Fwd: त्याग की परिभाषा .. त्याग का पहला कदम .. देहभान के त्याग की पहली सीढी .. त्यागस्वरूप त्यागमूर्त ..... तन मन धन सबंध का त्याग ... तन का त्याग अर्थात देहभान का त्याग ...

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Nnys Patel

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Apr 20, 2016, 7:08:45 AM4/20/16
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त्याग की परिभाषा
त्याग का पहला कदम .. देहभान के त्याग की पहली सीढी .. त्यागस्वरूप त्यागमूर्त ..... तन मन धन सबंध का त्याग  ... तन का त्याग अर्थात देहभान का त्याग ...

त्याग का अर्थ किसी भी चीज को वा बात को छोड़ दिया ... अपनेपन से किनारा कर लिया ... अपना अधिकार समाप्त हुआ .. जिस के प्रति त्याग किया वह वस्तु उसकी हो गइ ...जिस बात का त्याग किया उसका फिर संकल्प भी नही कर सकते ... क्योंकि त्याग की हुई बात संकल्प द्वरा प्रतिज्ञा की हुइ बात फिर से वापिस नही ले सकते हो ... आप बेहद के सन्यासी वा त्यागी हो ... पुराने शरीर, पुराने देह का भान त्याग किया ... संकल्प किया की बुद्धि द्वारा फिर से कब इस पुराने घर में आकर्षित नही होंगे ... संकल्प द्वरा फिर से वापिस नही आयेंगे ... देह दहित देह के सब सबंध का त्याग ... पहला तन शब्द तन आता है ... जैसे तन मन धन कहते हो .. देह और देह के सबंध कहते हो ... तो पहला त्याग तन का हुआ ... पुराने देह के भान से विस्मुर्ती अर्थात किनारा ... यह है पहला कदम है त्याग का ... देह रूपी घर की भिन्न भिन्न कमेंद्रियाँ है देह की सामग्री  ... देह भान का त्याग अर्थात सर्व का त्याग .. कोई भी कर्मेन्द्रियाँ अपनी तरफ आकर्षित करती है तो क्या उसको सम्पूर्ण त्याग कहेंगे ?? .. इसी प्रकार अपनी चेकिंग ----- कोई भी एक भी कर्मेन्द्रिय का विचलित व आकर्षण भी एक बाप का बनने नही देगी ... एकरस स्थिति में स्थित होने नही देगी ... नम्बर वन में जाने नही देगी ... आकर्षित माना बुद्धि बार बार वहां भटकती रहेगी ... कोई भी कर्मेन्द्रिया की आकर्षण रही हुई है तो श्रेष्ठ पद पाने से बार बार निचे ले आएगी ... पुराने देह रूपी घर और देह रूपी घर की सब सामग्री का त्याग ... सम्पूर्ण त्याग चाहिए ... पुरानी देह बाप द्वरा मिली अमानत समझ सेवा अर्थ कार्य में लगाना है ...  महेमान बन देह में रह सेवा में आना ... मेरे पन का त्याग कर महेमान समझ महान कार्य में देह को लगाओ और असली घर परधाम को याद करो ... फरिश्ता स्वरूप को याद करो .... देवता स्वरूप को याद करो ... निराकर स्वरूप को याद करो ... शरीर का आधार लेना है उसमे फंसना नही है ... न्यारे पन की ऊपर की ऊँची स्थिति से निचे साकार कर्मेन्द्रियाँ द्वारा कर्म करें लिए आओ ... इसको कहा जाता है ---- महेमान अर्थात महान ... ऐसे रहते हो ??? ..   त्याग का पहला कदम पूरा किया ????? ....

शक्तियों के अलंकार है .. शक्तियाँ अष्ट भुजाधारी .. १६ भुजाधारी है ...  शक्ति अर्थात सहयोगी ... सदा सर्व भुजाधारी अर्थात सर्व परिस्थियों में सहयोगी ... जो शक्ति स्वरूप हर परिस्थति में . हर कार्य में सदा सहयोगी बन औरों को ही सहयोगी बनायेंगे ...त्याग करते सहन करते भी सदा सहयोगी होंगे ... सहयोग को निशानी भुजाएं है .. इसलिए कभी कोई संगठित कार्य होता है सदा अपनी अंगुली दे सहयोगी बनेगे ... यह शक्ति की भुआ


रावन के सीर ज्यादा दिखाते है ... माया रावण माना दिमाग की हलचल क्यों क्या ऐसे वैसे जैसे का क्वेश्चन मार्क के सीर पैदा हो जाते है ... एक ही समय 10 बाते बुद्धि में आती है ... एक एक शिर अपना रुप दिखता है ... यही 10 शीश के शस्त्र धारी बन परवश बन जाते है ..... रावन के 10 सिर् वाली आत्माएं हर छोटी बड़ी परस्थिति में सहयोगी नही बनेगी ... क्यों क्या कैसे के सिर द्वरा अपना उलटा अभिमान प्रत्यक्ष करती रहेगी ... एक बात को 10  शीश लगाने वाली शक्ति कभी सहयोगी नही बनेगी ... हर बात में ओपोजीशन करेगी ... ओपोजीशन करें वाले रावन सम्प्रदाय के हो गये ... आशुरी शक्ति के वशीभूत कहेंगे ... भल ब्राहमण बन गये ... यह है रावन के सिर ...

सदा सहयोगी मूर्त ... त्याग मूर्त  .. ब्रहमा बाप के मुख से सदा यही रहा के बाप का रथ ... तो आप सब का शरीर रूपी रथ सेवा अर्थ बाप के कार्य में ... कोई भी कर्मेन्द्रिय के वशीभुत होना माना मनमत .. यह है देहभान के त्याग की पहली सीढी .. पुराना भान छोड़ फरिश्ता स्वरूप लप ... पुरानी दुनिया के देह भान को छोड़ा तो डबललाइट बन जाते हो .. पुराने देह की मिट्ठी कीचड़ में मच्छर पैदा होते, क्यों क्या कैसे से करते रहेंगे और काटते रहेंगे और कम पद वा पद भष्ट करते रहेंगे ... रावन के सीर लग जाते है मुश्किल होता है ... भुजाधारी शक्ति बन जाते हो तो सहज हो जाता है ...

तो सदा सहयोग मूर्त .. त्यागमूर्त ... कदम कदम फोलो फादर ... महेमान अर्थात महान आत्मा .. बेहद के सन्यास वा त्याग करें वाले  .. बिना त्याग से सहयोगी नही बन सकते ...


परिस्थति रूपी पहाड़ को स्व स्थिति से जम्प देकर पार करना है ... रॉब को त्याग रूहाब को धारण करें वाले सच्चे सेवाधारी ... भरपूर आत्माओं चहेरे द्वारा सेवा ... मायाजीत बनने के लिए स्वमान की सिट ... सर्व सबंध एक बाप से साथ जोडकर बंध मुक्त अर्थात योगयुक्त बनो . .समीप आत्मा की निशानी सम्पनता ... सेवा की भाग दौड़ भी मनोंरंजन है  .... 3 ४ ८२ ...

ॐ शांति ...

मेरेबाबा प्यारेबाबा मीठेबाबा कृपालुनाना दयालुबाबा वाहबाबा वाहड्रामा

 


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