27-05-77 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन
पॉवरफुल स्टेज अर्थात् बाप समान बीजरूप स्थिति
सदा समर्थ, सदा ज्ञान के खज़ाने से सम्पन्न, बाप समान गुणमूर्त्त और शक्ति मूर्त्त, ज्ञानी तू आत्मा, ऐसी विदेशी सो स्वदेशी आत्माओं प्रति बाप-दादा के उच्चारे हुए महावाक्य:-
आज बाप-दादा के सामने कौन सी सभा बैठी हुई है? जानते हो? आज डबल प्रकार की सभा है। एक, जो सभी सामने बैठी हैं - भारतवासी बच्चों की सभा। दूसरे, विदेशी बच्चों की सभा। विदेशी बच्चे बहुत उमंग, उत्साह और लगन से बाप को प्रत्यक्ष करने के प्लान्स (Plans) बनाते हुए, बार-बार बाप के गुण गाते, खुशी में नाच रहे हैं। उन्हों की खुशी का, मन का गीत बाप-दादा के सामने सुनाई दे रहा है। सब तरफ, विशेष रूप से बाप के स्नेह और सेवा का वातावरण आकर्षण करने वाला है। बाप-दादा को भी बच्चों को देख, बच्चों के उमंग पर खुशी होती है। साथ-साथ आप सभी बच्चों का मिलन का उमंग देख हर्षित होते हैं।
आज अमृतवेले बाप-दादा चारों ओर के बच्चों के पास चक्कर लगाने निकले। क्या देखा? मधुबन वरदान भूमि में, खुशी-खुशी से आए हुए बच्चे, इस ही मिलन की खुशी में और सब बाते भूले हुए हैं। हरेक नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार वरदान प्राप्त करने के उमंग, उत्साह में थे। और सब तरफ चक्कर लगाते हुए क्या देखा? मैजारिटी (Majority;अधिकतर) का शरीर भल अपने-अपने स्थान पर है, लेकिन मन की लगन मधुबन तरफ है। अव्यक्त रूप से योगयुक्त बच्चे मधुबन में ही अपने को अनुभव करते हैं। चारों ओर स्वरूप चात्रक समान दिखाई दे रहा था। याद की यात्रा के चार्ट में क्या दिखाई दिया? पोजीशन (Position;मर्तबा) और आपोजीशन (Opposition;विरोध) दोनों का खेल देखा था। यथा शक्ति हरेक अपने पोजीशन पर स्थित रहने का प्रयत्न बहुत करते, लेकिन माया की आपोजीशन, एक रस स्थिति में स्थित होने में विघ्न-स्वरूप बन रही थी। इसका कारण क्या? (1) एक तो सारे दिन की दिनचर्या पर बार-बार अटेंशन की कमी है। (2) दूसरा शुद्ध संकल्प का खजाना जमा न होने कारण व्यर्थ संकल्पों में ज्यादा समय व्यतीत करते हैं। मनन शक्ति बहुत कम है। (3) तीसरा, किसी भी प्रकार की छोटी-छोटी परिस्थितियाँ जो हैं कुछ भी नहीं, उन छोटी सी बातों की कमज़ोरी का कारण बहुत बड़ा समझ, उसको मिटाने में टाईम बहुत वेस्ट (Time Waste;समय व्यर्थ) करते हैं। कारण क्या? समय प्रति समय जो अनेक प्रकार की परिस्थितियों को पार करने की युक्तियाँ सुनते हैं, वह उस समय घबराने के कारण स्मृति में नहीं आती हैं। (4) चौथा अपने ही स्वभाव संस्कार, जो समझते भी हैं कि नहीं होने चाहिए, बार-बार उन स्वभाव-संस्कार के वशीभूत होने से धोखा भी खा चुके हैं, लेकिन फिर भी रचता कहलाते हुए भी, वशीभूत हो जाते हैं। अपने अनादि, आदि संस्कार बार-बार स्मृति में नहीं लाते हैं। इस कारण संस्कार स्वभाव मिटाने की समर्थी नहीं आ सकती हैं। ऐसे चारों ही प्रकार के योद्धा देखे। योद्धा शब्द सुनकर हँसी आती है। और जिस समय प्रेक्टीकल एक्ट (Practical Act;व्यवहारिक कर्म) में आते हो, उस समय हँसी आती है? बाप-दादा को ऐसा खेल देखते हुए, बच्चों पर रहम और कल्याण का संकल्प आता है। अब तक मैजारिटी व्यर्थ संकल्पों की कम्पलेन (Complain;शिकायत) बहुत करते हैं। व्यर्थ संकल्प के कारण तन और मन दोनों कमज़ोर हो जाते हैं। व्यर्थ संकल्प का कारण क्या? सुनाया था, अपनी दिनचर्या को सेट करना नहीं आता।
