गोपी प्रेम विलक्षण है। उसमें 'श्रृंगार' है पर 'राग' नहीं है; 'भोग'
है पर 'अंग-संयोग' नहीं है; 'आसक्ति' है पर 'अज्ञान' नहीं है; 'वियोग' है
पर 'बिछोह' नहीं है; 'क्रंदन' है पर 'दुःख' नहीं है; 'विरह' है पर 'वेदना' नहीं है; 'सेवा' है पर 'अभिमान' नहीं है; 'मान' है पर 'धैर्य' नहीं है; 'त्याग' है पर 'संन्यास' नहीं है; 'प्रलाप' है पर 'बेहोशी' नहीं है; 'ममता' है पर 'मोह' नहीं है; 'अनुराग' है पर 'कामना' नहीं है; 'तृप्ति' है पर 'अनिच्छा' नहीं है; 'सुख' है पर 'स्पृहा' नहीं है; 'देह' है पर 'अहम् ' नहीं है; 'जगत्' है पर 'माया' नहीं है; 'ज्ञान' है पर 'ज्ञानी' नहीं है; 'ब्रह्म' है पर 'निर्गुण' नहीं है; 'मुक्ति' है पर 'लय' नहीं है।