठू ! )
४) खळ - गुळ अण कुंतान्ह एक भाव कर आदरै ; ते नगरी हुन्तांह रोही आछी , राजिया .....
अर्थ : जिस जगह " गुड़ और खळ " की पहचान ही नहीं , इसकी वनिस्पत  ऐसी जगह तो वीरान ही भली . ( आज के सन्दर्भ में : कैसी विडम्बना है कि आज बुरे - भले सभी को एक जैसे ही हांका जा रहा है , दुर्भाग्य है कि भले लोग भी चुपचाप बुरे लोगों के मातहत " कोल्हू के बैल " की तरह काम किये जा रहे हैं ... इससे अच्छा तो यह होता कि माँ हमें पैदा ही नहीं करती ! स्वामी विवेकानंदजी ने कहा था कि " उठो , जागो और कर्तव्य पालन की राह पकड़ लो " )
५) खळ धूकळ खर खाय हाथळ बळ मोताहलां ; जो नाहर मर जाय रज - त्रण भखै न , राजिया .....
अर्थ : गधा तो घास -फूस - कचरा  कुछ भी खा कर पेट भर लेता हैं परन्तु शेर तो अपने पंजों के बल से हाथी के मस्तक को चीर कर गज - मोती से ही अपना पेट भरता है . शेर को मरना मंजूर है पर घास - फूस खाकर जीवित रहना मंजूर नहीं . ( आज के सन्दर्भ में : आज तो सिर्फ 'खाने' का मार्ग ही सबको दीखता है , कोई भी अपने स्वाभिमान की रोटी से संतुष्ट नहीं होता दीख रहा है ! और जो स्वाभिमानी हैं उनको ' ये ' नोच डालने को तैयार बैठें हैं , परन्तु ध्यान रहे - जीने वाले तो जीने की राह ढूढ़ ही लेते हैं )

अगले अंक में जारी .........
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Jugalkishore Somani

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Dec 26, 2011, 11:07:50 AM12/26/11
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भाग ७ ....राजिया रा दुहा ........प्रसिद्ध राजस्थानी कवि स्व. किरपा रामजी खिडिया की रचना ....
गतांक से आगे .....
१) खीच मुफत रो खाय , करड़ावण डून्कर घणी ; लपर घणो परे रांड , उचकसी राजिया ......
अर्थ : जो लोग मुफ्त की रोटी खाने के आदी होकर भी बिना मतलब का अहंकार दिखाते हैं , कुछ न कुछ बोलते - बकते रहते हैं ... कवि कहते हैं कि ऐसे लोगों का अंत बुरा होता है ( कवि ने यहाँ 'रांड' शब्द के प्रयोग से ऐसे लोगों की अधोगति में जाने को इंगित किया है )
 ( आज के सन्दर्भ में : सही मायने में देखा जाय तो वर्तमान विलासी नीतियों के चलते विश्व में आवश्यकताएं इतनी अधिक बढ़ गयी है कि पसीने की कमाई से सीमित साधनों की उपलब्धता से संतुष्ट न होकर " पतली गली से कमाने की कुचेष्टा " के चलते अंत में आम आदमी  क़र्ज़ के बोझ में दबता चला जा रहा है : काले धन की कामना और फिर भ्रष्टाचार का जिन्न यहीं से पैदा होता है )
२) खूंद गधेड़ो खाय , पैलां री बाड़ी परे ; आ अण जुगती आय , रड़कै चित्त में , राजिया ......
अर्थ : अपना गधा अगर दूसरे के खेत को खा रहा है तो अपने को क्या हानि हो रही है ! पर ध्यान रहे - आपकी आत्मा आप स्वयं को अपराधी तो घोषित कर ही रही है , कचोट रही है - आपको
( आज के सन्दर्भ में : क्या कहा जाय , कूए भांग पड़ी है , यही तो हो रहा है - चारों तरफ ! कृपया आत्मिक भाव से , गहराई से समझें -तभी काले धन और भ्रष्टाचार से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा )
३) खोदा ! अनजळ खाय , खण तिणरी खोटी करै ; जडां मूळ सूं जाय , राम न राखै , राजिया ......
अर्थ : जो व्यक्ति जिसकी रोटी खाकर अपने आप को पालता है लेकिन फिर भी उसी की बुराई करता है , अनहित करता है - ऐसे व्यक्ति का पतन अविसंभावी है क्योंकि ऐसे दुष्ट को भगवान भी पनाह नहीं देता है
 
( आज के सन्दर्भ में : ध्यान रहे यदि हम हमारे देश के प्रति ईमानदार नहीं रहेंगे - जहां की माटी में पल बढ़ कर हमारा वजूद बना है - नो निश्चित मानिए - पतन तो निश्चित है , कोई रोक नहीं सकता , भले ही स्वदेसी धन को विदेशों में जमा करके अपने आप को बुद्धिमान समझ रहे हो !!)
४) गज भरियो गजराज मदछकियो चालै मतै ; कूकरिया बेकाज रोय भूसै क्यों राजिया ......
अर्थ : हाथी को अपनी मस्त गति से चलते देखकर कुत्ते रो रो कर , भूंक भूंक कर अपना ही तो अहित करते हैं - गजराज का क्या बिगड़ता है !
 ( आज के सन्दर्भ में : देशभक्त तो अपनी गति से माँ भारती की सेवा में संलग्न हैं , भले ही कोई कुछ भी करें - आखिर में बुरे सोच वालों का ही दुखद अंत होगा - फिर क्या फ़ायदा है ऐसी बक झक करने से - परन्तु यह बात देश - लुटेरे थोड़े ही समझ सकते हैं !! )
५) गुण ओगण जिण गाँव सुने  न कोई साम्भलै ; मच्छ गलागळ मांय रहणो मुसकळ  , राजिया .....
अर्थ :जिस गाँव में ज्यादा मूर्खों का वास हो जाता है , समझदारी की कमी हो जाती है - वहाँ बुद्धिमान का रहना मुश्किल हो जाता है
 ( आज के सन्दर्भ में : दुर्भाग्य से हमारे देश के जनतंत्र में जन से तंत्र अलग हो गया है , राजनैतिक दल " व्हीप " जारी कर झूठे अनुशासन का डंडा चला देती है : जनता द्वारा चुने हुए नेताओं को अपने आलाकमान के आदेश को शिरौधार्य करके बिना स्वबुद्धि के समर्थन / विरोध करना पड़ता है . क्या फ़ायदा ऐसी राजनीति से ! स्वविवेकी के तो घुटन ही होनी है !!)  
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Jugalkishore Somani