अमृतवेले रोज़ की दिनचर्या, तन की और मन को सेट करो। जैसे तन की दिनचर्या बनाते हो कि सारे दिन में यह-यह कर्म करना है, वैसे अपने स्थूल कार्य के हिसाब से, मन की स्थिति को भी सेट करो। जैसे अमृतवेले याद की यात्रा का समय सेट है, तो ऐसे सुहावने समय पर, जबकि समय का भी सहयोग है, सतोप्रधान बुद्धि का सहयोग है, ऐसे समय पर मन की स्थिति भी सबसे पॉवरफुल स्टेज (Powerful Stage;शक्तिशाली स्थिति) की चाहिए। पॉवरफुल स्टेज अर्थात् बाप समान बीजरूप स्थिति। तो यह अमृतवेले का जैसा श्रेष्ठ समय है, वैसी श्रेष्ठ स्थिति होनी चाहिए। साधारण स्थिति में तो, कर्म करते भी रह सकते हो, लेकिन यह विशेष वरदान का समय है। इस समय को यथार्थ रीति यूज़ (USE;प्रयोग) न करने का कारण, सारे दिन की याद की स्थिति पर प्रभाव पड़ता है। तो पहला अटेंशन - ‘अमृतवेले की पॉवरफुल स्थिति की सैटिंग करो।’
दूसरी बात, जब ज्ञान की गुह्य बातें सुनते हो, अर्थात् रेग्युलर स्टडी (नियमित अध्ययन) करते हो, उस समय जो प्वाइन्टस निकलती हैं, उस हर प्वाइन्ट को सुनते हुए, अनुभवी मूर्त्त होकर नहीं सुनते। ज्ञानी तू आत्मा हर बात के स्वरूप का अनुभव करती हैं। सुनना अर्थात् उस स्वरूप के अनुभवी बनकर सुनना। लेकिन अनुभवी मूर्त्त बनना बहुत कम आता है। सुनना अच्छा लगता है, गुह्य भी लगता है, खुश भी होते हैं, बहुत अच्छा खजाना मिल रहा है, लेकिन समाना अर्थात् स्वरूप बनना - इसका अभ्यास होना चाहिए। मैं आत्मा निराकार हूँ - यह बार-बार सुनते हो, लेकिन निराकार स्थिति के अनुभवी बनकर सुनो। जैसी पाइंट, वैसा अनुभव। परमधाम की बातें सुनो तो परमधाम निवासी होकर परमधाम की बातें सुनो। स्वर्गवासी देवताई स्थिति के अनुभवी बन, स्वर्ग की बातें सुनो। इसको कहा जाता है सुनना अर्थात् समाना। समाना अर्थात् स्वरूप बनना। अगर इसी रीति से मुरली सुनो तो शुद्ध संकल्प का खजाना जमा हो जाएगा। और इसी खज़ाने के अनुभव को बार-बार सुमिरण करने, सारा समय बुद्धि इसी में ही बिजी रहेगी। व्यर्थ संकल्पों से सहज किनारा हो जाएगा। अगर अनुभवी होकर नहीं सुनते, तो बाप के खज़ाने को अपना खजाना नहीं बनाते। इसीलिए खाली रहते हो। अर्थात् व्यर्थ संकल्पों को स्वयं ही जगह देते। और आगे बढ़कर सारी दिनचर्या में क्या-क्या कमी करते हो, वह फिर दूसरे दिन सुनायेंगे। पहले इन दो बातों को ठीक करो। ज्यादा डोज़ (Dose;खुराक) नहीं देते हैं। अच्छा।
सदा समर्थ, सदा ज्ञान के खज़ाने से सम्पन्न, याद की यात्रा द्वारा सर्व शक्तियों के अनुभवी मूर्त्त, सदा हर परिस्थति को स्वस्थिति द्वारा सेकेण्ड में और सहज पार करने वाले, ऐसे बाप समान गुण मूर्त्त और शक्तिमूर्त्त ज्ञानी तू आत्माओं को बाप-दादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दीदी जी के साथ:-
आज विशेष विदेश वालों का बाप को अपनी तरफ खींचने का चल रहा है। यह सभा देखते हुए भी बाप-दादा को बार-बार सामने विदेशी नज़र आते हैं। विशेष याद के आकर्षण का बहुत फुलफोर्स से मीठी-मीठी बातें करते हैं। हरेक अपने मन के उमंग का संकल्प बाप के आगे ऐसे रख रहे हैं, जैसे सम्मुख बातें की जाती हैं, विदेश में रहने वालों को इतनी खुशी क्यों है? इसका कारण क्या है? क्योंकि नई-नई फुलवाड़ी समझती हैं कि हम पीछे आने वाले जब तक कोई विशेष कार्य नहीं करेंगे तो हाई जम्प (ऊँची छलांग) देकर आगे कैसे बढ़ेंगे।? उन्होंको यह लगन है हम कुछ विशेष करके दिखावें। जो न हुआ है वह करके दिखावें। इस कारण इस नशे में रात-दिन तन-धन कुछ दिखाई नहीं देता है। लक्ष्य अच्छा रखा है। हरेक स्थान यही सोच रहा है कि हमारे देश का चारों ओर नाम निकले। इस रेस के कारण एक दो से आगे बढ़ रहे हैं। विदेश से नाम निकलना है - यह तो ठीक है, लेकिन किस कोने से निकलता? कौन सा स्थान निमित्त बनता? किस स्थान का व्यक्ति निमित्त बनता है? इसलिए हरेक अपने धुन में लगे हुए हैं। और बाप-दादा को भी बच्चों की मेहनत और उत्साह अच्छा लगता है। (दादी को) आप यहाँ बैठी हो या विदेश में? विदेश सर्विस के प्लान चलते हैं कि जब प्लेन (Plane) में चढ़ेंगी तब प्लान चलेंगे?
