आर्य समाज एक हिन्दू सुधार आंदोलन हैं........Ek tippani

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Nov 22, 2010, 10:26:51 AM11/22/10
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आदरणीय अनिल मित्तल जी ॐ,

आर्य समाज का वैदिक धर्म को डूबने से बचाने में और लोगों को  पुनः वैदिक धर्म का महत्व समझाकर उसको लोकप्रिय बनाने में बहुत बड़ा योगदान रहा है. साथ ही आर्य समाज ने सनातन धर्म में आ गई कुरीतियों और अंधविश्वासों को दूर करने में भी सराहनीय प्रयास किया.

दुर्भाग्य से हमारे देश की पाठ्यपुस्तकों में यह पढाया जाता है कि यह एक सामाजिक आन्दोलन था जो विफल हो गया क्योंकि उनका नारा था, "वेदों की ओर लौट चलो". आधुनिक भारतीय समाज ने पुराने पन की तरफ लौटने को स्वीकार नहीं किया क्योंकि इसमें नयापन और आधुनिकता नहीं थी.

मैं FM १०५.६ ज्ञान वाणी दिल्ली का रेडियो कार्यक्रम सुन रहा था जिसमें १२ वे वर्ग के लिए इतिहास का पाठ पढाया जा रहा था. यह झूठ और दुष्प्रचार सुनकर मेरा खून खौल गया. इन कोंग्रेस के चमचों और शिक्षाविद कहलाने वालों को धिक्कार है.

जय भारत


2010/11/22 Anil Mittal <hawa...@gmail.com>


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From: Arya Shiv <notification...@facebookmail.com>
Date: 2010/11/22
Subject: [ARYA NIRMAN RASHTRA NIRMAN] आर्य समाज एक हिन्दू सुधार आंदोलन हैं । जिसकी...
To: Anil Mittal <hawa...@gmail.com>


आर्य समाज एक हिन्दू सुधार आंदोलन हैं । जिसकी स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने १८७५ में बंबई में मथुरा के स्वामी विरजानंद की प्रेरणा से की थी।[१] यह आंदोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू धर्म में सुधार के लिए प्रारंभ हुआ था। आर्य समाज में शुद्ध वैदिक परम्परा में विश्वास करते थे तथा मूर्ति पूजा, अवतारवाद, बलि, झूठे कर्मकाण्ड व अंधविश्वासों को अस्वीकार करते थे। इसमें छुआछूत व जातिगत भेदभाव का विरोध किया तथा स्त्रियों व शूद्रों को भी यज्ञोपवीत धारण करने व वेद पढ़ने का अधिकार दिया था। स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रन्थ आर्य समाज का मूल ग्रन्थ है। आर्य समाज का आदर्श वाक्य है: कृण्वन्तो विश्वमार्यम्, जिसका अर्थ है - विश्व को आर्य बनाते चलो।
Arya Shiv 7:42pm Nov 22
आर्य समाज एक हिन्दू सुधार आंदोलन हैं । जिसकी स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने १८७५ में बंबई में मथुरा के स्वामी विरजानंद की प्रेरणा से की थी।[१] यह आंदोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू धर्म में सुधार के लिए प्रारंभ हुआ था। आर्य समाज में शुद्ध वैदिक परम्परा में विश्वास करते थे तथा मूर्ति पूजा, अवतारवाद, बलि, झूठे कर्मकाण्ड व अंधविश्वासों को अस्वीकार करते थे। इसमें छुआछूत व जातिगत भेदभाव का विरोध किया तथा स्त्रियों व शूद्रों को भी यज्ञोपवीत धारण करने व वेद पढ़ने का अधिकार दिया था। स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रन्थ आर्य समाज का मूल ग्रन्थ है। आर्य समाज का आदर्श वाक्य है: कृण्वन्तो विश्वमार्यम्, जिसका अर्थ है - विश्व को आर्य बनाते चलो।

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