Fwd: [AnandVrindavan] सत्संग पत्रक - 15-04-2015

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Vineet Chaitanya

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Apr 15, 2015, 12:49:32 AM4/15/15
to bhagavadgita-iiith

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From: Swami Shri Akhandanandji Sarswati c.anandv...@gmail.com [AnandVrindavan] <AnandVrinda...@yahoogroups.com>
Date: 2015-04-15 5:34 GMT+05:30
Subject: [AnandVrindavan] सत्संग पत्रक - 15-04-2015
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श्रीवल्लभाचार्य जयन्ती पर-
सत्संग पत्रक


      श्रीवल्लभाचार्य जी महाराज साधन के रूप में 'श्रीकृष्ण: शरणं मम', 'श्रीकृष्ण   तवाsस्मि' लेकर आए। उसका अर्थ है यदि अन्याश्रय से अथवा स्वाश्रय से अपने अहं का नाश करोगे तो नाश करने वाला जो 'अहं' है वह शेष रह जाएगा। परन्तु, भगवद्-अनुग्रह को दृष्टि में रखकर भगवान् की पूर्णता, भगवान् की क्षराक्षर विलक्षणता, भगवान् की पुरुषोत्तमता, भगवान् की अहं इदं सर्वात्म रूप में उपस्थिति- जब उस भाव में तुम मग्न हो जाओगे तो तुम्हारा अहं अपने आप ही गल जायेगा। आचार्य लोग कहते हैं कि 'हे प्रभु, 'मेरा' मेरा नहीं है और 'मैं' भी मेरा नहीं हूँ। जिसको मैं मेरा समझता हूँ- मेरा मकान, मेरा धन, मेरा परिवार- वह तो मेरा है ही नहीं। मैं स्वयं भी मेरा नहीं हूँ। ये बात बिलकुल पक्की है, नियतस्व है कि 'मैं' और 'मेरा' ये दोनों तुम्हारे। प्रभु, समर्पण क्या करें? समर्पण करेंगे तो समर्पण का एक और कर्त्ता खड़ा हो जायेगा। हमने जान लिया कि सब तुम्हारा है। यह तो हमारी भूल थी जो उस वस्तु को हम अपनी समझते थे। हम अपनी भूल ही छोड़ रहे हैं। प्रभु, हम आपके चरणों में क्या समर्पित करें ? मैं कहाँ अलग हूँ, मेरा क्या अलग है कि हम आपको समर्पित करें।  श्रीवल्लभाचार्यजी महाराज ने जिस शरणागति का वर्णन किया है, क्या विलक्षण है उसमें कि कर्ता का मानो कोई दायित्व ही न हो। सारा दायित्व भगवान् के सिर पर है। 
सर्वधर्मान्    परित्यज्य    मामेकं   शरणं   व्रज।
अहं त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः। ।
हमारी अहंता को, ममता को, राग-द्वेष को, मोह को मिटाने वाली जो भगवद्-शरणागति है,वह हमारे जीवन में उदय हो। हमारे नन्हें-से हृदय में नन्हें से भगवान् आवें। हमारी नन्ही-सी जिह्वा पर नन्हे से भगवान् आवें। वे वामन होकर आवें और विराट् होकर सम्पूर्ण विश्व को नाप लें आत्मसात् कर लें।


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Posted by: Swami Shri Akhandanandji Sarswati <c.anandv...@gmail.com>



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ummedsingh baid

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Apr 21, 2015, 7:21:29 AM4/21/15
to bhagavadgita-iiith
vah. well said sir!

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Sudheer Kolachina

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Apr 21, 2015, 11:08:32 AM4/21/15
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Although this is not relevant to Vineet Chaitanya ji's original post, Vallabhacharya was a Telugu speaker. What a big contrast we find between those times and today's times. 
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