महारथियों से एक प्रश्न पूछते हैं। बाप से तो बहुत पूछते हैं। महारथियों के लिए विशेष है – रूह-रूहान, महारथियों से अच्छी लगती है। विजय माला के जो मणके बनते हैं पहला नम्बर वा 108 वाँ नम्बर, दोनों में अन्तर क्या है? कहलाते तो सब विजयी रत्न हैं। नाम ही है विजयमाला। लेकिन पहला नम्बर विजयी रत्न और जो लास्ट का विजयी रत्न है उनमें कोई विशेष सब्जेक्ट (विषय) पर विजय का आधार है वा टोटल नम्बर पर आधार है। एक होता है विशेष सब्जेक्ट में। दूसरा होता है सब सब्जेक्ट के टोटल मार्क्स का अन्तर। तो इसकी गुह्यता क्या है अर्थात् विजय की गुह्य गति? इसमें बहुत कुछ रहस्य भरा हुआ है। युगल दाने की विशेष सब्जेक्ट कौन सी है और अष्ट रत्नों की कौन सी है। 100 रत्नों की कौन सी है? उसमें भी आगे और पीछे वालों में क्या अन्तर है? इस गुह्य गति को आपस में मनन करना। फिर बतायेंगे। आज चक्कर लगाया ना। यह तो हुई मोटी बात। लेकिन विशेष महारथियों के पुरूषार्थ में क्या महीन अन्तर रह जाता है जिससे दो नम्बर के बाद तीसरा आता, फिर चौथा आता? हैं महारथी, नामी-ग्रामी लेकिन दूसरा तीसरा नम्बर भी किस आधार से बनता है? तो आज महारथियों के इस गुह्य गति के पुरूषार्थ को देख रहे थे। अष्ट में भी पहला नम्बर और आठवाँ नम्बर में क्या अन्तर है? पूजते तो आठ ही हैं लेकिन पूजा में भी अन्तर, विजय में अन्तर है। हरेक की विशेषता भी विशेष है और फिर जो कमी रह जाती है वह भी विशेष है जिसके आधार पर फिर नम्बर बनते हैं। आज दोनों ही देख रहे थे तो यह आपस में विचार करना। समझा?
दिल्ली पार्टी से:-
दिल्ली को दरबार बनाया है? दिल्ली दरबार कहते हैं तो दिल्ली को अपनी राज्य दरबार बनाई है? राजाई तैयार हो गई है? दरबार में कौन बैठेंगे? दरबार में पहले तो महाराजा, महारानियाँ चाहिए। कितने महाराजा, महारानियाँ तैयार हुई हैं? दिल्ली वालों को राज्य का फाउण्डेशन (Foundation;नींव) लगाना है। राज्य का फाउन्डेशन कैसे लगेगा, उसका आधार क्या? राज्य अर्थात् अधिकार प्राप्त कर लेना। पहले स्वयं का राज्य, फिर विश्व का राज्य। तो दिल्ली निवासी स्वयं पर अधिकारी बने हैं? विदेश से तो नाम निकलेगा, लेकिन नाम पहुँचेगा कहाँ? (दिल्ली में) तो दिल्ली वालों को नवीनता करनी चाहिए क्योंकि सेवा का आदि स्थान है। सेवा की ‘बीज रूप’ दिल्ली है। तो जैसे दिल्ली आदि स्थान है सेवा के हिसाब से और राज्य का स्थान राजस्थान भी है, तो दोनों ही हिसाब से दिल्ली वालों को विशेषता करनी चाहिए तो क्या करेंगे? मेला करेंगे? कान्फ्रेंस करेंगे? यह तो पुरानी बातें हो गयीं। लेकिन नवीनता क्या करेंगे? पहली बात तो दिल्ली वालों का एक दृढ़ संकल्प संगठित रूप से होना चाहिए कि ‘हम सब दिल्ली का किला मजबूत कर सफलता होनी ही है, इस संकल्प का व्रत एक हो।’ जैसे कोई भी कार्य में सफलता के लिए व्रत रखते हैं ना। वह तो स्थूल व्रत रखते हैं, लेकिन यह मन्सा का व्रत है जिस व्रत से निमित्त कोई भी कार्य करेंगे।
