Re: झीने कपड़े , ओछे कपड़े ---- लड़कियों का पहनावा

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budh pal singh Chandel

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Nov 23, 2012, 6:17:51 AM11/23/12
to Jugal Kishore Somani, Patanjali Yog Peeth Haridwar, Mukul Shukla Mumbai, DR. HARISHCHANDRA SHAH, Bharat Swabhiman Trust, Dr. Ved Pratap Vaidik, Dr. Jaideep Arya, Dr. Ashutosh vajpeyee, BHARAT SWABHIMAN, bharatswabhi...@gmail.com, dr.deepa...@gmail.com, Dr. Ernest Albert, Dr. Ved Pratap Vaidik, Babulalji Totla Jaipur, Radhey Shyam Parwal Vaishali Jaipur
बिल्क्य्ल सच ,किन्तु न र ,नारी ,थोडा सय्मियत खान/पान/पह्नाबा  पर ध्यान दे तो बहुत कुछ सुधार जा सकता ,जादा पश्च्मिकरण ही यह बिकरातियो को जन्म देता है ,इसे सुधारना सरकार के साथ साथ हर न र /नारी का धर्म है|


2012/11/23 Jugal Kishore Somani <jugalkish...@yahoo.co.in>
झीने कपड़े , ओछे कपड़े ---- लड़कियों का पहनावा
 जुगल किशोर सोमाणी , जयपुर  
बात समझनी होगी . पौराणिक काल में भी स्त्रियाँ '' तन ढकने '' के लिए ही कपड़ा पहनती थी , अभी केवल पचास वर्षों पहले भी ग्रामीण महिलाएं '' कांचली '' ( आज की ब्रा जैसा ) पहनती थी . और आज .... आज की लड़कियां भी झीने , ओछे कपड़े पहनती हैं . लेकिन बहुत फर्क है ...... शालीनता और भोंडेपन के बीच बड़ी बारीक लकीर है और वो है आँखों की शर्म , हाव भाव , नज़रिया , देखने झांकने का तौर तरीका ..... एक तरह से न्यौता मिलता भी है और स्वीकार भी हो ही जाता है . 
प्रभु ने नर और नारी का निर्माण सृष्टि की रचना के लिए किया था न कि वासना के गहरे गड्ढे में गिर पड़ने के लिए . खैर !  हम तो '' सभ्य '' माने गए हैं लेकिन एक बार ......... केवल एक बार उन '' असभ्यों '' की दुनिया में भी झाँक कर देख लें जो न वस्त्र पहनते हैं , न घरों में रहते हैं - स्वछन्द घूमते हैं - न सीमा न देश ..... लेकिन कभी इन '' असभ्यों '' के रहने - सहने की व्यवस्था की तरफ भी झाँक कर देखा है ? इनके सहचर्य जीवन को समझा है ? नहीं ? तो झाँक कर देखिये , ये कितने अनुशासन से , समय से नर - मादा की भांति अपनी संतति को संसार के दर्शन कराते हैं ! हमारी तरह चोबीसो घंटे .......
क्यों हम अपने आप को धोखा दे रहे हैं ? आवश्यक को अनावश्यक बना कर बहुत असभ्य बनते जा रहे हैं हम !! कोई इठलाने की आवश्यकता नहीं है , ऐसे ही चलते रहे तो निश्चित मानिए " जवानी में बुढापा " आना ही है ..........
जीवन में संयम , अनुशासन होना ही मनुष्यता है .... हाँ , यह मनुष्यता मनुष्यों के अलावा प्रायः सभी अन्य प्राणियों में आज भी विद्यमान है .
 