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Dec 30, 2011, 12:57:25 AM12/30/11
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भाग ८ ......राजिया रा दुहा ........प्रसिद्ध राजस्थानी कवि स्व. किरपा रामजी खिडिया की रचना ....
गतांक से आगे .....
१) गुणी सपूत सुर गाय कियो किसब मुरख कने ; जाणे रूनो जाय रोही में नर , राजिया .......
अर्थ : यदि कोई गायक कलाकार किसी मूर्ख , जिसे संगीत का कोई ज्ञान ही न हो , के सामने अपनी गायकी करे तो वह ( मूर्ख ) क्या समझेगा ! इससे अच्छा तो वह अपनी गायकी का कौशल कहीं वीरान जगह में ही प्रयोग करें ताकि प्रतिध्वनी तो सुनाई देगी !!
( आज के सन्दर्भ में : देश में अनेक संत - महात्मा , सूफी - फ़कीर , कथाकार आदि राष्ट्रीयता का सन्देश राजनीतिज्ञों के सामने दे रहे हैं पर ...... कहावत है कि " चिकने घड़े पर छांट ( बूँद ) नहीं टिकती " . इससे अच्छा तो यह होगा कि अपने अनुयायियों को समझाएं ताकि भविष्य में अपने 'मत' का मौल जानें )
२) गैला गंडक गुलाम बुचकार्यां बाथै पडै ; कुट्या देवै काम रीस न कीजिये , राजिया .......
अर्थ : पागल , कुत्ता और गुलाम ( कवि का इस शब्द से 'मूर्ख' कहने का अर्थ है ) - ऐसों को पुचकारने ( समझाने ) से ये उलटे गले पड़ जाते हैं . इसमे बुरा मानने या क्रोध करने की कोई बात नहीं है कि ऐसे तो ठोक - पीट कर ही तैयार किये जा सकते हैं .
( आज के सन्दर्भ में : वर्तमान में इस दोहे को अधिक स्पष्ट करने की कोई आवश्यकता नहीं है - देश का हालात सब कुछ बयाँ कर रहे हैं ... जब तक जनता बलशाली नहीं होगी - ये लुटेरे देश को लूटते रहेंगें - इनको अपनी औकात बताने का काम मताधिकारियों का ही तो है ! )
३) गोला घणा नजीक उमरावां आदर नहीं ; ठाकर जिण नै ठीक रण में पड़सी , राजिया .......
अर्थ : जो नेतृत्व " जी - हुजुरिओं " से घिरा रह कर
अपने बुद्धिमान सचिवों की राय को अनदेखी करता है , उस को संकट काल में पछताना पड़ता है .
( आज के सन्दर्भ में : बहुत स्पष्ट है - वर्तमान में यही तो हो रहा है ! कहाँ जा रही है विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की राजनीति ? विश्व गुरु बनाने का स्वप्न क्या इस राजनीति से साकार होगा ? नहीं , हमें अपने में सुधार करना होगा , लापरवाही और भय के जीन को इस काया से निकाल बाहर करना होगा , ईमानदारी पूर्वक हमें धर्म गुरुओं के सानिध्य को प्राप्त करना होगा - वहीं से सही शिक्षा मिल सकेगी , तभी बन पायेंगे " विश्व गुरु "
४) घण घण साच वधाय नह फूटै पहाड़ निवड़ ; जड़ कोमल भिद जाय राय पडै जद , राजिया ......
अर्थ : मजबूत पहाड़ का पत्थर कभी कभी विशाल हथोडों की मार से भी नहीं टूटता है लेकिन अगर कोई बीज वहाँ पनप जाय तो उसकी जड़ से वही मजबूत पहाड़ उस पौधे की जड़ से बिंध जाता है .
( आज के सन्दर्भ में : हमें अगर वास्तव में सुधरना है तो कृपया निश्चित कर लें कि यह दुष्कर कार्य हमारे पथ प्रदर्शक , हमारे धर्म गुरु , हमारे ईमानदार शुभचिंतक ही कर सकते हैं - शीध्रातिशीघ्र हमें ऐसे महानुभावों की शरण में चला जाना चाहिए .)
५) घेर सबळ गजराज केहर पळ गजकां करै ; कोसठ कर किम काज रिगता ही रै , आते हैं राजिया ......
अर्थ : शेर तो बलवान हाथी को भी घेर कर उसका भक्षण कर लेते हैं , पर क्या सियार ( गीदड़ ) भी ऐसा काम कर सकते हैं ? वे तो सिर्फ वन में भटक ही सकते हैं .
( आज के सन्दर्भ में : बुद्धिमान तो जैसे तैसे अज्जड़ ( मूर्ख ) व्यक्ति को भी शिक्षित कर ही देता है , परन्तु क्या आज की एज्युकेशन से ट्रेंड ये टीचर ऐसा कर पायेंगें ? समझने की कोशीष करें - हमें पुनः उसी गुरु कुल शिक्षा पद्धत्ति को स्वीकार कर लेना चाहिए - सही मायने में हम भटक रहे हैं , नई राह तो खोजनी ही पड़ेगी .)
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Jugalkishore Somani

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Jan 4, 2012, 1:06:43 AM1/4/12
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भाग ९ ......राजिया रा दुहा ........प्रसिद्ध राजस्थानी कवि स्व. किरपा रामजी खिडिया की रचना ....
गतांक से आगे ..... 
१) घोचो लाग्यां घाव घी गेंहू भावै घणा ; अहड़ा तो अमराव रोट्याँ मूंघा , राजिया .......
अर्थ : एक मामूली तिनके मात्र से घायल होकर अगर कोई हलवा खाने को
आतुर हो जाय ; ऐसे सरदार ( नेता ) तो " खाने " के ही भूखे माने जायेंगे .
( आज के सन्दर्भ में : आज हमारी सनातानीय अनेक नीतियों में से एक " राजनीति " इतनी हतोत्साहित हो गयी है कि इसका दर्द समझने वाला भी हतप्रभ हो गया है . राजनीति का चस्का लगता ही " खाने " का निमंत्रण जैसा लगने लग गया है - यह दिशा ठीक नहीं है - ऐसे लोगों की इस पवित्र नीति में कोई जगह नहीं होनी चाहिए - यह काम अब मतदाता ही तय कर सकते हैं कि उन्हें खाने वाला चाहिए या संभालने वाला .....)
२) चालै जठै चलंत अणचलिया आवै नहीं ; दुनियां में दरसंत रीस सुलोचन , राजिया ....
अर्थ : संसार में प्रायः यही देखने में आता है कि जहाँ जिसका वश पड़ता है , वहाँ ही " वह " धौंस चलाता है , और जहाँ " उसका " वश नहीं , भीगी बिल्ली बन जाता है.
( आज के सन्दर्भ में : हाँ , यह हालात है हमारी नेतागिरी का ! जब तक हमें हमारा स्वयं का भान नहीं होगा , न हमारी कहीं चलेगी और न ही कोई ध्यान देगा - घर बैठे केवल मात्र अपनो पर ही बड़बड़ाते रह जायेंगे , हाँ , संभलने का मौका मिला है - यह भी हमें ही समझना होगा )
३) चोर चुगल वाचाळ यारी मानिजै नहीं ; संपडावे घसकाळ रीती नाडयां , राजिया ......
अर्थ : चोर , चुगलखोर और बकबक करने वाले किसी के मित्र ( यार ) हो ही नहीं सकते . भूल से यदि ऐसे लोगों से दोस्ती हो जाय तो सच मानिए - ऐसे दोस्त सूखे तालाब में भी नहला देते हैं .
( आज के सन्दर्भ में : क्या ऐसा नहीं लग रहा है कि आज ऐसे ही लोगों की भरमार हो गयी है ? जहां देखो वहीँ " टोपी " पहनाने की ही चेष्टा नज़र आ रही है ! संभालिये, सदगुरु की शरण में आकर शिक्षित होना जरूरी है ताकि ऐसे भ्रष्ट लोगों का नाश करने की हमारे में जान आ सके )
४) जगत करै जीमणवार स्वारथ रे ऊपर सको ; पुन्न रो फळ अणपार रोटी न दे , राजिया ......
अर्थ : आज संसार में स्वार्थ से भोजन तो सभी कराते हैं परन्तु पुण्य कमाने के लिए कोई भी एक रोटी भी नहीं खिलाता है .
( आज के सन्दर्भ में : स्वार्थ , स्वार्थ और केवल स्वार्थ .... यही तो रह गया है - आज चहूँओर ! जिसको वास्तविक आवश्यकता है - उसकी ओर देखता ही कौन है ? नहीं आज हमें हमारे ज़मीर को झकझोरना होगा - स्वार्थ की जगह निःस्वार्थ को अपनाना होगा , वरना सनद रहे , हमारे अपने ही हमें चबा जायेंगे )
५) जण जण को मुख जोय नहचै दुःख कहणो नहीं ; काढ न दे वित्त कोय रीरायां सूं , राजिया ......
अर्थ : अपने दुःख को जग जाहिर नहीं करना चाहिए , ध्यान रहे ऐसे रोते रहने से कोई एक पाई ( पैसा ) भी निकाल कर आप के दुःख को कम नहीं करेगा .
( आज के सन्दर्भ में : ऐसे समूह के आगे , जिसमे चोर उचक्के भरे पड़े हों - ऐसों से क्यों उम्मीद करें ? ये क्या भला कर सकते हैं ? भला कराना है तो निश्चय ही भलों का संग करना होगा - भलों को ही सत्तासीन करना होगा )  