भला कार्य साधारण भी हो, रिजल्ट नवीनता की हो। मानो कानफ्रेंस करते, बाहर का जैसे रूप साधारण का होता लेकिन सफलता नवीनता की हो। जब एक ही समय और सर्व का एक ही संकल्प व्रत होगा कि होना ही है, तो देखो दिल्ली क्या कमाल करती है! कमज़ोरी के संकल्प न हो - होना है, नहीं होना है, होगा, नहीं होगा, अभी तक तो हुआ नहीं - यह कमज़ोरी के संकल्प हैं। एक दृढ़ संकल्प की भट्ठी हो फिर सब दिल्ली को कापी करेंगे। अभी ऐसी कोई नवीनता दिखाओ। भाषण किया, जनता आई, सुना और गए। भाषण करने वाले ने भाषण किया और चले - यह तो होता रहता है। अब डबल स्टेज स्वयं की और दूसरी स्थान की तैयार करो। जब डबल स्टेज हो तब सफलता हो। स्थूल स्टेज पर झंडा लगाना, स्लोगन लगाना, चित्र लगाना बहुत सहज है, लेकिन हर एक चैतन्य चित्र हो। हरेक की बुद्धि में विजय का झंडा लगा हो। स्लोगन सबका एक हो - सफलता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। फिर देखो दिल्ली वाले कमाल करेंगे। दिल्ली वालों को विशेष एक लिफ्ट की गिफ्ट भी है, वह कौन सी है? दिल्ली वालों का, उसमें भी विशेष शक्ति सेना का विशेष गुण कौनसा है? यज्ञ की स्थापना के कार्य में दिल्ली की शक्ति सेना का सुदामा मिसल जो चावल चपटी काम में आई है। वह बहुत महत्व के समय काम में आई है। तो महत्व के समय पर अगर कार्य में चावल चपटी भी लगाते तो वह बहुत वृद्धि हो जाती है। जैसे समय इतना फलीभूत नहीं होता। समय पर सहयोग देने से दिल्ली वालों को विशेष गिफ्ट की लिफ्ट मिली है। बाप की ओर से ड्रामा प्रमाण दिल्ली वालों को सदा सम्पन्न रहने का वरदान प्राप्त है। दिल्ली की धरनी का फाउन्डेशन अच्छा है। एक्जाम्पल (Example;मिसाल) बनने वालों को विशेष सहयोग मिलता है। दिल्ली को निमित्त सेवा, अन्य सेवा स्थानों के निमित्त एक्जाम्पल बने। जैसे आदि में विशेषता दिखाई, वैसे अभी दिखाओ। तो उसका सहयोग मिल जाएगा। दिल्ली वाले फारेन (विदेशी) वालों से भी अच्छे प्लान बना सकते हैं; क्योंकि यहाँ बहुत सेवा के साधन हैं। यहाँ मेहनत की जरूरत नहीं सिर्फ किला मजबूत की बात है। अच्छा। जब सबके संकल्प की अंगुली इकट्ठी होगी तो हर कार्य सफल होगा। सबकी नज़र दिल्ली पर है। जब एक दो के समीप हो हाथ में हाथ मिलाएंगे तब घेराव डाल सकेंगे। हाथ में हाथ मिलाना अर्थात् संकल्प मिलाना। सबमें एक जैसा उमंग उत्साह हो, दिलाना ना पड़े। अच्छा।
पुरूषार्थ की गुह्य गति क्या है? अथवा श्रेष्ठ पुरूषार्थ कौन सा है? हर संकल्प, स्वांस में स्वत: बाप की याद हो। इसको कहा जाता है स्मृति स्वरूप। जैसे भक्ति में भी कहते हैं - अनहद शब्द सुनाई दे, अजपाजप चलता रहे, ऐसा पुरूषार्थ निरन्तर हो - इसको कहा जाता है श्रेष्ठ पुरूषार्थ। याद करना नहीं, याद आता ही रहे। महारथियों का पुरूषार्थ यह है - महारथी अर्थात् स्वत: याद। महारथी हर संकल्प महान होगा। जितनाजितना आगे बढ़ते जायेंगे साधारणता खत्म होती जायेगी, महातना आती जायेगी। यह है बढ़ने की निशानी।
28-05-77 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन
