शहीद बलभद्र सिंह - 1857 की क्रांति में अवध, उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधि

149 views
Skip to first unread message

Prakriti Aarogya Kendra

unread,
May 15, 2011, 3:46:52 AM5/15/11
to prakriti-a-call-to-...@googlegroups.com

मूर्धन्य साहित्यकार अमृतलाल नागर ने अपनी पुस्तक 'गदर के फूल' शहीद बलभद्र सिंह एवं उनके छह सौ साथियों को समर्पित की है। बलभद्र सिंह रैकवार 1857 की क्रांति में अवध, उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधि चरित्र हैं। सिपाहियों के विद्रोह के लिए तो गाय-सुअर की चर्बी के कारतूस कारण बने, जबकि अवध के जमींदारो, तालुकेदारों के लिए, जो अंग्रेजों के तंत्र के ही भाग थे, ऐसा कोई कारण भी नहीं था, लेकिन सैकड़ों नाम हैं जो विदेशी राज की प्रतिक्रिया में इस क्रांति और शहादतों का हिस्सा बने। यह विद्रोह उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारी चरित्र को उजागर करता है। 1857 का कलेवर विश्व की महानतम फ्रांसीसी राज्य क्रांति से काफी बड़ा था। 1857 की भारतीय क्रांति ने भी एक राष्ट्र का सूत्रपात किया। अगर अमेरिकी क्रांति अमेरिकी एकता का मार्ग प्रशस्त करती है तो 1857 ने भारत के राजनीतिक एकीकरण का रास्ता दिखाया है। दुनिया के इतिहास में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध यह सबसे बड़ा विद्रोह था। इसने साम्राज्य की जड़ें हिला दीं। अगर अंग्रेजों को नेपाल से मदद न मिली होती तो गुलामी का दौर बहुत पहले खत्म हो गया होता।

लखनऊ अंग्रेजों के कब्जे में आ चुका था। बाराबंकी के ओबरी नवाबगंज के मैदान में गदर के सिपाही, दर्जन भर तालुकेदार अपनी इलाकाई सेनाओं के साथ मोर्चे की तैयारी में थे। बहुत से सैनिकों को और खुद बलभद्र सिंह का यह पहला युद्ध अनुभव था और नेतृत्व भी उन्हीं पर था। इस युद्ध में अवध के किसानों ने मशहूर रेजीमेंट हडसन हार्स को भागने पर मजबूर किया। कई तोपे भी कब्जे में ले लीं। दोबारा हुए युद्ध में तीन घटे भीषण संघर्ष हुआ। बहादुरी और जुझारूपन में नवाबगंज का युद्ध कहीं-कहीं हल्दीघाटी को स्पर्श कर जाता है। यह 13 जून, 1858 की तारीख थी। इसके 5 दिन बाद 18 जून को हल्दीघाटी की तिथि पड़ती है। नवाबगंज के हवाले से 1576 में हुए हल्दीघाटी युद्ध को याद रखना भी आसान है। युद्ध संवाददाता विलियम रसेल और ब्रिगेडियर होपग्रांट ने अपने डिस्पैच में बलभद्र सिंह की वीरता, युद्ध क्षमता खुले दिल से स्वीकार की है। पहले युद्ध में अंग्रेजों की तोपों पर कब्जा कर लेने के बाद भागते शत्रु का पीछा न करने से अंग्रेजों को पुन: जवाबी हमले का अवसर मिल गया। युद्ध के प्रति पेशेवराना नजरिया न होना बलभद्र सिंह की हार व शहादत का कारण बना। दोपहर का वक्त था, जब घिर गए बलभद्र की गरदन पर पीछे से तलवार का भरपूर वार पड़ता है। किंवदंतियों के अनुसार सर कट जाता है। धड़ गिरता नहीं। हाथ यंत्रवत तलवार चलाते रहते हैं। पीढि़यों बाद भी जन मानस में सुरक्षित हो गई वह स्मृति आज भी बहुत से गीतों, आल्हा और रासो में अभिव्यक्त हो रही है। एक दूसरे युद्ध में बिलग्राम के निकट रूइया किले पर राजा नरपत सिंह की मोर्चेबंदी में ब्रिगेडियर एड्रियन होप सहित बहुत से ब्रिटिश सैनिक मारे गए। रसेल लिखता है कि लखनऊ पर पुन: कब्जे के युद्ध में रूइया युद्ध से थोड़े ही अधिक सैनिक मारे गए थे। रूइया किले के खंडहर आज भी नरपत सिंह के संघर्ष की दास्तान कहते हैं। दूसरा युद्ध फिर उसी गढ़ी पर रक्षात्मक रूप से लड़ा गया। बताते हैं कि तीसरे दिन फाटक खोलकर हुए युद्ध में नरपत सिंह साथियों सहित शहीद हुए।