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Rameshwar Arya

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Jan 5, 2012, 12:40:12 PM1/5/12
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इस वीडियो को जरुर सुने परम श्रध्य आचार्य बालकिशन जी ने युवाओं का उत्साह बढाया !

आज कुछ हरामखोर कांग्रेसी परम पूज्य स्वामी रामदेव जी के बारे में बोल रहे थे की स्वामी रामदेव जी नौजवानों को गलत मार्ग दिखा रहे हैं ,

अरे कांग्रेस्सियों हरामखोरो तुमने देश की कितनी बुरी दशा कर रखी है कम से कम उसके बारे में तो सोच कर बोलो तुमने अब बाबा जी पर बड़े वार कर लिए अब भारत का युवा जाग रहा है और गाँधी के मार्ग को छोड़ कर , सुभाष , आजाद , भगत बनने की सोच रहा है सावधान देश के गद्दारों काले अंग्रेजों खूब लूट लिया अब नहीं लूटने देंगे !http://www.youtube.com/watch?v=V9JLyCpFMD0&feature=uploademail


2012/1/4 Jugalkishore Somani <jugalkish...@yahoo.co.in>

Jugalkishore Somani

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Jan 11, 2012, 3:11:27 AM1/11/12
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भाग १०  ......राजिया रा दुहा ........प्रसिद्ध राजस्थानी कवि स्व. किरपा रामजी खिडिया की रचना .... 

गतांक से आगे .....
४६) जण ही सूं जडियोह मद गाढो कर माढ़वा ; पारस खुल पडियोह रोयाँ मिलै न , राजिया ...... 
अर्थ : जिसके साथ गहरी मित्रता की जाय तो उसे जीवन पर्यंत निभानी चाहिए , अगर दोस्ती नहीं निभा पाए तो समझिये - आपका ' पारस ' गुम हो गया , फिर जिन्दगी में कभी ऐसा मौका नहीं मिलेगा. 
आज के सन्दर्भ में : न जाने यह कैसी विडम्बना है कि आज मित्रता के मायने ही बदल गए हैं , स्वार्थ के बिना कोई दोस्ती होती ही नहीं है , निःस्वार्थ का तो कोई मतलब ही नहीं रह गया है . विशेषकर राजनीति क्षेत्र वाले तो यह कहने में हिचकिचाते ही नहीं है कि " राजनीति में कोई स्थाई दोस्त / दुश्मन होता ही नहीं है " अब आप ही सोचे कि इस " निःस्वार्थ " शब्द का क्या होगा ! कौन होगा हमारा अपना !!
४७) जात - सभाव न जाय रान्धड़ के बोदो हुवै ; आरण वाग्यां आय रीठ बजाढ़े , राजिया ......
अर्थ : बहादुर सैनिक घायल अवस्था में भी बहादुर ही रहता है , युद्ध भूमि पर अंत समय तक अपना जौहर दिखलाता है - यही तो जाति स्वभाव कहा जाता है .
आज के सन्दर्भ में : सच्चा व्यक्ति आजीवन अपने कर्तव्य - पालन पर अडिग रहता है , चाहे कितनी भी परिस्थितियाँ दुष्कर हो जाय - यही तो मानव जाति का धर्म माना गया है ..... परन्तु दिल पर हाथ रख कर सोचिए - हम कहाँ हैं ?
४८) जायो तूं जिण देस , जळ ऊंडा , थोथा थळ  : भंवरपणा रो भेस , रल्यो कठा सूं , राजिया .....
अर्थ : जिस धरती पर हमारा जन्म हुआ है - ध्यान रहे ( राजस्थान के बारे में लेखक कह रहे हैं ) इस धरती का पानी बहुत गहरा और जमीन थोथी है , फिर तुम भंवरे ! किसके गुण गा रहे हो ? 
आज के सन्दर्भ में : कितनी दुखद अवस्था है कि हम जिस माँ भारती की गौद में पैदा हुए हैं उसी धरा को ' खुरच - खुरच ' कर खा रहे हैं . कितना अनमोल धन हम विदेशों में छुपा बैठे हैं ! कहावत है " खाए भरतार ( पति ) का और गुण गाये बीरा ( भाई ) के " निश्चित तौर पर हमें इस भयानक अवस्था से बाहर निकलना होगा .
४९) जिणरो अन जळ खाय खळ तिण सूं खोटी करै ; जड़ामूळ सूं जाय राम न राखै , राजिया .....
अर्थ : जो व्यक्ति जिसके अन्न - जल को खाकर अपना जीवन संवारता है , पर फिर भी , उसी व्यक्ति के बारे में बुरा सोचता है , भगवान भी ऐसे दुष्टों की कभी सहायता नहीं करता है .
आज के सन्दर्भ में : सच मानिए , आज संसार में यही तो हो रहा है - कहीं कोई ईमानदारी नज़र नहीं आ रही है . हम जिस धरती माँ की गौद में जन्मे - पले - बढे - आज उसी माँ को आवरण हीन करने पर तुले हैं . आज उसी धरा पर पैदा हुए हमारे अन्य भाईओं का निवाला छीन कर काले धन की प्रक्रिया को बढ़ावा दे रहे हैं , परन्तु यह सनातन सत्य है कि ऐसा करने वालों का अंत बुरा ही होगा - सावधान !
५०) जिण बिन रह्यो न जाय एक घड़ी अळगो हुयां ; दोस करै विण दाय रोस न कीजे , राजिया .......
अर्थ : जिस (व्यक्ति ) के बिना हम एक पल भी रह नहीं सकतें , किसी कारण वश यदि ऐसे व्यक्ति से अगर कोई भूल भी हो जाय तो उसे क्षमा कर देना चाहिए , उस पर गुस्सा तो कत्तई नहीं करना चाहिए .
आज के सन्दर्भ में : वर्तमान में यदि इस बात को पति - पत्नी समझ लें तो निश्चित है कि ' तलाक ' शब्द का अर्थ ही ना रहेगा . ठीक उसी तरह हम संतानों को भी हमारे जन्मदाताओं के विषय में सकारात्मक होना होगा . यही गहराई हमें हमारी मातृभूमि की सेवा का अप्रतिम मार्ग दिखायेगी .
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Jugalkishore Somani