बाप-दादा के सदा दिल तख्तनशीन समान बच्चों के लक्षण
बाप के सदा स्नेही, सदा सहयोगी, दिल तख्त नशीन व राज्य तख्त नशीन बच्चों प्रति उच्चारे हुए महावाक्य:-
बापदादा समीप और समान सितारों को देख रहे हैं। बाप को सदा स्मृति रहती। जैसे बच्चे स्मृति स्वरूप हैं, वैसे ही बाप भी अपने समीप बच्चों के स्मृति स्वरूप हैं। जैसे बच्चे स्मृति स्वरूप होने से समर्थी स्वरूप का अनुभव करते हैं। बापदादा भी स्वयं समर्थी स्वरूप होते भी, समान बच्चों के सहयोग वा स्मृति से, स्वयं स्वरूप में और एडीशन (Addition;वृद्धि) हो जाती है। इसलिए साकार बाप ब्रह्मा को सहयोगी स्वरूप की निशानी ‘हजार भुजाएं’ दिखाई हैं। भुजाएं है सहयोग की निशानी। तो बाप के साथ-साथ जो सदा सहयोगी हैं उन्हों की निशानी भुजाओं के रूप में हैं। ऐसे समान बच्चों का स्थान कौन सा होता है? किस स्थान पर वह निवास करते हैं? वह सदा दिल तख्त पर या विश्व के राज्य तख्त नशीन स्वयं को समझते है अर्थात् स्थिति में स्थित होते हैं। जैसे बड़ी से बड़ी महान् आत्माएं कभी भी धरनी पर पाँव नहीं रखती। जैसे यहाँ भी देखा, जब बड़े आदमी आते हैं तो पूरे रास्ते पर सीढ़ियों पर गलीचा बिछा देते हैं। ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं का पाँव धरती पर नहीं लेकिन गलीचे पर होते हैं। यह निशानी किसकी है? शुरू कहाँ से हुई? यहाँ तो उन्हों के पाँव सिर्फ गलीचे तक हैं। लेकिन जो बाप समान बच्चे हैं, उनका बुद्धि रूपी पाँव सिवाए तख्त के नीचे नहीं आते हैं। उन्होंको तख्त नशीन कहा जाता है अर्थात् सदा तख्त पर ही रहते हैं। नीचे नहीं आते हैं। ऐसे जो सदा दिल तख्त नशीन वा राज्य नशीन ही रहते हैं, उन्हों को सर्व आत्माओं से रिटर्न में (Return;बदले में) क्या मिलता है? स्नेह तो मिलता ही है, लेकिन दिल तख्त नशीन वाले जो भी कर्म करते, जो भी बोल बोलते, सभी के दिल पर ऐसे लगता है, जैसे बाप द्वारा जो भी निकलता वह सदा का यादगार बन जाता, सबके दिलों में समा जाता है। यादगार रह जाता है। फिर आधा कल्प के बाद यादगार ‘गीता’ के रूप में होता। तो बाप के महावाक्य यादगार रूप में ऊपर हो जाते हैं। इसी प्रकार जो दिल तख्त नशीन बच्चे हैं वह जिस आत्मा के प्रति संकल्प करते तो उनके दिल को लगता है। मानो, आप किस आत्मा प्रति शुभ भावना, शुभ कामना रखते हैं - उनके दिल को लगेगा कि सचमुच यह मेरे प्रति शुभ-भावना, शुभ कामना रखते हैं। एक होता है ऊपर-ऊपर से, दूसरा होता है निमित्त बने हुए स्थान के कारण रेसपेक्ट (RESPECT;आदर) देना। तीसरा होता है दिल से स्वीकार करना।
जो समान बच्चे हैं उन्हों का संकल्प भी दिल से लगेगा, जैसे कि तीर लगता है। जैसे पहले जमाने में तीर लगाते थे। तो जिसको तीर लगता था वा तीर सहित ही नीचे आ गिरते थे। इस प्रकार से जो दिल तख्त नशीन हैं - (1) वह दिल के संकल्प जिस आत्मा प्रति करेंगे वह व्यक्ति अर्थात् आत्मा स्वयं अपने दिल का भाव प्रकट करने के लिए सामने आ जायेगी। (2) दूसरी बात जो उस स्थिति में स्थित हो बोल बोलेंगे उनके दो शब्द दिल को