अवध के युद्धों में रणनीति की कमी आड़े आती है। जन विद्रोह परंपरागत युद्धों के समान किलों और सड़कों पर नहीं जीते जाते। दुर्भाग्य से हमारे यहां रणनीति के अभाव में शहादतें ही युद्धों का लक्ष्य बन जाती रही हैं। लंबी लड़ाइयों के लिए शहादतों के साथ नेतृत्व का जिंदा रहना भी जरूरी है। इसी कारण क्रांति तो हुई, लेकिन वह जन युद्ध में नहीं परिवर्तित हो सकी। वह तो हारने के बाद समझ में आया कि कितनी बड़ी लड़ाई थी। इस बड़ी लड़ाई का दो सालों तक चलना भी बड़ा आश्चर्य है। पूरे अवध में बुंदेलखंड, बिहार से बंगाल, ग्वालियर से दिल्ली तक विद्रोह के शोले भड़कते रहे, लेकिन हम जीत नहीं सके।

कल 13 जून को बहराइच, बाराबंकी, हरदोई के बहुत स्थलों पर और संपूर्ण अवध में चहलारी के वीर बलभद्र सिंह और साथियों की शहादत को याद किया जाएगा। इन स्मृतियों के साथ मात्र बुद्धिजीवी ही नहीं, आम ग्रामीण जन भी अपने पूर्वजों के संघर्ष को याद करने के लिए भाग लेंगे। इनके पूर्वज किसानों और तालुकेदारों ने कंधा मिलाकर बराबर की जंग लड़ी। विदेशी सत्ता के समापन का ख्वाब लिए जूझते रहे। यह बात सच है कि 1857 का विद्रोह एक दिशाहीन क्रांति थी। इस युद्ध में हम भविष्य के लिए नए विचारों का प्रस्फुटन नहीं देखते। दोनों हाथों में तलवार लिए सिरविहीन शहीद बलभद्र का चित्र अन्यतम शौर्य, युद्ध क्षमता के साथ एक प्रकार से इस क्रांति के विचार व दिशाविहीन होने का भी संकेत दे जाता है।

[आर. विक्रम सिंह: लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं]



--

धन्यवाद एवं हार्दिक शुभेच्छा,

प्रकृति आरोग्य केंद्र

सेंद्रिय, आयुर्वेदिक, वनस्पतीय, प्राकृतिक और स्वदेशी वस्तुओं का वैशेषिक विक्रय केंद्र  
=====================================================

Thanks and Regards,
Prakriti Aarogya Kendra
Specialty Store of Organic, Ayurvedic, Herbal, Natural & Swadeshi Products
=========================================================

Shop No. 2, Buena Vista,
Off Ganpati Chowk,
Near Kailas Super Market
Viman Nagar, Pune - 411014
Contact Number : 020-40038542, 9822622905, 9881308509

Website www.prakritipune.in
Google Group http://groups.google.com/group/prakriti-a-call-to-return-to-the-nature

Other Useful Links www.rajivdixit.in, www.rajivdixit.com


Yogesh Kumar Jain

unread,
May 15, 2011, 11:39:59 PM5/15/11
to bharatswab...@googlegroups.com
What has been written is true. We, as a race, don't follow the leader verbatim or await his instructions but try to use our own "leadership" brain which we may not have. When Anna Hazare started his fast, many questioned on this forum why Baba was not coming to Delhi to support him; this without realizing that Baba is very much wiser than us, is highly foresighted, is already on a big mission (bigger than the issue taken up by Anna)  and is busy working according to his priorities. So, let us follow Baba's instructions in toto. The leader should also have his deputy ready with his long term plan to take up his mission forward immediately, if necessary.
 
Jai Bharat.
 
Yogesh Kumar Jain,

--
Manage emails receipt at http://groups.google.com/group/bharatswabhimantrust/subscribe
To post ,send email to bharatswab...@googlegroups.com
http://www.rajivdixit.com - Rajiv Dixit audio and videos lectures.
http://www.bharatswabhimanyatra.com - Swami Ramdev's Yatra Videos
http://www.bharatswabhimantrust.org - Bharat Swabhiman Official website


Reply all
Reply to author
Forward
0 new messages