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Feb 16, 2012, 4:21:25 AM2/16/12
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         " स्वाभिमान " जागृत नहीं होगा , तो ऐसे ही पिसते  रहेंगे  - जुगल किशोर सोमाणी 


    जब तक हम भारतीयों का अपना स्वयं का " स्वाभिमान " जागृत नहीं होगा , ऐसे ही पिसते  रहेंगे , लुटते रहेंगे , मारे जाते रहेंगे ........ इस पंक्ति की लम्बाई की कोई सीमा नहीं है . न जाने क्या हो गया है , देश का प्रत्येक " प्रबुद्ध " व्यक्ति कितनी कैसे जी हुजूरी कर सकता है - यही उसकी " प्रबुद्धता " का पैमाना बन गया है .
    क्या करें ! हमें पढ़ाया ही यही जा रहा है ! हाँ , हमारी संस्कृति , हमारे धर्म ग्रन्थ , हमारी मान्यताओं ने हमें " श्रेष्ठ "के आगे नतमस्तक होना सिखाया है . परन्तु हमारी वर्तमान शिक्षानीति , राजनीति  यहाँ तक कि आज के तथाकथित ' धर्म ' गुरुओं ने " स्वयं " के आगे नतमस्तक होने को ही " श्रेष्ठ " बताना शुरू कर दिया है .... यह दिशा सही नहीं है , गलत जा रहे हैं हम ...! हमारी कौशलता और कुशलता का ह्रास हो रहा है , बुद्धि कुंद होती जा रही है , शिक्षा के मायने " पिज्जा - बर्गर - कोक " ( के लिए ) एक मात्र कमाई रह गयी है .ये तथाकथित  " शिक्षित " अपने जन्म दाताओं को वातानुकूलित वृद्धाश्रमों में रख कर उनकी " सेवा " करने में अपना अहोभाग्य समझ बैठे हैं . ( आपको यह कड़वी सच्चाई प्रत्येक बड़े शहर के वृद्धाश्रमों के अवलोकन से ज्ञात हो जायेगी - एक बार ऐसी जगह जाकर तो आइये ! वहाँ निवास कर रहे हमारे उन दु:खी मात - पिताओं के अन्दर झाँक कर देखिये तो सही ! ) 
सही मानिए , मेरे इस आकलन के आसपास ही आप होंगे . दुर्भाग्य से यह शुरुआत हमारी अपनी की हुई है , बड़े बड़े प्रलोभनों के चलते पहले हम भटके , हमने भी अपने मायतों ( जन्म दाताओं ) को सुना - अनसुना किया और हमारी " होनहार " संतानों को शिक्षा की जगह एज्युकेशन की तरफ धकेला ..... गुड मोर्निंग से प्रभात और गुड नाईट से रात्रि का प्रचलन चल पड़ा .  जाने अनजाने हम स्वयं को " मार " रहे हैं , बड़ा मीठा जहर खा रहे हैं हम . ईमानदारी से हमारे स्वयं के घर में झाँक कर देखें - कैसे जी रहे हैं हम ! 
" कृष्णं वन्दे जगतगुरुम " की जगह हमारे यहाँ " गुरुओं " की बाढ़ सी आ गयी है  - और हम हो गए दिग्भ्रमित ! 
    मेरा आपसे सादर - विनम्र- करबद्ध हृदय से अनुरोध है कि अपने घरों में सद्ग्रंथों का पुस्तकालय बनाएं , पूरे परिवार के साथ प्रतिदिन , थोड़ेसे समय के लिए उनका अध्ययन करें,  विवेचना करें  , आपस में इन ग्रंथों में लिखे विषयों पर चर्चा करें ...... देखिये धीरे धीरे क्या परिवर्तन आता है ! 
    गीता प्रेस , गोरखपुर जैसी अनेक संस्थाएं हैं जो प्रमाणिक ग्रंथों का निरंतर प्रकाशन करती रहती है . मुझे स्मरण है - एक बार माननीय उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्रीमान रमेश चन्द्र जी लाहोटी ने अपने पद पर रहते हुए एक सामाजिक संस्था के उद्बोधन में कहा था - " अपने घरों में सदग्रंथों को संभाल कर रखें - ये ग्रन्थ तो रखे रखे ही अति उत्तम महक बिखेरते रहेंगे - जिस दिन भी इन ग्रंथों में से किसी एक ग्रन्थ का एक ही पृष्ट पढ़ लेंगे - कल्याण हो जाएगा ....."  
    हाँ , मुझे भी आपकी तरह इस बात का संतोष है कि आज भी हमारे इस महान आर्याव्रत भारत वर्ष में अनेक प्रकांड विद्वान् - संत - महात्मा - फ़कीर विद्यमान हैं जो सतत हमें हमारे स्वाभिमान में जीने की कला सिखा रहे हैं , भले ही उन्हें कोई पाखंडी कहे , ठग कहे या महा धूर्त कहे ... संत तो संत ही होता है  .... सबरी के बेर हो या विदुरानी के छिलके ... सब स्वीकार है . बस इनका प्रयास तो स्वाभिमान जागृत करने की ही है और रहेगा .
    साथियों बहुत हो गया ..... मेकाले की पद्धति का त्याग करने का समय आ गया है .......