राहत देने वाले होंगे। महसूस करेंगे कि भल दो शब्द बोले लेकिन दिल को राहत मिल गई, खुराक मिल गई (3) तीसरी बात - सदैव ऐसी आत्माओं को दूर होते हुए भी दिल से याद करेंगे। दिल से याद करने की निशानी क्या होगी? ऐसे अनुभव करेंगे जैसे कि साथ समीप हैं, दूर नहीं हैं। ऐसे नहीं अनुभव करेंगे कि यह आबू में हैं हम दूसरे देश में हैं। ऐसे समझेंगे कि सदा सम्मुख और साथ हैं। जैसे बाप को दिल से याद करते हैं तो क्या अनुभव होता है? दूर लगता है क्या? साथ का अनुभव होता है ना? इस प्रकार जो दिलतख्त नशीन बच्चे होंगे उन्हों का भी प्रेक्टीकल में रिटर्न दिखाई देगा। इसको कहा जाता है - ‘प्रत्यक्ष फल।’ (4) चौथी बात - वह दिल तख्त नशीन होंगे। दिल तख्त नशीन कौन होते हैं? राजा होगा ना? जैसे कोई बड़ा होता है तो उसको सब अपना समझते हैं। छोटे जो होंगे, वह बडों को अपना समझेंगे - ‘मेरा है।’ तो दिल तख्त नशीन बच्चे की यही निशानी होती जो हरेक उनको अपना बड़ा समझेंगे। अपनापन महसूस करेंगे। हमारे पूर्वज बड़े हैं, पूज्य हैं। यह शब्द कहने में भक्ति मार्ग के हैं, लेकिन जैसे पूर्वज का नशा होता है ना - यह हमारे पूर्वज पूज्य हैं, इसी रीति से हर आत्मा जो भी सम्पर्क में हैं वह ऐसे महसूस करेंगे कि यह ही हमारे पूर्वज हैं, पूज्य हैं। अपनापन महसूस करेंगे। ऐसे दिल तख्त नशीन कितने बनेंगे? थोड़े ही होते। यही अष्ट रत्नों की विशेषता है, जो फिर 100 में नहीं होती। उनमें भी माँबाप हैं फिर भी उनमें नम्बर तो हैं ना। तो जब पहले युग में भी नम्बर हैं, तो जो और पीछे हैं उनमें भी नम्बर होंगे।
दादी जाती है इसकी सबको खुशी है। क्यों? वैसे तो जाने में दूसरी लहर होनी चाहिए, लेकिन खुशी क्यों है? और विशेष खुशी की लहर है, क्यों? विशेष सबको खुशी इसी बात की है जो सभी बहुत समय से इन्तजार कर रहे हैं कि कुछ होना है, कुछ परिवर्तन आना है। तो इस पार्ट को देखते हुए सबके बुद्धि में कुछ नवीनता, परिवर्तन की भावना आ रही है। सभी को ऐसा लगता है, जैसे कि यह जा नहीं रहे हैं, लेकिन कुछ समीप जा रहे हैं। कुछ परिवर्तन, नवीनता का नक्शा सामने आने से जाने का संकल्प उसमें समा गया है। सबकी बुद्धि में यही है कि अब कुछ परिवर्तन की भूमिका बन रही है। बहुत समय से सबको यही संकल्प में रहता है कि कोई नई बात अब होनी चाहिए। बहुत समय वही सीन चलती रही है, कुछ नवीनता होनी चाहिए। यह निमित्त फारेन में जाने का जो पार्ट बना है उसमें सबके दिलों मे जैसे ऑटोमेटीकली सबमें लहर है। किसको कहा नहीं गया है, लेकिन एक नया उमंग उत्साह है। वहाँ तो उमंग में हैं। लेकिन भारत में भी समझते हैं नवीनता होगी। इसलिए सबको जैसे नई लहर खुशी की है। समझते हैं - समीपता को पहुँचने का दिखाई दे रहा है, समीप नजारा आ रहा है - यह भासना आती है। इसलिए जो विशेष आत्माएं हैं उन्हों का ही समय के साथ बहुत सम्बन्ध है जैसे ब्रह्मा की आत्मा का समय के साथ गहरा कनेक्शन है, ब्रह्मा का जन्म और संगम का होना। अगर ब्रह्मा का पार्ट नहीं होता तो संगम भी