 




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B. P. Singh. Chandel  09893512991
VISHIST AND JIVAN-DANI ebm PURN-KALIK ,ebm RAJY-KARY-KARINI- SADASHY (AADRSH-GRAM-YOJNA),Madhy-Pradesh(east).
BHARAT SWABHIMAN(TRUST)
JABALPUR , MADHYA PRADESH







Jugal Kishore Somani

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Nov 23, 2012, 5:17:05 AM11/23/12
to Patanjali Yog Peeth Haridwar, Mukul Shukla Mumbai, DR. HARISHCHANDRA SHAH, Bharat Swabhiman Trust, Dr. Ved Pratap Vaidik, Dr. Jaideep Arya, Dr. Ashutosh vajpeyee, B P S Chandel, BHARAT SWABHIMAN, bharatswabhi...@gmail.com, dr.deepa...@gmail.com, Dr. Ernest Albert, Dr. Ved Pratap Vaidik, Babulalji Totla Jaipur, Radhey Shyam Parwal Vaishali Jaipur

Jugal Kishore Somani

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Nov 23, 2012, 6:47:16 AM11/23/12
to budh pal singh Chandel, Patanjali Yog Peeth Haridwar, Mukul Shukla Mumbai, DR. HARISHCHANDRA SHAH, Bharat Swabhiman Trust, Dr. Ved Pratap Vaidik, Dr. Jaideep Arya, Dr. Ashutosh vajpeyee, BHARAT SWABHIMAN, bharatswabhi...@gmail.com, dr.deepa...@gmail.com, Dr. Ernest Albert, Dr. Ved Pratap Vaidik, Babulalji Totla Jaipur, Radhey Shyam Parwal Vaishali Jaipur
ज़माना पुराना नहीं , हम अपने आप को नया यानि मॉडर्न मान कर स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं . कौन कहता है कि आप आधुनिक सुख - सुविधा का उपयोग न करें ? अवश्य करें , किन्तु संयम और अनुशासन के साथ जीने से क्या आप '' पुराने '' हो जाएंगे ??

लिख तो दर्द के साथ ही हूँ लेकिन आज अधिकाँश बलात्कार पहनावे के कारण , घर से बाहर शिक्षा ( एज्युकेशन ) की चाहत , स्वछन्द घूमना - फिरना , नौकरी की तमन्ना , प्रोग्रेस की भूख ...... के कारण ही होते हैं . आपसी सहमति को तो न जाने कैसे कानूनी सहमति मिल गयी है ! पर नतीजा क्या निकलता है ? प्रायः पैंतीस के होते होते आँखों के सामने अन्धेरा आने लग जाता है क्योंकि इसके बाद ही वास्तविक जीवन की शुरुआत होती है . आटे - नमक की कहानी यहीं से शुरू होती है .  एक बात और : नशा या लत स्वतः नहीं बल्कि लगाई जाती है ......

''खुला  घूमना " कहीं भी गलत नहीं मैं तो ''स्वछन्द घूमने '' की बात कह रहा हूँ , गृह लक्ष्मी को घर की मालकिन बने रहने से क्यों एतराज हुआ ? क्योंकि हमारी इच्छाएं बढी , पुरुषों का लालच बढ़ा - नतीजा सामने है ...... 

गृह लक्ष्मी की प्रोग्रेस का सही दायरा परिवार को सुदृढ़ करना  है न कि पैसा कमाना ठीक वैसे ही घर के पुरुष का कर्तव्य आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को मजबूत करना है . ईमानदार बात को न भूलें कि घर के अन्दर की जिम्मेदारी स्त्री के हाथों  में होने  से ही सुख - शान्ति की वृद्धि होती है . आज अधिकाँश " प्रोग्रेसिव " घरों की अंदरुनी जानकारी बेहद भयावह है और इसके पीछे एक मात्र कारण मैकाले की शिक्षा पद्धति के कारण महिला का घर से बाहर निकलना है . एक बात मजाक में किन्तु वास्तविक लिख रहा हूँ - अपने दोस्तों में प्रसारित करिएगा " पुरुष बाहर शेर की तरह बर्ताव करता है किन्तु घर जाते ही दुर्गा शेर पर सवार हो जाती है " हाँ , मैं यह कहना चाहता हूँ कि घर की बागडोर गृह लक्ष्मी के पास ही रहनी चाहिए , पिशाच पैदा ही नहीं होंगे . 
 
 
जुगल किशोर सोमाणी , जयपुर  


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Sent: Friday, 23 November 2012 4:47 PM
Subject: Re: झीने कपड़े , ओछे कपड़े ---- लड़कियों का पहनावा
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