 

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Jugalkishore Somani

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Feb 27, 2012, 12:15:14 AM2/27/12
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                        " सफाई " का सही तरीका  
    कहीं यदि आपको किसी ऐसी जगह की सफाई करने की जरुरत पड़ जाय जो बुरी तरह से " झाड़ - झंकाड़ " से भरी हो , मकड़ियों के जाले चारों तरफ लटक रहे हो , दीवारें आंधी से उड़ी मिट्टी की परतों से ढँकी  हो  , फर्श कचरे से भरा हो ........ क्या करेंगे आप ?  सफाई तो आप को ही करनी है ! कोई और चारा ही नहीं है !!
    सबसे पहले धैर्य पूर्वक आपको सफाई व्यवस्था का खाका बनाना होगा , अपने पहने कपड़ों की सुरक्षा व्यवस्था करनी होगी , एक कुल्हाड़ी को धार देकर तैयार करना होगा , एक बड़ी सी झाड़ू लेकर उसको किसी लम्बे से डंडे के ऊपरी छोर पर मजबूत रस्सी से बांधना होगा ... इतनी व्यवस्था के उपरांत शुरू होगा " सफाई " अभियान .....
    सर्व विदित है कि पहले झाड़ियाँ साफ़ करेंगे , कचरे का ढेर इकट्ठा करके उसमें पलीता लगायेंगे , फिर डंडे के बंधी झाड़ू से मकड़ी - संसार के जालों की सफाई होगी , दीवारें झड़कायेंगे ,फर्श पर बिखरे कचरे को पुनः इकट्ठा करके उस जलते कचरे के  हवाले करना पड़ेगा . फिर दूसरा दौर शुरू ......
    थोड़ी देर सुस्ता कर डंडे से बंधी झाड़ू को खोल कर फिर फर्श को साफ़ करना होगा . हाँ , पानी की व्यवस्था भी करनी होगी ...... दीवारों सहित पूरे फर्श को धोना होगा , अगर कहीं   " मैल " जमा रह गया तो किसी साबुन - सोडे का प्रयोग भी तो करना होगा . गंदे हुए पानी को ' सून्त ' कर फर्श को साफ़ करने के बाद उसी झाड़ू बंधे डंडे पर एक पौंछा बांधना होगा , बाल्टी में साफ़ पानी भर कर फर्श पर पौंछा  लगाना होगा ................
    यह है " सफाई " का सतत प्रयास  का तरीका ...... इस क्रम को आप बदल नहीं सकते ...... नहीं तो सफाई नहीं होगी ...... उलझ जायेंगे आप ..... 
    सोच लीजिये .... सफाई तो आप को ही करनी है ! जब करनी ही है तो रोना - चिल्लाना किस बात का ? कर दीजिये शुरुआत ! शुरू करोगे तो सफल भी आप ही होंगे !! 
    लेकिन ध्यान रहे ...... सफाई तो नित - प्रतिदिन करनी ही होगी , वरना फिर वही कूड़ा - कड़कट !!!!!!!!!! यह तो दैनिंदनी प्रक्रिया है !!!!!!!
   सफाई का  यही तरीका सब जगह लागू होता है - चाहे घर हो , मंदिर - मस्जिद हो , जनतंत्र का मंदिर हो या फिर न्यायतंत्र का ..... कोई भी जगह ... कहीं भी ....          
फिर मर्जी आपकी ...................
आपका ही हित चिन्तक साथी :
जुगल किशोर सोमाणी , जयपुर     

 
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MahanDeshBharat

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Feb 28, 2012, 1:46:35 AM2/28/12
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कांग्रेस ने अनिवार्य मतदान का कानून क्यों नहीं बनाया, इसके पीछे नेहरू खानदान का सबसे बडा डर छिपा है, देखे कैसे....

१-अनिवार्य वोटिंग / मतदा का मलतब है की भारत की हर जनता को अपना मताधिकार का प्रयोग करना ही है.

२-सरदार पटेल से एक बार बहुत बुरी तरह से  हारकर नेहेरू को यह अहसास हो गया की उन्हें हिंदू कतई पसंद नहीं करते हैं, ज्ञात हो १५ प्रदेशीय कांग्रेस कमेटियो के १५ वोटो में से नेहरु को  मात्र एक और पटेल को १४ वोट मिले थे.

३-नेहरू ने इस गणित को तुरंत पहचाना और अपना धर्म छिपाते हुए भारत की जनता को लोकतंत्र के महापर्व मतदान से हर प्रकार से उदासीन रखने की कोशिश की. कांग्रेस का जो रवैया शुरू से रहा है, उन्हें हिन्दुओ का वोट मिलता ही नहीं या यह कहे की जागरूक हिंदू और अधिकांश हिंदू शुरू से ही कांग्रेस विरोधी रहे है जो इनके हिंदू विरोध और मुस्लिम प्यार की वजह से था.

४-जिस भारत में मुस्लिम १०% से कम थे, सोचिये की यदि मतदान अनिवार्य होता तो क्या सभी हिंदू वोट डालकर कांग्रेस को सत्ता देते, कभी नहीं, या यह कहिये की यदि अनिवार्य मतदान का कानून होता तो कांग्रेस कब की समाप्त हो चुकी होती. नेहरू ने दो चीजों पर बहुत ध्यान दिया- पहला उनका असली धर्म के बारे में लोग न जान पायें खासकर हिंदू, दूसरा हिन्दुओ को बांटकर उसका १५% वोट ले ले. हालाकि ज्यादातर मुस्लिम नेताओ को नेहरू के असली धर्म के बारे में मालूम था लेकिन हिंदू नेताओ को वहा तक सोचने का मौका ही नहीं दिया और नेहरू हिन्दुओ से बहुत कम मिलते जुलते थे बल्कि हिन्दुओ से ज्यादा वे ईसाइयों को तरजीह देते थे.

५-आज भी यदि अनिवार्य मतदान का कानून बना दिया जाये तो कांग्रेस ३ राज्यों को छोडकर कही भी सत्ता में नहीं होगी, असल में बीजेपी के अनिवार्य मतदान की माग के पीछे यही यही तर्क है जो बीजेपी बहुत समय गवाने के बाद सोच पाई है, असल में इसके भी पीछे अडवानी की चाल रही है उन्होंने किसी धुर हिन्दुवादी को पनपने ही नहीं दिया बीजेपी में और हमेशा ही सोनिया के संपर्क में रहे... सोनिया भी कमोबेस नेहरू के नक्शेकदम पर चलकर एकदम यही काम कर रही है, सोनिया के निजी जिंदगी के बारे में नेटीजनो के अलावा कोई नहीं जानता है.

६-भारत में ४५% मतदान होता है और १८% से २३% मत पाने वाला जित जाता है, यह भी देखा गया की मुस्लिम वोट हमेशा ही कांग्रेस को मिलता रहा और थोक के भाव मिलाता रहा, यदि मुस्लिम वोटो में कुछ हिंदू वोट भी जुड जाये तो कांग्रेस का जितना तय. बस... बस.. यही गणित कांग्रेस के नेहरू और इंदिरा अपनाती रही, उन्होंने हिन्दुओ को अपने धर्म के बारे में कभी भी नहीं जानने दिया और हिन्दुओ को बरगलाते रहे और देश को लुटते रहे.. जो मिडिया बाल की खाल निकलती रहती है उसने कभी भी नेहरू के खानदानी जुड़ाव और असलियत पर कोई भी डाक्यूमेंट्री अभी तक बनाई न दिखाई . सोनिया और राहुल आज तक कभी किसी “आप की अदालत-सीधी बात—हॉट सीट “ आदि कार्यक्रमों में दिखे...??? कभी नहीं और कभी दिखेंगे भी नहीं..