नहीं होता। ब्रह्मा के साकार पार्ट की समाप्ति और अन्य पार्ट का आरम्भ होना, यह भी समय को समीप लाने का एक आधार है। ब्रह्मा का समाप्त अर्थात् संगम युग समाप्त। तो जैसे ब्रह्मा की आत्मा का समय के साथ गहरा सम्बन्ध है, वैसे ही जो फॉलो करने वाली समीप आत्माएं हैं, उन्हों के हर कार्य का भी समय के साथ उतना ही समीप सम्बन्ध है। वह जैसे समय की घड़ी बन जाते हैं। जैसे देखो, आप लोग जो निमित्त बने हुए हो, उन्हों के संकल्पों को रीड़ (Read) करते हैं। सब समय की तुलना करते हैं कि इन लोगों की स्टेज यहाँ तक पहुँच गई है। तो समय क्या दिखाता है, चैक तो करते हो ना? जैसे आप लोगो के सामने समय की घड़ी ‘साकार बाप’ था। उनकी स्टेज को देखते आप लोग भी समझते थे जैसे कि कुछ होने वाला है। समीपता लग रही थी। जैसा फरिश्ता रूप! साकार नहीं है - ऐसा फील (Feel;अनुभव) होता था। तो समय की घड़ी हो गए ना। ऐसे आप लोग भी जो निमित्त हैं वह भी समय की घड़ी हो। उस नज़र से ही आप लोगों को देखते हैं कि घड़ी क्या दिखा रही है? यह जो विदेश जाने का पार्ट है, यह भी जैसे विशेष घंटी बजी है - ऐसा अनुभव होगा।
(परदादी को) ड्रामा आपको भी समीप पार्ट बजाने के निमित्त बनाता है। जैसे कल्प पहले बजाया था, वैसे अभी भी बजाते हैं। प्लॉन सोचने से नहीं होता है, लेकिन न चाहते भी ड्रामा का पार्ट निमित्त बना देता हैं। इसमें भी बड़ा रहस्य है। वरदान है आपको। लौकिक अलौकिक बाप के कुल का नाम बाला करने वाली निमित्त आत्मा हो। यह भी विशेष वरदान है। इसलिए आपको देखकर के दोनों याद आ जाते हैं। लौकिक भी फीचर्स (Features;शक्ल) याद आयेंगे और फीचर्स द्वारा जो फ्यूचर (Future;भविष्य) बनता है, वह भी याद आयेगा। आपके हर कदम में जो वरदान है - दोनों कुल का नाम बाला करना, वह समाया हुआ है। इसलिए ड्रामा स्वयं ही सीट की तरफ खींचता जा रहा हैं। समय प्रति समय जो भी महावाक्य आत्माओं के प्रति बापदादा के उच्चारण किए हुए हैं, वह प्रेक्टीकल में आ रहे हैं। विशेष वरदान है; और सर्विस का चांस भी आपको विशेष है। डबल सर्विस करने का चान्स है आपको। सूरत द्वारा भी, और सीरत द्वारा भी। इन लोगों की सूरत से अव्यक्त स्थिति होने से अनुभव करेंगे लेकिन आपकी सूरत चलते-फिरते ब्रह्मा बाप की सूरत और सीरत को प्रत्यक्ष करेंगे। यह एक्सट्रा सर्विस की फील्ड हुई ना? जहाँ भी जायेंगे तो क्या कहेंगे? सबको बाप की भासना आती है ना? तो यह सूरत भी सर्विस के निमित्त बनी है। डबल सर्विस हुई ना? (दादी को) वर्तमान समय आप आत्मा की डबल रूप से आह्वान की लीला चल रही है। एक तरफ भक्त आत्माएं अनजान रूप में आह्वान कर रही हैं - अष्ट देव के रूप में। दूसरी तरफ ज्ञान-स्वरूप होकर के ज्ञानी तू आत्मा बच्चे आह्वान कर रही हैं। ऐसे ही आह्वान कर रहे हैं जैसे आपकी जड़ चित्र अष्ट देव के रूप में करते हैं। लेकिन वह अन्जान हैं, इसलिए उन्होंको वह रस नहीं आता। लेकिन उन्हों को आह्वान से भी वरदान की अनुभूति की प्राप्ति का अनुभव होगा, डबल आह्वान हो गया ना?
