ज़माना पुराना नहीं , हम अपने आप को नया यानि मॉडर्न मान कर स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं . कौन कहता है कि आप आधुनिक सुख - सुविधा का उपयोग न करें ? अवश्य करें , किन्तु संयम और अनुशासन के साथ जीने से क्या आप '' पुराने '' हो जाएंगे ??
लिख तो दर्द के साथ ही हूँ लेकिन आज अधिकाँश बलात्कार पहनावे के कारण , घर से बाहर शिक्षा ( एज्युकेशन ) की चाहत , स्वछन्द घूमना - फिरना , नौकरी की तमन्ना , प्रोग्रेस की भूख ...... के कारण ही होते हैं . आपसी सहमति को तो न जाने कैसे कानूनी सहमति मिल गयी है ! पर नतीजा क्या निकलता है ? प्रायः पैंतीस के होते होते आँखों के सामने अन्धेरा आने लग जाता है क्योंकि इसके बाद ही वास्तविक
जीवन की शुरुआत होती है . आटे - नमक की कहानी यहीं से शुरू होती है . एक बात और : नशा या लत स्वतः नहीं बल्कि लगाई जाती है ......
''खुला घूमना " कहीं भी गलत नहीं मैं तो ''स्वछन्द घूमने '' की बात कह रहा हूँ , गृह लक्ष्मी को घर की मालकिन बने रहने से क्यों एतराज हुआ ? क्योंकि हमारी इच्छाएं बढी , पुरुषों का लालच बढ़ा -
नतीजा सामने है ......
गृह लक्ष्मी की प्रोग्रेस का सही दायरा परिवार को सुदृढ़ करना है न कि पैसा कमाना ठीक वैसे ही घर के पुरुष का कर्तव्य आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को मजबूत करना है . ईमानदार बात को न भूलें कि घर के अन्दर की जिम्मेदारी स्त्री के हाथों में होने से ही सुख - शान्ति की वृद्धि
होती है . आज अधिकाँश " प्रोग्रेसिव " घरों की अंदरुनी जानकारी बेहद भयावह है और इसके पीछे एक मात्र कारण मैकाले की शिक्षा पद्धति के कारण महिला का घर से बाहर निकलना है . एक बात मजाक में किन्तु वास्तविक लिख रहा हूँ - अपने दोस्तों में प्रसारित करिएगा " पुरुष बाहर शेर की तरह बर्ताव करता है किन्तु घर जाते ही दुर्गा शेर पर सवार हो जाती है " हाँ , मैं यह कहना चाहता हूँ कि घर की बागडोर गृह
लक्ष्मी के पास ही रहनी चाहिए , पिशाच पैदा ही नहीं होंगे .