“अनिवार्य मतदान का मतलब है की भारत में हिन्दुओ की सत्ता इसीलिये तथाकथित धर्मनिर्पक्ष ताकते अनिवार्य मतदान का कानून बनाने में बहुत दिक्कत पैदा करेंगी.”

जय भारत..

(अयोध्या से संजय कुमार मौर्य का विश्लेषण)  


2012/2/27 Jugalkishore Somani <jugalkish...@yahoo.co.in>

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आपने स्वयं और अपने परिवार के लिए सब कुछ किया, देश के लिए भी कुछ करिये,

क्या यह देश सिर्फ उन्ही लोगो का है जो सीमाओं पर मर जाते हैं??? सोचिये...... 


Jugalkishore Somani

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Feb 29, 2012, 12:21:10 AM2/29/12
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                                                  ज्योति से ज्योति जगाते चलो .......
बहुत हो गया .... बात का बतंगड़ बनाना - हमने अपनी आदत में शुमार सा कर लिया है ..... बहुत कार्य करने हैं हमें ..... बतंगड़ की आंधी से निकलना होगा ....
हम भी हमारी मीडिया के साथ " फालतू " जिरह में अपने आपको झोंक देते हैं ...... सही नहीं है यह ..... परिवर्तन तो हमें स्वयं में ही करना होगा .
संसार में " समाचारों " की कमी नहीं है ..... केवल मीडिया को संजोना है , व्यवस्थित संवारना है .... जनता बेसब्री से इंतज़ार कर रही है - आपके स्वागत को .
क्या न्यूज़ में सामाजिकता , धार्मिकता , मानव सेवा , मंदिर - मस्जिद - अन्य संस्थानों द्वारा चलाए जा रहे पुनीत कार्यों ....... बहुत बड़ा क्षेत्र है  - का समावेश नहीं हो सकता ? 
समय आ गया है - कंधे से कंधा मिला कर हमारे इस महान देश को ऊंचाइयों में ले जाना है - ज्योति से ज्योति जलानी है . यही है सार . छोड़ों व्यर्थ की खोखली बहसों में समय गंवाना .
मेरी विनती को देश की पुकार बना दो ..... व्यक्ति महान नाम से नहीं , अपने काम से होता है .........
विनती कर्ता :
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Jugalkishore Somani

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Mar 7, 2012, 4:12:18 AM3/7/12
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                             सेमीफाइनल का समापन हुआ    - जुगल किशोर सोमाणी 
    " बीती ताहे बिसार दे , आगे की सुध ले "  अब समय है राजनैतिक दलों को आतंरिक समीक्षा करने का - एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने की वजाय 'आत्म चिंतन' करने की आवश्यकता है मालूम पडेगा कि "जो दिल खोजा आपना - मुझसे बुरा न कोय" ध्यान रहे " राज " के बाद " नीति " शब्द लगता है तब जाकर राजनीति शुरू होती है . तकलीफ की बात तो यह है कि आज अधिकाँश राजनेता ' राजनीति ' करते हैं - राज'नीति' मानते नहीं है .   
    भारतीय राजनैतिक पटल से यह " नीति " दिग्भ्रमित होकर दुर्लभ होती जा रही है जैसे अनेक प्रजातियों का केवल व्यौरा मात्र ही पुस्तकों में रह गया है . हाँ , नीति की तस्वीर अभी भी उपलब्ध है - वापिस इस तस्वीर को पुनर्जीवित किया जा सकता है . नहीं तो हम भी रावण - कंस की श्रेणी में आंके जायेंगे . हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज के लगाए पौधे का फल हमारी आने वाली पीढ़ी खायेगी - स्पष्ट है कि फल के स्वादानुसार ही हमारा आकलन किया जाएगा !!
    हमें सुधरना होगा , सुधार करना होगा हमारी प्रत्येक " नीति " का . धर्म हो या कर्म , व्यापार हो या नौकरी , समाज हो या राज - सभी सुयोग्य नीतियों से ही संचालित होने से ही विकास का मार्ग खुलता है . हाँ , किसी भी कार्य के निष्पादन से मार्ग तो कोई न कोई खुलेगा ही लेकिन विकास या विनाश का निर्णय तो हम स्वयं ही शुरुआत में ही कर सकते हैं यदि हम सुबुद्धि / कुबुद्धि से सोच कर शुरुआत करते हैं - कार्य की .
    आज देश " नीति " को तरस रहा है , और यह कार्य भी इस देश के वासी ही करेंगे , ऐसी चीज़ों का आयात नहीं होता है , स्थाई और परिपक्व समाधान हमारी ही मुट्ठी में बंद है , बस मुट्ठी को खोलने की कला के विकास की राह दिखाने वाले युग पुरुष का सानिध्य चाहिए ....... इस महान देश में युग पुरुषों की कोई कमी नहीं है - केवल मात्र " हनुमान शक्ति " की तरह जागृत करना है .
    " नीतिवान " बनाने के लिए हमें पुनः ' भारतीय ' बनाना पड़ेगा , हमें हमारे ग्रन्थ खंगालने पड़ेंगे , गुरुओं का आदर करना होगा , सुबह को सुबह समझना होगा , दिल में सुविचारों को पनपाना होगा ...... हम भूल गए सब कुछ - बन बैठे मदारी के बन्दर ..... हमें हमारी आत्मा को जगाना होगा .
    हाँ , यह अग्रसर होने का सही समय है - शुरुआत तो हो चुकी - सेमीफाइनल तो हो चुका . आज देश के अनेक राज्य अँधेरे से निकल कर उजाले में सांस ले रहे हैं - फल फूल रहे हैं - किलकारियां मार रहे हैं - माँ - बहने मंगल गीत गा रही हैं - पक्षी तक चहचहा रहे हैं ..... इन राज्यों ने किसी को आयात नहीं किया था - अपनी ही मिट्टी की उपज से निकले भौंरे गुनगुना रहे हैं - इन गुनगुनाते भौंरों से ही ये राज्य पौषित हो रहे हैं , गर्वित हो रहे हैं ..... एक एक राज्य गर्वित होगा तो क्यों नहीं पूरा देश खुशहाल  होगा ? होगा , अवश्य होगा .....
    बस आपको भारतीय होने का कर्तव्य निभाना होगा - माँ की कोख की लाज रखनी होगी - इस धरा से हुए विकसित हुए अपने तन का क़र्ज़ चुकाना होगा ....
    तो , हो जाओ तैयार ...... यही समय की पुकार है ...... सेमीफाइनल के बाद फाइनल की ईमानदारी से तैयारी करनी है . 
: जयपुर - ७ मार्च २०१२ 