दो मूर्तियाँ जा रही हैं, तीन मूर्तियाँ जा रही हैं वा अष्ट भी जा रही हैं? यह भी एक विशेष लहर है ना। जो सब समझते हैं - हम लोग भी जैसे साथ जा रहे हैं। इसका भी कारण? यह स्नेह की समीपता की निशानी है। जो इतना समय ड्रामानुसार निमित्त बन पार्ट बजाया है उसका प्रत्यक्ष रूप रिटर्न स्वरूप देख रहे हैं। निमित्त बन पार्ट बजाने की रिजल्ट सामने आ रही है।
इस समय आप तीनों के पार्ट में - जैसे ब्रह्मा का पार्ट रचना का, विष्णु का पार्ट पालना का, शंकर का पार्ट विनाश का दिखाते हैं। है तो ड्रामानुसार, लेकिन हर एक के साथ विशेषता दिखाई है। तो अभी-अभी बाप देख रहे हैं तीनों का विशेष गुण, कौनसा वर्तमान पार्ट चल रहा है? आप कौन सी मूर्त्त हो? वर्तमान पार्ट के प्रमाण तीनों का विशेष पार्ट प्रेक्टीकल में है। यह (दादी) तो निमित्त सर्व के उमंग, उत्साह और सेवा की फील्ड में नया मोड़ लाने के निमित्त आधारमूर्त्त बन जा रही है। तो यह आधारमूर्त्त हो जा रही है, और आपका (दीदी) सभी विशेष यह देख रहे हैं कि कितनी उद्धारमूर्त्त हैं, जो एक में दो का जाना महसूस करती हैं। किसको निमित्त बनाना यह उद्धारमूर्त्त हैं। और यह (पर दादी) है उदाहरण दिखाया कि प्रेक्टीकल हम सब एक हैं। तो आधारमूर्त्त, उद्धारमूर्त्त और उदाहरणमूर्त्त। तीनों की विशेषता हुई ना।
इस समय प्रेक्टीकल पार्ट में ‘जनक’ का पार्ट सेवा की सचेली कौड़ी का चल रहा है। लंडन में दोनों ही सुदेश और जयन्ती सर्विस के निमित्त बनी हुई हैं। यह दोनों भी वर्तमान समय बहुत अच्छी स्टेज पर हैं। समझती हैं एक साथ अंगुली देकर सेवा को बढ़ाना ही है। इस समय अच्छी रफ्तार से सर्विस में मस्त आत्माएं दिखाई देती हैं। यह भी एक चारों ओर के वातावरण का प्रत्यक्ष रूप है। सबकी नज़र वहाँ है। अभी सबका शुभ संकल्प उस तरफ है। कुछ होने वाला है - वायुमण्डल का प्रभाव है। सुमन जर्मनी में है, उनको भी विशेष वरदान मिल गया है। क्योंकि उसने अपने को रियलाइज किया, तो रियलाइज का उनको वरदान मिल गया है। जो महसूस करता है तो उसका आधा तो खत्म हो जाता है। तो हल्कापन भी आ गया और दूसरा फिर सर्विस का लक्ष्य रखा है इसलिए विशेष वरदान मिल गया है जम्प लगाने का। क्योंकि सच्ची दिल से रियलाइज किया। रियलाइज करने वाला बहुत आगे बढ़ सकता है। सरकमटेंस (परिस्थितियाँ) ऐसी थीं, यह ऐसा था तब मेरा भी ऐसा था - उनको कोई रियलाइजेशन नहीं कहेंगे। उसने अपने आपको रियलाइज किया। दिल से स्वीकार किया, इसलिए उनको विशेष वरदान की लिफ्ट मिल गई। वरदान के कारण खुद भी नहीं समझती कि मैं कैसे सर्विस कर रही हूँ। समझती है, मेरे से जितना हो रहा है, रेसपांड मेरी स्टेज से ज्यादा मिल रहा है। इसलिए खुशी भी है। इस गुण के कारण उनको यह लिफ्ट मिला है। वह भी आगे बढ़ करके कमाल कर सकती है। लाईन क्लीयर होने से रफ्तार तेज हो सकती।
संकल्प की सिद्धि का प्रत्यक्ष प्रमाण कैसे होता है? संकल्प किया और सिद्ध हुआ। वृत्ति और स्मृति द्वारा सेवा कैसे हो उसके ऊपर कुछ रूह-रूहान की? समय प्रमाण वाणी के साथ-साथ संकल्प अर्थात् स्मृति और वृत्ति अर्थात् शुभभावना हो - इससे सर्विस बहुत अच्छी हो सकती है। क्योंकि सुना हुआ तो रिपीटेशन समझते हैं। जो ज्यादा सम्पर्क में आत्माएं हैं वह प्वाईन्ट को कामन समझती हैं। लेकिन नए रूप की सेवा का उन्हों को भी तरीका सिखाओ। जब तक स्वयं अनुभवी नहीं तो औरों को कोई नई ररूपरेखा चाहिए। नया अनुभव कराओ। संगठन में भी ऐसा सेवा का प्रोग्राम बनाकर कर सकते हो। विशेष लक्ष्य देकर बिठाओ। फिर उन्हों से अनुभव पूछो। बहुत अच्छा सुनायेंगे। जैसे वाणी द्वारा सेवा का बहुत अनुभव किया है - जो आप लोग की रचना है। अभी सर्विस में जो एडीशन चाहिए - वह है संकल्प और वृत्ति द्वारा। इसके लिए प्लान्स बनाओ। जब मजा आयेगा तब महसूस करेंगे कि हमारी नवीनता की चढ़ती कला है। जैसे साइंस वाले कोई न कोई इन्वेन्शन करने में बीजी रहते हैं, इसी प्रकार से जो पाइंट चल चुकी है उनकी गुह्यता में नए रूप की इन्वेन्शन करने के लिए अमृतवेले लक्ष्य ले बठेंगे तो टच होगा। नई-नई इन्वेन्शन निकलेंगी जिससे औरों को भी नवीनता का अनुभव होगा। अच्छा।