वाराणसी : गुजरा हुआ कल इतिहास भी होता है, धरोहर भी। पुरानी यादें, निर्माण व वस्तुएं हमारी पहचान तो होती ही हैं, हमारी पीढ़ी को संदेश भी देती हैं और साथ ही बौद्धिक ज्ञान भी। इसीलिए धरोहरों को संरक्षित किया जाता है और कोई भी इनके साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करता। इस परिपेक्ष्य में सारनाथ केवल अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल ही नहीं अपने आप में एक इतिहास है। यह बताने की जरूरत नहीं कि भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था। बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए सारनाथ एक हब के रूप में विकसित हो रहा है। इसमें शासन-प्रशासन भी रूचि ले रहा है।
बावजूद इसके सारनाथ में ऐतिहासिक धरोहर के साथ खिलवाड़ होते देखा जा सकता है। ऐसा उदासीनता से हुआ अथवा अज्ञानता से लेकिन खास बात यह कि यह काम वही महकमा कर बैठा जिसकी जिम्मेदारी है धरोहरों व इतिहास को संरक्षित करने की। दरअसल यहां की गुप्तकालीन दीवारों की मरम्मत में घोर लापरवाही बरती गई। भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग के नियम के अनुसार ऐतिहासिक धरोहरों के मरम्मत कार्य में उस काल के दौरान उपयोग में लाई गई सामग्री का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए जब उसका निर्माण हुआ था। अर्थात मिट्टी है तो मिट्टी, सुर्खी-चूना है तो सुर्खी चूना, पत्थर है तो उसकी जगह पत्थर आदि। सारनाथ पुरातत्व खंडहर में प्राचीन मूलगंध कुटी विहार के अवशेष समेत गुप्तकाल की प्राचीन दीवारों की मरम्मत में बालू-सीमेंट के प्रयोग से इतिहासकार अचंभे में पड़ गए हैं। इतिहास के विद्यार्थी भी परेशान हैं कि आखिर ऐसा क्यों किया गया। पुरातत्व विभाग के एक अधिकारी ने भी नाम न छापने की शर्त पर स्वीकारा कि प्राचीन धरोहर को बचाने के लिए पूर्व अफसरों के कार्यकाल में मरम्मत के दौरान सीमेंट-बालू का प्रयोग किया गया जो सरासर गलत है। इससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है।
महकमे से ऐसी उम्मीद न थी
बीएचयू इतिहास विभाग की प्रो. विभा त्रिपाठी कहती हैं कि पुरातत्व विभाग से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। ऐसा हुआ है तो गलत है। बालू-सीमेंट के प्रयोग से गुप्तकालीन दीवारों की मौलिकता ही समाप्त हो जाएगी। इतिहास के छात्र भी भ्रमित होंगे। यदि छात्रों का कोई दल वहां जाता है तो उन्हें सही जानकारी देनी होगी, यह भी बताना होगा कि मरम्मत के दौरान यहां गलत हुआ है। तत्काल भूल सुधार की आवश्यकता है।
वर्तमान को गलत संदेश हानिकर
काशी विद्यापीठ इतिहास विभाग के प्रो. महेश विक्रम सिंह कहते हैं कि इससे वर्तमान को गलत संदेश जाएगा। यह इतिहास के लिए भविष्य में हानिकारक साबित होगा। शैक्षणिक भ्रमण के दौरान छात्र गलत चीजें देखेंगे तो जाहिर है कि गलत सीखेंगे भी,