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Jugalkishore Somani

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Mar 18, 2012, 2:00:56 AM3/18/12
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                                                वर्तमान दौर की राजनीति          ****जुगल किशोर सोमाणी , जयपुर 
     पौराणिक कथाओं के चलते एक दोहा चल पड़ा था :: " तुलसी नर का क्या बड़ा , समय बड़ा बलवान ; काबा लूंटी गोपियाँ , वोही अर्जुन वोही बाण "::
उपरोक्त दोहा इतिहास का है और वर्तमान फिर इस दोहे की तैयारी कर रहा है , बल्कि ऐसा समय चल पड़ा है . राजनीति के सारे " अर्जुन " और उनके सारे " बाण " चूक रहे हैं . अगले पल क्या होने वाला है  - कोई बताने का साहस नहीं कर पा रहा है . ऐसी ऐसी घटनाएं घटित हो रही है जिनका न तो कहीं सिर है और न कहीं धड़ . इतने बेतुके क्रिया - कलाप होते जा रहे हैं कि इनकी चर्चा मात्र से जिम्मेदार नागरिक सहम उठते हैं . सच माने तो राज की नीति का अपहरण हो गया है , " अ " राजकता चहुँ ओर विद्यमान हो गयी है . हर क्षेत्र में माफिया राज स्थापित हो गया है , भूल से भी कोई ऊंची आवाज़ में अराजकता का विरोध कर दे तो .... गया काम से . 
     अगर " बड़े " को धीरे से चपत भी लग जाय तो पूरा देश झनझना उठता है या यों कहे कि पूरा मीडिया , पूरा राजनैतिक क्षेत्र  मिल कर देश को झनझनवा देता है - जबरदस्ती बात का बतंगड़ बनवा देता है . और अगर किसी " छोटे " को मौत की नींद भी ये माफिया सुलवा दे तो कहीं कोई चर्चा नहीं . सब के सब चुप .... खामोश ...
     ऐसे देश नहीं चलता है . निरोग को बीमार बनाकर कब तक " पद्म विभूषण " प्राप्त करते रहोगे ! सोई जनता पर लाठियां भी भाँजो और उसी जनता से इलाज़ भी करवाओ !   कब तक होगा यह खेल ? नहीं , ऐसे तो नहीं चलेगा यह देश !! तो फिर क्या किया जाय ? 
      हमारे इस महान आध्यात्मिक आर्यावर्त में हर युग में संत महात्मा अपनी दिव्य वाणी से सन्देश देते रहे हैं ..... बस , उस वाणी का सम्मान करना हमें सीखना होगा . हमें उन दुष्ट लोगों को नेस्तनाबूत करना होगा जो हमारी आध्यामिकता की इस विरासत को ठग - पाखंडी ... कह कर धूल - धुसरित करना चाह रहे हैं , उन्हें भान नहीं है कि इस सनातनीय पवित्र भूमि में राक्षस कभी अभय नहीं रहे - अमर नहीं हुए .... और .... और आध्यात्म कभी भयभीत नहीं हुआ - मरा नहीं .    
      इस बात को समझ लें कि " साथ " किसी के कुछ नहीं जाता है .... यहीं धरा रह जाता है क्योंकि सब कुछ है भी तो इस " धरा " का ही . फिर क्यों पाप की गठड़ी तैयार कर रहे हो ? हाँ , साथ जाएगा आप स्वयं का भला और बुरा ...... ठीक से समझ लें .
     अब रही वर्तमान " राजनीति " की ..... यही सत्य है कि धर्म पूर्वक यानि सकारात्मक राजनीति ही स्थाई होती है , राजनीति का यह मतलब कत्तई नहीं है कि सामने वाले को बेवक़ूफ़ बना कर अपना उल्लू सीधा करो . ध्यान रहे कि " सामने " वाला जीवित रहेगा तभी राजनीति चलेगी , मारने की चेष्टा का अगला कदम स्वयं को मरघट पहुंचाना है - आज मारे हुए को ले जा रहे हो कल तुम्हे भी मार कर ले जाया जाएगा . 
     " धर्म " का मतलब भी समझ लें ..... अग्नि का धर्म जलाना है तो जल का धर्म बुझाना है .... अब यह तो सोचने वाले पर निर्भर करता है कि अग्नि को जठराग्नि समझे और बुझाने को प्यास का हल समझे . इस बात को बहुत ही सरलता से हमारे संत - महात्मा हमें समझाते रहते हैं , पर हम है कि समझने को तैयार ही नहीं !!! 
उठो ! जागो !! हमारी जन्म भूमि - हमारी भारत माता - हमारी आध्यात्मिक धरा हमारा इंतज़ार कर रही है .... ध्यान रहे  " जागो तभी सवेरा " बशर्ते कि वास्तविक जागरण जो जाय .

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budh pal singh Chandel

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Mar 19, 2012, 2:15:50 AM3/19/12
to Jugalkishore Somani, Bhagat Singh Kranti Sena, सम्पूर्ण भारत २.० - सिर्फ हिन्दू, "BEING HINDU", bharatswabhiman2014, bharatswab...@googlegroups.com, Vedprakash Vaidik, ganesh...@acclimited.com, hansat...@gmail.com, mpp...@gmail.com, BHARATIYA YUVA KRANTIKARI SANGATHAN, sambad <prabhari, ARYA NIRMAN RASHTRA NIRMAN, editor amar, Reply to Comment, Deepak Sharma, BST- Neelam Ahlawat
भाई सोमानी जी,
बर्तमान दौर की राजनीती एबम राजनीतिग्य "शनी -रहू "ग्रषित है ,जिस से सब उल्टा-पुल्टा यानी उ.प.ए.(उल्टा-पुल्टा- संगठन )की आकंक्षानुसार होता आया है ,हो  रहा है ,और भबिश्य में भी अनबरत होता रहे गा ,और तब ही रुकेगा ,जब यह अंतर्ध्यान होंगे|,



2012/3/18 Jugalkishore Somani <jugalkish...@yahoo.co.in>

Jugal Kishore Somani

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Jul 12, 2012, 7:16:49 AM7/12/12
to Bharat Trust, B P S Chandel, DR. HARISHCHANDRA SHAH, Dr. Ved Pratap Vaidik, Dr. Jaideep Arya, Dr. Ashutosh vajpeyee, dr.deepa...@gmail.com, Dr. Ernest Albert, Dr. Ved Pratap Vaidik

                       जड़ - चेतन प्रभु रूप तुम्हारा ; नमस्कार प्रभु बारम्बारा :
मैंने किसी संत से सुनी थी - ज्ञान और विज्ञान की परिभाषाएं :-
ज्ञान : पहले समर्पित होवो , फिर प्रयोग करो ......
विज्ञान : पहले प्रयोग करो , फिर समर्पित होवो ......
जब तक  ज्ञान से समझ कर , ज्ञान से जान कर मनुष्य आगे नहीं बढेगा - प्रभु द्वारा रचित इस जगत का भान उसे क्या होगा ! " यूरेका - यूरेका " करता रहेगा और भंवर जाल में उलझता रहेगा . 
बहुत सरल सी - सीधी सी - सुन्दर सी बात है कि हमें जो करना है उसमें तल्लीन होना होगा - समर्पित होना होगा .... हर बात पर तर्क नहीं किया जा सकता . हाँ , यदि शास्रार्थ करना है तो पहले ज्ञान की शरण में जाना होगा , समर्पित होना होगा . 
इस ब्रह्माण्ड के रचनाकार को समझने के लिए प्रयोग की नहीं अपितु समर्पण की आवश्यकता है . क्या आज का वैज्ञानिक इस बात से इनकार करेगा कि उसे भी " अ - आ " यानि शिक्षा की शुरुआत के लिए किसी गुरु की शरण में जाना पड़ा था ! इसी को तो समर्पण कहते हैं , बालक जिद्द नहीं करता कि १+१ =२ क्यों होते हैं ....पहले गुरु की कही बात को हृदय से स्वीकार करता है ... जब अच्छी तरह समझ लेता है तो फिर तो वह स्वयं भी अनेक प्रयोगों द्वारा सिद्ध कर डालता है कि १+१=२ कैसे हुए .
बस ..... इसी तरह जीवन भर ज्ञान के प्रति यदि वैज्ञानिक समर्पित रहे तो विज्ञान को उन्नत बना सकेंगे . याद रखिए : आप किसी बात का आविष्कार नहीं कर रहे बल्कि उसको पुनर्स्थापन भर कर रहे हैं . क्या इस बात से कोई वैज्ञानिक इन्कार कर सकता है कि आज तक जिन जिन वस्तुओं का " आविष्कार " हुआ है उनका विवरण कहीं न कहीं हमारे शास्त्रों में मिल ही जाता है . बस , आज के तथाकथित " बुद्धिजीवी " हमारे विलक्षण ग्रंथों का माखौल उड़ाते रहते हैं . ख़ास कर हमारे अपने ही देश में ......
हमने ( हमारे सनातनीय ग्रंथो - शास्त्रों ने ) तो हमेशा जड़ और चेतन की परिभाषाएं बड़े विस्तार से की है . जब हमारी " पोथी " में आस्तिक और नास्तिक तक का विवरण कर ( दे ) रखा है तो फिर बहस किस बात की ? जड़ मादा है तो चेतन नर है .... इन दोनों के बिना तो किसी भी तरह की कल्पना का जन्म तक नहीं हो सकता !इसी कारण तो विश्व को " शिव मय " माना गया है ... शिवलिंग वही तो स्वरुप है !  
हाँ , आज यदि वैज्ञानिक बन्धु पुनः किसी बात को स्थापित करते हैं तो निश्चित ही स्वागत योग्य है . मेरा विश्वास पूर्वक मानना है कि आज विश्व का कोई भी वैज्ञानिक नास्तिक नहीं बल्कि आस्तिक भाव से अन्दर के अन्दर हमारे शास्त्रों का भी अध्ययन करता है , हमारी गणित को भी समझता है , हमारे पंचांगों से भी सीख लेता है .क्या आज विज्ञान यह नहीं मान रहा है कि समुद्र के नीचे की तलहटी बिलकुल सांप की चमड़ी की तरह नाजुक और मुलायम है ? भूकंप के दौरान खिसकने वाली " प्लेट्स " भी कुण्डली मारे हुए सांप की तरह ही हिलती है ? ....... तो फिर हमारे ग्रन्थ क्या कहते हैं ? वे भी तो पृथ्वी को शेषनाग के सिर पर टिकी होना ही तो बताते हैं !........
बहुत सी बातें हैं , यह तो एक साधारण सी उदाहरण मात्र है . हाँ , वैज्ञानिक अपना कार्य , अपनी शोध जारी रखें .....हमारे ग्रंथों का सहारा अवश्य मिलेगा .........   
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Jugal Kishore Somani

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Oct 24, 2012, 1:15:29 AM10/24/12
to Patanjali Yog Peeth Haridwar, Mukul Shukla Mumbai, DR. HARISHCHANDRA SHAH, Bharat Swabhiman Trust, Dr. Ved Pratap Vaidik, Dr. Jaideep Arya, Dr. Ashutosh vajpeyee, B P S Chandel, BHARAT SWABHIMAN, bharatswabhi...@gmail.com, dr.deepa...@gmail.com, Dr. Ernest Albert, Dr. Ved Pratap Vaidik, Om Bharatee, Radhey Shyam Parwal Vaishali Jaipur, Babulalji Totla Jaipur


त्योंहार आने पर व्यखानों की बौछार ! बस .....
   अक्सर देखा जाता है कि किसी भी त्योंहार के आने पर बधाइयों का दौर चल पड़ता है . दूसरे दिन वही " ढ़ाक के तीन पात " ! ऐसा क्यों होता है ? फिर रही सही कसर निकाल दी इस आंग्ल भाषा ने ! गिटिर - पिटिर कुछ भी लिख देते हैं !! 
   सही मायने में हम शिक्षा के मामले में अत्यधिक भटक गए हैं . इस " एज्युकेशन " ने हमारे संस्कारों को शूली पर चढ़ा दिया है . आज यह प्रथा सी चल पडी है कि किसी भी समारोह में " दीप प्रज्वलन " तो होता ही है , परन्तु हमारे एज्युकेटेड लोग इस पवित्र कार्य को बेहिचक जूते पहने ही करने में अपनी शान समझते हैं . संयोगवश यदि वहाँ किसी देव की फोटो भी लगी हो तो माल्यार्पण भी ये महानुभाव अपनी " ड्रेस  कोड " में ही कर डालते हैं . किसी बड़े को प्रणाम तो उनके घुटने छूकर करना लगभग प्रथा ही बन चुका है - आज किसी भी बच्चे को पूछ लें वह " घुटनों वाला प्रणाम " सही बता देगा क्योंकि उसने अपने परिवेश में देखा ही ऐसा है !! 
   बहुत सी बातें हैं ........ त्योंहारों को फैशनेबल तरीके से नहीं बल्कि सही शिक्षा ग्रहण कर मनाने की आवश्यकता है . और इस कार्य में मुख्य भूमिका हमारी मातृ - शक्ति को निभानी होगी क्योंकि आज जो भी व्रत - उपवास - तीज - त्योंहार मनाए जाते हैं , माताओं - बहनों के बल बूते पर ही यह प्रथा कायम है किन्तु आज की एजुकेटेड नारियां इस संस्कृति की थोड़ी अवहेलना भी कर रही है - ठीक नहीं है यह . यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि घर का पुरुष वर्ग भी गृह लक्ष्मी के धार्मिक और सांस्कृतिक आदेशों का ईमानदारी से पालन करें . हमें हमारी प्रथाओं को मनाने के वास्तविक कारण को समझना पड़ेगा कि आखिर हम क्यों इस लीक को पीट रहे हैं ..... सच मानिए त्योंहार बड़े वैज्ञानिक हैं - बहुत ज्ञान छिपा पड़ा है इनके मनाने के कारणों में . 
   जानकार ज्ञानी बंधुओं से विनती है कि तीज - त्योंहारों के गूढ़ रहस्यों को सर्व साधारण के समक्ष प्रकाशित करें ताकि हम पूर्ण जानकारी के साथ आस्तिक होकर हमारी संस्कृति की स्तुति कर सके .
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